
लेनिनवा ससुर एक बहुत ही घटिया नजीर पेश करके मरा है, बाकी सब ठीक किया था
उच्च कोटि के प्रातः स्मरणीय सरयूपारीय ब्राह्मण और हमारा मोर्चा के कार्यकारी संपादक कामता प्रसाद तिवारी की कलम से
ई लेनिनवा ने हजार काम अच्छे किए, विश्व-मानवता को मुक्ति-पथ पर सरपट दौड़ाने का काम किया, लेकिन एक नज़ीर इसने बहुत ही वाहियात पेश की और उसी की वजह से क्रांति आगे नहीं बढ़ रही।
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पूरा-वक्ती कार्यकर्ता या पेशेवर क्रांतिकारी की जो बकवास इसने प्रस्तुत की उसे देश-काल निरपेक्ष मान लिया गया। सापेक्षता के सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाते बहुतेरे लखैरे-रंडीबाज-परजीवी-समलैंगिक भी कम्युनिस्ट बनकर सोसायटी की छाती पर मूंग दल रहे हैं। 1917 से पहले रूस में अपने लिए रोटी जुटाना ही अच्छा-भला काम था। खुद लेनिन किसानों के यहाँ श्रमदान किया करते थे। वे कत्तई मुफतखोर नहीं थे लेकिन हमारे यहाँ के हरामजादे---101 परसेंट कामचोर-मुफतखोर और गलीज़ हैं।
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कारण समझिए, मजदूर सारा दिन काम करता है लेकिन उसे अंदर से महसूस होता है कि यह काम उसका नहीं है। इसी एहसास को कहा जाता है अलगाव। अलगाव मतलब अपने काम से। और इस तरह से मजदूर अपनी जिंदगी से कटते चला जाता है। मज़दूर का उसके उत्पाद से अलगाव होता है, जिस चीज को वह बनाता है वह उसकी नहीं होती। फैक्टरी वर्कर मोबाइल असेंबल करता है लेकिन वही मोबाइल खरीदना उसके बूते का नहीं होता। मेहनत मजदूर की होती है फायदा ले जाता है सेठिया। प्रक्रिया से अलगाव, ऐसा काम जहाँ रचनात्मकता शून्य हो। रोज वही काम और बस टार्गेट-टार्गेट। इसे यूँ समझिए कि इतना पीस कपड़ा दिनेश शुक्ल जी बनाएंगे तो इतना पैसा मिलेगा।
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इंसान मशीन जैसा महसूस करने लगता है। काम जीने की खुशी नहीं रहता, बस जीने की मजबूरी बन जाता है। तीसरा है, खुद से अलगाव। जोशोखरोश मरने लगता है, रुचि खत्म हो जाती है। और इंसान बन जाता है सिर्फ सैलरी मशीन। चौथा है, दूसरों से अलगाव। सहकर्मी दोस्त नहीं लगते, हर कोई प्रतिद्वंदी नजर आने लगता है। पूँजीवाद में इंसान काम का मालिक नहीं रहता। बल्कि काम का नौकर बन जाता है। इसी हालत को मार्क्स ने अलगाव कहा है।
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अब जरा जेएनयू छाप ऐक्टिविस्टों की बात करते हैं। कॉलेजों-यूनिवर्सिटियों के लौंडे-लफाड़ी डफली बजाते हुए जो करते हैं, उसे कहते हैं गतिविधि और गतिविधि में मजा आता है। राजेश तिवारी जब कबड्डी खेलते हैं तो यह उनके आनंद का विषय होता है लेकिन अगर वे उतनी ही मेहनत किसी के खेत में मजूरी करने में लगाएं तो वह बन जाता है काम और काम करना किसी को भी अच्छा नहीं लगता।
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मेरी स्पष्ट समझ है कि काम करने वाले, अलगाव के शिकार मजदूरों को आंगिक बुद्धिजीवी बनना होगा और गांडूगीरी-रंडीबाजी में लिप्त कथित कम्युनिस्टों की गांड़ पर लात मारकर उनकी जगह खुद को नेतृत्वकारी स्थिति में लाना होगा। तभी क्रांति आगे बढ़ेगी। अभी के हालात यह हैं कि भाषणबाजी करने के उपरांत मुर्गा-भात खाने के जुगाड़ में लग जाता है हमारा पेशेवर क्रांतिकारी। वह मजदूरों के साथ तदनुभूति को कैसे महसूस कर पाएगा।
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लाल के लंगड़े लौंडे ने बुद्धिजीविता के क्षेत्र में झंडे गाड़ने के लिए अपने धृतराष्ट्र के नेतृत्व में जान लगा दी लेकिन क्रांतिकारी व्यवहार से कटा रहा और इस तरह से बना आत्म-मुग्ध मनोरोगी। कम्युनिस्ट होता तो मुकेश त्यागी को गरियाता नहीं। मुकेश त्यागी नामक भुंइहार हिंदी पट्टी का इकलौता बुद्धिजीवी है जो करेंट अफेयर्स पर कमेंट करके हम सभी को प्रबुद्ध बनाता रहता है। आप लोग ही तय करें कि ललाइन मुर्गा-भात खाने के अलावा मजदूरों को गोलियाने का ऐसा कौन सा काम कर रही है जिसे नोटिस में लिया जाए। उसने जिंदगी में कब अलगाव की पीड़ा सही है, कब मजदूरी की है।
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सुनने में आया है कि MLRO में कोई होल-टाइमर नहीं है, सब कमाकर खाते हैं और फिर क्रांति-कर्म में रत रहते हैं। अगर ऐसा है तो जिंदाबाद, अगर ऐसा नहीं है तो लानत है।
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समस्त निःसंतान जन लेनिन नहीं हो सकते। वात्सल्य का कोना अगर भरा न रहे तो इंसान अधूरा रहता है। मौके पर हमारे नाती हमारे पास नहीं हैं तो आप लोग देख सकते हैं कि महामहिम चीकू से हमारी कितनी दोस्ती है। हमारे ललवा ने समस्त संपत्ति अपने लंगड़े के खाते में दर्ज कराने के लिए बड़ी सफाई से अपने साढ़ुओं की मगजधुलाई की और उन्हें निपूंछ रखा। ---- तरस आता है, ऐसे मूर्खों पर।



