
ATS के DSP विपिन राय ने वरिष्ठ पत्रकार कामता प्रसाद के साथ की हिमाकत, योगी बाबा और केंद्रीय गृह मंत्री को भेजी गई चिट्ठी
सेवा में,
माननीय मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश
श्री योगी आदित्यनाथ जी व
गृह मंत्री, भारत सरकार श्री अमित शाह जी
मेरा नाम कामता प्रसाद तिवारी है और मैं उच्च कोटि का प्रातः स्मरणीय सरयूपारीय ब्राह्मण हूँ। पेशे के तौर पर मैंने पत्रकारिता-अनुवादकर्म और वेब डेवलपमेंट को अपनाया है। हिंदी के सभी प्रमुख अखबारों और तमाम स्वनामधन्य संपादकों के साथ काम कर चुका हूँ। चूँकि श्रमजीवी पत्रकार रहा हूँ तो पाक-नापाक सभी जगहों पर आवाजाही रही है। मैंने जहाँ भगवान बुद्ध द्वारा खोजी गई ध्यान-पद्धति विपश्यना की साधना की है वहीं लखनऊ में मस्जिद में नमाज पढ़ाने वाले कारी साहब से उर्दू सीखी है। राइट-लेफ्ट सभी तरह की पार्टियों-ग्रुपों में मेरे संपर्क रहे हैं।
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इसी महीने की 3 तारीख को दरोगा से प्रोमोट होकर वाराणसी एटीएस के डिप्टी एसपी बने विपिन राय ने बाकायदा पैरोकार भेजकर मुझे अपने ऑफिस बुलवाया था। उनसे पहले भी मेरी एक मुलाकात हो चुकी थी तो सजग-शांतिप्रिय नागरिक के रूप में मैंने जरूरी समझा कि चलकर उनकी मदद की जाए। मेरे पास मार्क्सवादियों-माओवादियों को लेकर जो भी जानकारी थी, वह मैंने उन्हें दे दी। बातचीत के अंत तक आते-आते मुझे साफ तौर पर पता चला चुका था कि इस आदमी की दिलचस्पी नक्सली आतंकवाद से देश को मुक्त कराने में कत्तई नहीं थी, इसकी केंद्रीय चिंता तो इस बात को लेकर थी कि कितनी जल्दी इसको प्रोमोशन और परमवीर चक्र मिले।
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56 वर्षीय वरिष्ठतम पत्रकार के साथ किस तरह से बात की जाती है, इसको इसकी तमीज नहीं है। हमको पुलिसिया अंदाज में धमका रहा था कि वह मुझे जिस तरह से इस्तेमाल करना चाह रहा है, अगर मैंने वैसा नहीं होने दिया तो यह मुझे नक्सल कनेक्शन में अंदर करवा देगा। टके का दरोगा और जाति का भुंइहार इतनी मनबढ़ई दिखाए, यह स्वीकार्य नहीं है।
आगे की कहानीः इलाहाबाद में एक जनमजात कायर लाला रहता है, जिसका नाम मनीष श्रीवास्तव उर्फ मनीष आजाद है। आज की तारीख में उसकी औकात इतनी भी नहीं है कि 50 मजदूरों को किसी चौक-चौराहे पर जोड़ ले। दिन-रात फेसबुक पर बैठकर भाँति-भाँति का बेहूदा और अटपटा ज्ञान बघारता रहता है।
इस हरामजादे के अनुसार गांडूगीरी-स्त्री समलैंगिकता परम-पुनीत कार्य है। कश्मीर घाटी के इस्लामिक चरमपंथी पृथक राष्ट्रीयता के लिए संघर्षरत लड़ाके हैं। जेंडर किसी वस्तुगत सत्ता का नाम नहीं, वरन इससे तय होता है कि कौन खुद को क्या मानता है। मेरे सुदीर्घ पत्रकारीय जीवन में एक वाकया ऐसा भी देखने को मिला था जबकि पुलिस का एक डीआईजी खुद को राधा मानकर उल्टी-सीधी हरकतें कर रहा था और उसे उसके घरवालों ने मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती करवाया था।
इस वक्त पत्र लिखने का प्रयोजन बस इतना है कि विपिन राय और उसके एक अधीनस्थ को अपना ओहदा बढ़वाने की जो अत्यधिक चुल्ल मची है, उसे शांत करवाया जाए और इन दोनों को नक्सलियों से लोहा लेने के लिए रेड कॉरीडोर में ट्रांसफर दे दिया जाए। विपिन राय दरोगा के तौर पर भर्ती हुआ था और तेल-पानी लगाकर यहाँ तक पहुँचा है। चूँकि उसके पास पहली दफा मुझे तत्कालीन आईपीएस अधिकारी श्री संतोष सिंह ने भेजा था तो कयास लगाया जा सकता है कि इसकी तरक्की में उनकी अहम भूमिका रही होगी।
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जैसा कि मैं पहले ही अपनी तारीफ में लिख चुका हूँ कि मैं उच्च कोटि का प्रातः स्मरणीय सरयूपारीय ब्राह्मण हूँ और विपिन राय के साथ अपनी पहली मुलाकात में मैंने उन्हें बताया था कि योगी बाबा सीएम ही नहीं उस मठ के मुखिया भी हैं, जहाँ पर गए बिना चारों धाम की यात्रा मुकम्मल नहीं होती। मेरा वानप्रस्थ आश्रम चल रहा है और पत्नी निरंतर दबाव बनाए रहती हैं कि अब हमें भी चारों धाम की यात्रा कर लेनी चाहिए। ------ गोरखपुर से ताल्लुक रखने वाला सत्यम वर्मा और शशिप्रकाश सिन्हा का समूचा गिरोह नौजवानों का ब्रेन-वॉश करके उनसे भीख मंगवाता है। दिन-रात योगी बाबा को सांप्रदायिक फासिस्ट गुंडा कहते हुए अनर्गल प्रलाप जारी रखते हैं ये लोग। हम जैसों की भावनाएं आहत होती हैं लेकिन विपिन राय जैसे चुगद ऐक्शन मोड में नहीं आते क्योंकि भारत सरकार ने ऐसे हरामियों के संगठन को प्रतिबंधित नहीं किया है। -----------------
विपिन राय जैसों को अगर लाल बंदरों से निपटने का काम सौंपा जाना है तो लाजिमी है कि इन्हें कुछ राजनीतिक पढ़ाई भी करवाई जाए। इसे यही नहीं मालूम कि दंडकारण्य या रेड कॉरीडोर किस चिड़िया का नाम है। ----- इसका अधीनस्थ भारत नाम का कोई बंदा है, जिसको लगता है कि उसके साहब जब तरक्की पाएंगे तो उसकी जगह उसे मिल जाएगी। -------- जम्मू से लेकर कोलकाता तक के मैदानी इलाकों में कहाँ-कहाँ छापामार युद्ध चल रहे हैं और कहाँ-कहाँ माओवाद को जीवन-दर्शन के रूप में अपनाने वाले लाल बंदर सक्रिय हैं, इस सबका पता लगाने और इनकी काट प्रस्तुत करने के लिए सब-इंस्पेक्टरी की समझ काफी नहीं है, आगे की पढ़ाई भी जरूरी है। ---------------------------स्वनामधन्य पंडित कामता प्रसाद तिवारी का इगो हर्ट करने का काम अगर विपिन राय ने नहीं किया होता तो मैं उसके साथ अपना सहयोग बनाए रखता क्योंकि अपने निजी अनुभवों से जानता हूँ कि इस देश के लाल बंदरों जितना गलीज़ प्राणी शायद ही कोई हो।
समलैंगिक संबंधों को लेकर माओवादियों का पुरजोर समर्थन इस बात से भी जाहिर होता है कि इसी साल मनुस्मृति दहन प्रकरण के उपरांत 15 दिन जेल की सैर कर चुके नौनिहालों ने अपने अनुभवों की लिपिबद्ध-प्रकाशित प्रति फ्री-प्रकाश राय को भी सौंपी थी। ये वही फ्री-प्रकाश राय हैं, जिनका पूरा खर्चा सुल्तानपुर के एक इतिहासकार महोदय उठाते रहे हैं, जो कि अपने अलबेले शौक के लिए मशहूर थे। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार जन्नत में हुरें ही नहीं लौंडे भी मिलते हैं लेकिन इन इतिहासकार महोदय को इतना सब्र कहाँ, वे तो अपना सारा शौक इसी जीवन में पूरा कर लेना चाहते थे, भले ही पुरखों की संपत्ति बेचनी पड़े।
कोई अपनी मेहनत अपने पुरुषार्थ से घर बनवा ले, कार खरीद ले यह बात फ्री प्रकाश राय को हज़म नहीं होती क्योंकि ये महाशय पुरखों की भूसंपत्ति बेचकर जिंदगी भर ऐश करते रहे हैं। जमीन बेचकर बेटियों की शादी की और दहेज में अपने दोनों लौंडे भी भेज दिए कि हे दामाद दी इन्हें पढ़ाओ-लिखाओ, हम तो जनम के गँड़ुवे हैं, हम इस लायक नहीं कि अपनी औलादों का अपनी मेहनत से पेट भर सकें। माले से हकाला गया एक दूसरा कमजर्फ, जो इसी तरह की प्रवृत्ति रखता है, भी जाति से भुंइहार है, जिसके PFI कनेक्शन की जाँच यही विपिन राय कर चुके हैं।
चलते-चलतेः विपिन राय का जो अधीनस्थ मिला था, वह संभवतः पिछड़ी जाति का है और उसे भी कथित तौर पर मनुस्मृति लागू किए जाने से ऐतराज है और यह ऐतराज ब्राह्मणवाद-विरोधी माओवादियों को भी है। तो हे योगी बाबा, माओवाद समर्थक लोग आपके सिस्टम में भी भरे पड़े हैं।
हा हा हा


