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शिक्षा ने मुझे ताकत दी : कामरेड डी. राजा
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शिक्षा ने मुझे ताकत दी : कामरेड डी. राजा

January 20, 2026
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~ सुमन्त

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव कामरेड डी० राजा तथा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन में एक बड़ा लाक्षणिक साम्य है। दोनों को अपने स्कूल की शिक्षा ग्रहण करने की खातिर रोजाना नदी पार करनी पड़ती थी।

शास्त्री जी की महानता का जब भी जिक्र होता है तो बड़े फख्र के साथ नदी पार करके उनके स्कूल जाने के वाकया को सुनाया जाना एक तरह से अनिवार्य माना जाता है। वैसे तो कामरेड राजा शास्त्री जी के मुकाबले भारतीय राजनीति में उतने ऊंचे कद के नेता नहीं हैं। फिर भी, भारत के सर्वोच्च संसदीय निकाय - राज्य सभा - के पूर्व सदस्य तथा भारत की एक सबसे पुरानी तथा प्रमुख कम्युनिस्ट पार्ट (भाकपा) की दूसरी पारी के महासचिव होने के नाते वह एक सुविख्यात राजनीतिक हस्ती तो हैं ही! लेकिन, नदी पार करके रोज स्कूल जाने की घटना को कामरेड राजा के संदर्भ में इस ब्राह्मणवादी वर्चस्व वाले भद्र समाज में शायद ही एक प्रेरक प्रसंग के रूप में विख्यात होने दिया जाये क्योंकि वह तमिलनाडु के एक छोटे से गांव के खेत मजदूर परिवार में जनमे एक खांटी दलित नेता हैं!

कामरेड राजा ने अभी हाल में पटना के एक बौद्धिक सभा को संबोधित करते हुए यूं ही नहीं कहा था कि हमारा यह समाज एक ऐसा समाज है जिसमें पूर्व उप प्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम जैसे शक्तिशाली राजनेता को भी महज दलित होने के नाते घोर अपमान का घूंट पीना पड़ा था। उन्होंने याद दिलाया कि बनारस में पं० मालवीय जी की मूर्ति का अनावरण बाबू जगजीवन राम के कर कमलों द्वारा होने के तुरंत बाद कट्टरपंथियों ने मूर्ति को गंगाजल से धो कर उन्हें उनकी 'हैसियत' बतायी थीं।

कामरेड डी० राजा ने अपने एक लंबे साक्षात्कार में स्वयं नदी पार करके स्कूल जाने का वर्णन किया है, "हाईस्कूल में दाखिला लेने के बाद मुझे पालार नदी पार करनी होती थी। हर दिन, मैं नदी के उस पार जाता था। मानसून के दौरान, नदी में बाढ़ आ जाती थी। ... हम तैरना जानते थे और हम जानते थे कि बहाव कैसे और कितना है।"

मेरे सामने एक पुस्तक है जिसमें मुख्य रूप से कामरेड डी० राजा के राज्य सभा में दिये गये भाषणों के अलावा अंग्रेजी अखबारों में छपे उनके कुछेक लेखों तथा उनसे ली गयी एक लंबी बातचीत को समेटा गया है। पुस्तक का नाम है - "सदन में डी० राजा : प्रतिनिधि भाषण।" पुस्तक के सीरीज संपादक संजीव चंदन लिखते हैं, "सीरीज की यह पुस्तक सीपीआई के कद्दावर नेता डी० राजा के भाषणों का संग्रह है, व उनसे एक लंबी बातचीत भी इसमें संकलित हैं। प्रसिद्ध विचारक कांचा आयलैया डी० राजा को पहले दलित नेता के रूप में देखते हैं, जिसे किसी भी पार्टी ने इस कद, पद और इस भूमिका तक पहुंचाया हो। इसके लिए वे सीपीआई को पूरा श्रेय देते हैं। प्रखर वैचारिक और सरल स्वभाव के धनी डी० राजा सदन में जनता की समुचित आवाज़ रहे हैं।"

कामरेड राजा जब यह कहते हैं कि "हम तैरना जानते थे और जानते थे कि बहाव कैसे और कितना है" तो इसका तात्पर्य सिर्फ नदी की धारा से नहीं है! वह सवर्ण वर्चस्व वाले उस भारतीय समाज और राजनीति की भी बात कर रहे हैं जिसमें वर्तमान समय में भी किसी होनहार दलित को अपने लिए सम्मानजनक जगह बनाना किसी उफनती नदी की क्रुद्ध लहरों से टकराने से कहीं अधिक कठिन है!

आप समझिए कि कामरेड डी० राजा ने जब इस देश की सर्वोच्च संसदीय सदन - राज्यसभा - के वैभवशाली गलियारे में अपने दृढ़ संकल्पित पैर रखें तो यह सौभाग्य उन्होंने लॉटरी में निकले किसी ईनाम की तरह हासिल नहीं कर लिया था। बल्कि इसे उन्होंने उस दुर्दमनीय प्रताड़ना वाली अपनी दुनिया के क्रूरतम बाड़े को लांघ कर हासिल किया जहां "ऊंची जाति के भूस्वामियों के इलाके से गुजरते वक्त दलितों को अपने चप्पल अपने हाथ में लेने पड़ते थे।"

कामरेड राजा अपने गांव और अपने खेत मजदूर परिवार की ऐसी विषम परिस्थितियों से लोहा लेते हुए अपने लिए इतनी गौरवशाली और शीर्ष हैसियत कैसे हासिल कर ली - यह एक आश्चर्य भरा प्रश्न तो है ही? कामरेड राजा बिना कोई अगर मगर किये इस सवाल का स्वयं सीधे उत्तर देते हैं - शिक्षा।

पुस्तक में कामरेड राजा से प्रश्नकर्ताओं के एक समूह द्वारा कई किश्तों में लिये गये साक्षात्कार के महत्व के बारे में यदि कहा जाये तो इसे किसी जीवित नायक पर बनायी गई किसी कामयाब फिल्म की पटकथा के रूप में पढ़ा जा सकता है। यह साक्षात्कार महज नायक के जाज्वलमान जीवन चरित का आख्यान ही नहीं है बल्कि आप पायेंगे कि इसमें हमारे भारतीय समाज की पूरी संरचना की एक अत्यंत संयत और बेलाग विश्लेषण भी है। इसी साक्षात्कार में कामरेड राजा अपनी 'ताकत' का राज खोलते हुए शिक्षा जैसे अस्त्र के बारे में कहते हैं, "मेरे पास अपने सवाल थे और मैं उन सबके जवाब ढूंढ़ रहा था : हमारे लोगों के साथ ऐसा क्यों हो रहा है? तब मुझे पता चला कि शिक्षा ने मुझे ताकत दी। मैंने बहुत कुछ पढ़ा और शिक्षा ने मुझे एक पहचान दिलायी, मुझे वह योग्यताएं प्रदान कीं जो दूसरों के पास नहीं थीं और यह मेरी संपत्ति बन गयी।"

परंतु, कामरेड राजा शिक्षा के उज्ज्वल पक्ष को महज उजागर करके ही नहीं रह जाते हैं। वह शिक्षा और शिक्षण संस्थानों में आज भी चल रहे नाग की तरह कुंडली मार कर बैठे प्रतिगामी ताकतों के क्रूर और घिनौने खेल की ओर भी इंगित करते हैं। पुस्तक में कामरेड राजा द्वारा समय समय पर राज्य सभा के भीतर दिये गये कुछेक संक्षिप्त भाषणों का भी एक हिस्सा है। उन्हीं एक भाषण में कामरेड राजा विश्वविद्यालयों के विषाक्त वातावरण का चित्रण करते हुए कहते हैं, "श्रीमान, विश्वविद्यालयों, आईआईटी तथा अन्य शिक्षा संस्थानों में जो कुछ हो रहा है वह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। संसद को भी इस पर चिंतित होना चाहिए। ... हम यह दावा कर सकते हैं कि हमने अस्पृश्यता खत्म कर दी है। लेकिन अस्पृश्यता कई आधुनिक रूपों में मौजूद है। उच्च शिक्षण संस्थानों में भी वह मौजूद है। दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव किया जाता है और उनको इसकी कीमत चुकानी होती है। ... रोहित ने आत्महत्या कर ली। मैंने कहा कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या थी।"

अंबेडकर और कम्युनिस्टों के अंतर्संबंध को लेकर भी आज भारी ऊहापोह की स्थिति है। सीपीआई की ही बात करें तो यहां एक हिस्से का अंबेडकर के प्रति इस नारे "जय भीम जय मार्क्स" के अंतर्गत भारी अनुराग भाव झलकता है। लेकिन, एक बड़ा हिस्सा भी है जो यह मानता है कि अंबेडकर कई मायने में अपने प्रबल कम्युनिस्ट विरोध के चलते हमारे किसी काम के नहीं हैं। आज के अधिकांश अंबेडकरवादी भी वाम के साथ संबंधों के लेकर एक तरह से आक्रमक रूख ही रखते हैं।

मगर, कामरेड राजा अंबेडकर को जिस रूप में देखते हैं वह वाम और अंबेडकर दोनों के अंतर्संबंधों को एक अत्यंत तार्किक एवं रचनात्मक स्वरूप प्रदान करता है। अंबेडकर के सवाल पर वह अपने साक्षात्कार में कहते हैं, "जब डा० अंबेडकर जीवित थे तब वामपंथी आंदोलन के साथ कुछ संबंध थे। अंबेडकर और वामपंथी आंदोलनों ने एकसाथ काम किया। कुछ मुद्दों पर मतभेद थे। जब डा० अंबेडकर ने चुनाव लड़ा, तो उसमें सीपीआई का कोई सहयोग नहीं था। लेकिन, यह सब अंबेडकरवादियों के लिए वाम-विरोधी स्थिति लाने का मुद्दा नहीं बनना चाहिए था। ... आप सीपीआई या अन्य वामदलों से सहमत नहीं हो सकते हैं, लेकिन आप वामपंथ विरोधी कैसे हो सकते हैं?" फिर आगे चल कर कामरेड राजा अपने एक लेख में अंबेडकर के महान योगदानों को एक अलग रूप में रेखांकित करते हैं। ध्यान देने की बात है कि इसमें संपूर्ण भारतीय महिलाओं को सम्मान और अधिकार दिलाने के उनके अप्रतिम योगदान की भी खास तौर से चर्चा है, "अंबेडकर का जन्मदिन केवल दलितों, आदिवासियों और वंचितों के लिए उत्सव मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह दासता से मुक्ति का काम करने वाली स्त्रियों के लिए तथा उन सभी के लिए उत्सव का दिन है, जो क्रांतिकारी बदलाव के लिए लड़ रहे हैं। लोगों को जो नागरिक अधिकार मिले हैं उनके लिए भी वे अंबेडकर के ऋणी हैं।"

अंबेडकर के महत्व के प्रति कामरेड राजा के इस द्वंद्ववादी दृष्टिकोण को इस पुस्तक के यशस्वी संपादक राजीव सुमन ने अपनी भूमिका में बड़े खुबसूरत अंदाज़ में पेश किया है, "डी० राजा वैसे कुछ कम्युनिस्ट नेताओं में से एक हैं जो एक हद तक अंबेडकरवादी भी रहे हैं। उनके भाषणों में, लेखों में सामाजिक न्याय की विशेष पृष्ठभूमि दिखती है। समतामूलक चेतना की अपूर्व विरासत उनके यहां देखी जा सकती है। तमिल कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर की पंक्तियां उनके भाषणों का स्थायी भाव है।"

और, आखिर में। एक संक्षिप्त समीक्षात्मक टिप्पणी में पूरी किताब का हवाला दे पाना न संभव है और न ऐसा रिवाज है। परंतु, का० डी० राजा की ही दो पंक्तियों का सहारा लिया जाये तो न सिर्फ इस पुस्तक बल्कि कामरेड राजा की स्वयं की शख्सियत के पूरे खाका का खिंच जाना नामुमकिन नहीं है, "मैं लोगों को बताता था कि मेरे पास इन रक्तिम बौद्धिक हथेलियों के साथ संरक्षित सभी रेखाएं हैं।"

कहना न होगा कि कामरेड राजा नारियल का छिलका उतारते अपने श्रमिक माता-पिता सहित इस देश के उन करोड़ों श्रमिकों की हथेलियों की रेखाओं को अपनी रक्तिम बौद्धिक हथेलियों में संरक्षित रखने की बात कर रहे हैं जिन्हें खेतों, खलिहानों, कारखानों आदि में अपने हाथों से पहाड़ तोड़ने जैसे श्रम करते हुए उन्होंने खो दी हैं!

~ Sumant, Patna
6202403279