
डॉ. अलका प्रकाश, सहायक प्रोफेसर व कवयित्री
हिंदी साहित्य में आख्यान एवं स्मृतियाँ : एक शोधात्मक अध्ययन का हुआ वाचन, डॉ. अलका मिश्रा ने किया सत्र का संचालन
“आख्यान और स्मृति : कल, आज और कल” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन
संगोष्ठी का उद्घाटन वक्तव्य वरिष्ठ कथाकार एवं ‘तद्भव’ के संपादक अखिलेश जी द्वारा दिया गया। मुख्य अतिथि उच्च शिक्षा निदेशक बी. एल. शर्मा जी थे।

समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बद्रीनारायण (कुलपति, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस) तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में धनंजय सिंह (सदस्य सचिव, ICSSR) उपस्थित थे।
इस दो दिवसीय संगोष्ठी में देशभर के सम्मानित कवि, कथाकार, आलोचक, इतिहासकार और समाजविज्ञानी स्मृति और आख्यान के विविध आयामों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
इसके उप विषयों में भारतीय महाकाव्य और स्मृति, लोककथाओं और मौखिक परंपरा में सामूहिक स्मृति, स्त्री, दलित एवं वंचित समुदायों के आख्यान, विभाजन, विस्थापन और आघात की स्मृतियाँ, डिजिटल युग में स्मृति और नैरेटिव, पाठ्यक्रम, इतिहास लेखन और सत्ता की राजनीति जैसे अत्यंत समकालीन और विचारोत्तेजक विषय शामिल थे।
यह संगोष्ठी केवल अकादमिक चर्चा का मंच नहीं है, बल्कि यह स्मृति और आख्यान के माध्यम से समाज, इतिहास और वर्तमान की पुनर्व्याख्या का बौद्धिक प्रयास है।
संगोष्ठी के दूसरे दिन एक ऑनलाइन सत्र का आयोजन किया गया, जिसका संचालन प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) विश्वविद्यालय की सहायक प्रोफेसर डॉ. अलका मिश्रा ने किया। इस सत्र में पंद्रह प्रतिभागियों ने शोध-पत्रों का वाचन किया, जिसमें सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्र का वाचन मध्य प्रदेश की डॉ. आस्था राठौर ने किया। उनका विषय था — “हिंदी साहित्य में आख्यान एवं स्मृतियाँ : एक शोधात्मक अध्ययन”।
उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में आख्यान और स्मृति दो ऐसे केंद्रीय साहित्यिक उपादान हैं, जो व्यक्ति, समाज और इतिहास के जटिल संबंधों को अभिव्यक्त करते हैं। आख्यान जहाँ जीवन के अनुभवों को कथात्मक संरचना प्रदान करता है, वहीं स्मृतियाँ अतीत के अनुभवों को वर्तमान चेतना में पुनः सक्रिय करती हैं। आधुनिक साहित्यिक विमर्श में आख्यान और स्मृति केवल साहित्यिक विधाएँ न रहकर सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना के सशक्त माध्यम बन गए हैं। आख्यान जीवन की कथा कहता है, जबकि स्मृति उस कथा को ऐतिहासिक गहराई प्रदान करती है। इन दोनों के अंतर्संबंध से हिंदी साहित्य अधिक संवेदनशील, लोकतांत्रिक और वैचारिक रूप से समृद्ध हुआ है। भविष्य में भी आख्यान और स्मृतियाँ हिंदी साहित्य को नई दिशाएँ प्रदान करती रहेंगी।
जोरहाट, असम से जुड़ी हुई डॉ. क्लारा बाड़ा ने “शिवानी की कृतियों में प्रकृति-शैली और सामाजिक चेतना का अध्ययन” विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया। शिवानी हिंदी की प्रमुख लेखिका हैं, जिन्होंने उपन्यासों में प्रकृति-चित्रण और सामाजिक चेतना को विशेष स्थान दिया है। यह शोध-पत्र शिवानी की कृतियों में प्रकृति-शैली और सामाजिक चेतना के विविध पहलुओं का विश्लेषण करता है।
शिवानी की कृतियों में प्रकृति का चित्रण एक सशक्त साहित्यिक उपकरण के रूप में उभरता है। उन्होंने प्रकृति को मानवीय संवेदनाओं से जोड़कर एक नया आयाम दिया है। इस शोध से स्पष्ट होता है कि शिवानी की रचनाओं में प्रकृति केवल सजावट नहीं, बल्कि एक गहन भावनात्मक और प्राकृतिक तत्व है, जो उनके साहित्य को अमर बनाता है।
शिवानी की रचनाएँ केवल कहानियाँ नहीं, बल्कि समाज का आईना हैं। उन्होंने स्त्री-जीवन की पीड़ा, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि पाठक गहराई से सोचने पर मजबूर हो जाता है। उनका साहित्य न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि सामाजिक बदलाव की प्रेरणा भी देता है।
उनके साहित्य-सृजन का मुख्य उद्देश्य समाज के विभिन्न क्षेत्रों में फैली अराजकता, भ्रष्टाचार, अनाचार, कुरीतियों एवं विसंगतियों को आम जनता तक पहुँचाना और समझाना है। ऐसा साहित्य रचा जाए जो जनसाधारण को ऊपर उठाए। साहित्य आदर्शोन्मुख एवं यथार्थपरक हो, जिससे जन-समुदाय का कल्याण हो।
दिल्ली विश्वविद्यालय के शिवाजी कॉलेज से डॉ. बबली ने “पद्मावत : लौकिक से अलौकिक प्रेम की आख्यान-यात्रा” विषय पर अपने शोध-पत्र का वाचन किया। भारतीय ज्ञान-परंपरा से ही आख्यान-परंपरा फलीभूत हुई, जो वेदों, उपनिषदों और पुराणों से होते हुए भारतीय इतिहास को एक दृष्टि प्रदान करती है। आख्यान-परंपरा का मूल स्रोत ऋग्वेद को माना जाता है। हिंदी साहित्य में आदिकाल के रासो-काव्य ऐतिहासिक और काल्पनिक आख्यान हैं। मध्यकाल में सूफी कवियों के प्रेमाख्यानक काव्य तथा आधुनिक काल में मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, धर्मवीर भारती, मुक्तिबोध आदि के काव्य में आख्यानों के विभिन्न रूप देखे जा सकते हैं।
पद्मावत का केंद्रीय कथ्य प्रेम-तत्व की अभिव्यक्ति है। यह एक ऐसा प्रेमाख्यानक काव्य है जिसके केंद्र में नीरस शास्त्र नहीं, बल्कि प्रेम है — वही प्रेम जो गोपियों, मीरा और कबीर आदि कवियों में मिलता है। प्रेम के विराट स्वरूप की अभिव्यक्ति जायसी के पद्मावत में देखने को मिलती है, जो आख्यान का आधार बनती है।
अलीगढ़ के डॉ. नागेंद्र सिंह पटेल ने “अंधेरा कायम रहे : विशेष संदर्भ — तमस” विषय पर अपने शोध-पत्र का वाचन किया। उन्होंने कहा कि भारत में अंग्रेजों की शासन-पकड़ ढीली पड़ती देख अंग्रेज अधिकारियों ने अपनी पुरानी नीति ‘बाँटो और राज करो’ को और पुष्ट करते हुए धार्मिक अंधकार को कायम रखने की कोशिश की। ‘तमस’ उपन्यास इसकी अच्छी व्याख्या करता है।
मधुबनी, बिहार से ऑनलाइन माध्यम से जुड़े डॉ. दीपक त्रिपाठी ने “स्मृति का मिथकीय स्वरूप : दिनकर काव्य के संदर्भ में” विषय पर अपने शोध-पत्र का वाचन किया। उन्होंने कहा कि स्मृतियाँ मुख्यतः दो रूपों में व्यक्त होती हैं — इतिहास और मिथक। इतिहास जाग्रत चेतना का परिणाम होता है, जबकि मिथक हमारी अंतःचेतना का परिणाम होता है।
इसके साथ ही आशीष यादव, जितेंद्र कुमार, प्रतिज्ञा सिंह, ज्योति, प्रियंका सिंह, प्रियंका त्रिपाठी, मनोज कुमार, रेनू जैन, संजीव कुमार, रामेंद्र शर्मा और सूर्य प्रताप राघव आभासी माध्यम से सत्र के वक्ता रहे।
ऑनलाइन माध्यम का अध्यक्षीय वक्तव्य डॉ. अलका मिश्रा ने दिया तथा संयोजन श्रीमती ललिता देवी ने किया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. जगन्नाथ दूबे ने आभासी पटल पर संपन्न हुए सत्र की सराहना की।



