
प्रलेस की बैठक में साहित्य, संघर्ष और संगठनात्मक विस्तार पर हुआ विचार
हमारा मोर्चा, प्रतिनिधि
फैजाबादः प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) की बैठक शनिवार को जनमोर्चा सभागार, फैजाबाद में सम्पन्न हुई। बैठक के मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष मंडल के वरिष्ठ साथी, आलोचक डॉ. रघुवंशमणि ने प्रगतिशील लेखक संघ के ऐतिहासिक संदर्भों पर प्रकाश डालते हुए सज्जाद ज़हीर और मुल्कराज आनंद का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पेरिस में की गई परिकल्पना को साकार करने के लिए 1936 में मुंशी प्रेमचंद की अध्यक्षता में प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ। उन्होंने कहा कि उस दौर की तुलना में आज का दौर न सिर्फ भिन्न है बल्कि और अधिक कठिन होता चला गया है। उन्होंने कहा कि हम सभी मूलतः लेखक हैं और साहित्य मनोरंजन का विषय नहीं बल्कि राजनीति और समाज को सही दिशा दिखाने की एक सशक्त विधा है।
डॉ. रघुवंशमणि ने कहा कि निरंतर साहित्यिक क्रियाओं को करते रहने की जरूरत है, तभी अधिक से अधिक लोगों की सहभागिता बढ़ेगी और अच्छे कार्यकर्ता व साहित्यकार मिल पाएंगे। उन्होंने आगामी कार्यक्रम को उर्दू के मशहूर शायर हसरत मोहानी पर केंद्रित करते हुए डॉ. बुशरा खातून को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित कर संगोष्ठी आयोजित किए जाने का सुझाव दिया।
बैठक की अध्यक्षता प्रलेस के अध्यक्ष वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने की तथा संचालन प्रलेस के सचिव डॉ. आर. डी. आनंद ने किया। संचालन करते हुए डॉ. आर. डी. आनंद ने कहा कि यह वर्ष प्रलेस का 90वां वर्ष है। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि हसरत मोहानी पर एक संगोष्ठी आयोजित की जाए, जिसमें किसी विद्वान शख्सियत को बुलाकर विशेष वक्तव्य कराया जाए। साथ ही प्रत्येक माह की बैठक में काव्य पाठ अथवा एकल काव्य पाठ और कविताओं पर चर्चा की जाए। प्रगतिशीलता से जुड़े विभिन्न विषयों को चुनकर बारी-बारी से चर्चा आयोजित करने तथा हमसे बिछुड़े साहित्यकार ज्ञानरंजन, विनोद कुमार शुक्ल, राजेंद्र कुमार एवं वीरेंद्र यादव को श्रद्धांजलि अर्पित करने का भी प्रस्ताव रखा गया।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि आज हमारे दुश्मन हमें अत्यंत कठिन संकटों में डाल रहे हैं और विडंबना यह है कि बड़े से बड़ा साहित्यकार भी पुरस्कारों की जाल संरचना में फँसता जा रहा है। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति पर हमले हो रहे हैं और लोग प्रत्यक्ष मेल-मिलाप से बचने लगे हैं। आज का समय समय की विद्रूपताओं को लिखने का है। हर साहित्यकार की अपनी समझ होती है और वह समाज को जैसा समझता है, वैसा लिखता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बिना पढ़े न तो साहित्य को ठीक से समझा जा सकता है और न ही बेहतर सृजन संभव है। सृजन के लिए निरंतर मेहनत आवश्यक है।
वक्ताओं में डॉ. विंध्यमणि त्रिपाठी ने महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि स्मृतिशेष साथियों की रचनाओं को साझा और एकल दोनों रूपों में प्रकाशित किया जाना चाहिए। नए लेखकों और कवियों की पुस्तिकाएँ प्रकाशित कर उन्हें पर्याप्त स्पेस देना बेहद जरूरी है।
इसके अलावा कॉमरेड एस. एन. बागी, जसवंत अरोड़ा, आर. एस. शास्त्री, अशोक कुमार तिवारी, अयोध्या प्रसाद तिवारी, दिवाकर सिंह, आशीष कुमार और अफाक उल्लाह सहित अन्य वक्ताओं ने एकमत राय व्यक्त की कि प्रत्येक माह एक निश्चित तिथि को गोष्ठी आयोजित की जाए। नए सदस्यता अभियान चलाए जाएँ, लोगों से आर्थिक सहयोग लिया जाए, शोधार्थियों को चिन्हित किया जाए तथा प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया, फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से गतिविधियों का प्रचार-प्रसार किया जाए। संगोष्ठियों के लिए नोटिस बोर्ड के प्रयोग पर भी बल दिया गया।
सभा में वक्ता साथियों के सुझावों को स्वीकार करते हुए संगठन ने डॉ. विंध्यमणि त्रिपाठी के सुझाव पर विचार कर यह निर्णय लिया कि हमसे विलग हुए साथियों शुभ्रदीप, परमजीत, साहिल भारती, इस्लाम शालिक, शिव शंकर गुप्त एवं दयानंद सिंह मृदुल पर शीघ्र एक पुस्तक प्रकाशित की जाएगी। साथ ही प्रत्येक वर्ष साथियों की रचनाओं को एकत्र कर एक साझा संग्रह भी प्रकाशित किया जाएगा।
वक्तव्यों के बाद साथियों ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। अंत में दो मिनट का मौन रखकर हमसे बिछुड़े साथियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई तथा बैठक को अगली बैठक तक के लिए स्थगित कर दिया गया।
— डॉ. आर. डी. आनंद
जिला सचिव
प्रगतिशील लेखक संघ, इकाई फैजाबाद


