30 नवंबर 2025 को 02:36 pm बजे
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प्रकर्ष मालवीय ने कहा — गोपेश हमारे बीच एक लेजेंड की तरह

प्रकर्ष मालवीय ने कहा — गोपेश हमारे बीच एक लेजेंड की तरह

प्रयागराजः प्रगतिशील लेखक संघ प्रयागराज इकाई द्वारा अंजुमन रूह-ए-अदब में गोपीकृष्ण गोपेश के शताब्दी वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गोपेश शती आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम का आरम्भ प्रकर्ष मालवीय के वक्तव्य से हुआ।

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प्रकर्ष मालवीय ने अनुवाद की महत्ता पर बोलते हुए कहा कि स्मृतिशेष गोपेश जी अपने किस्सों, संस्मरणों और व्यापक साहित्यिक कार्यों के माध्यम से आज भी हमारे बीच हैं और अब हमारे लिए किसी लेजेंड जैसे हो गए हैं। उन्होंने कहा कि गोपेश कवि, गीतकार, कहानीकार होने के साथ सबसे बढ़कर अनुवादक थे। उन्होंने माना कि परिवार और समाज के प्रति उनका दायित्वबोध इतना व्यापक था कि उस पर अलग से एक गोष्ठी की जा सकती है। पर आज उस पुस्तक के माध्यम से वे विमर्श के केंद्र में हैं।

प्रकर्ष मालवीय ने आगे कहा कि इन कहानियों में बदलाव का फूहड़ प्रोपेगंडा नहीं मिलता बल्कि बेहद सहज तरीके से पाठक सामाजिक परिवर्तन से परिचित होता है। इस परिवर्तन में आम जन का समर्पण और प्रयास भी दिखाई देता है।

इसके बाद पद्मा सिंह ने ‘प्राणी प्राणी की माँ’ शीर्षक के उपन्यास पर बोलते हुए कहा कि एक ओर युद्ध परिवारों को तोड़ देता है तो दूसरी ओर नए पारिवारिक ढाँचे उभरते हैं। उन्होंने कहा कि कहानियों में सौंदर्यबोध की भाषा बोलती है और श्रम की प्रतिष्ठा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

सुरेंद्र राही ने कहा कि क्रांति के बाद मानवीय संबंध विकसित हुए। बौद्धिक स्तर पर समस्याओं को हल करना आसान होता है, पर सामाजिक स्तर पर यह कठिन होता है। उन्होंने कहा कि गोपेश का अनुवाद मात्र अनुवाद नहीं है बल्कि उन्हें पढ़ते हुए वह मौलिक रचना जैसा प्रतीत होता है — यही उनकी विशेषता है।

मुख्य वक्ता प्रणय कृष्ण ने कहा कि “गोपेश ने संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित किया।” उन्होंने स्पष्ट किया कि ये कहानियाँ दूसरी दुनिया की इसलिए कही गईं क्योंकि पहली दुनिया पूँजीवादी देशों की थी और दूसरी दुनिया वे राष्ट्र थे जहाँ समाजवादी सत्ता स्थापित हुई। ये कहानियाँ उसी दूसरी दुनिया की उपज हैं। उन्होंने बताया कि फ़ातिह नियाज़ी मूलतः उज़्बेक थे लेकिन कज़ाक भाषा में उन्होंने महारत हासिल की और उसमें रचनाएँ कीं। उन्होंने कहा कि ये कहानियाँ अब ऐतिहासिक दस्तावेज़ जैसी हो गई हैं।

प्रणय कृष्ण ने ज़ोर देकर कहा कि रूसी क्रांति ने जो उपलब्धियाँ दीं, उन्हें वापस नहीं किया जा सकता। आज रूस वैश्विक पटल पर एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में खड़ा है तो उसके पीछे क्रांति का योगदान है। दुनिया भर में शोषण से मुक्ति के स्वप्न की प्रेरणा सोवियत अनुभव से आई। उन्होंने कहा कि इन कहानियों में सामूहिकीकरण का वह चेहरा नहीं मिलता जैसा पश्चिमी अकादमिक विमर्श में प्रस्तुत किया जाता है। इतिहास की विफलताएँ भी सिखाती हैं — इन्हीं कहानियों में स्त्री मुक्ति का स्वप्न भी दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के बिना समाजवाद अभिशप्त है।

अनिता गोपेश ने बताया कि इस पुस्तक में कहानियों का चयन उन्हीं का है। ला मिज़रेबल का अधूरा अनुवाद बाद में डा. लाल बहादुर वर्मा ने पूरा किया। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद एक आत्मीय शहर है और सबके सहयोग से यह शती आयोजन संभव हो सका। उन्होंने यह भी कहा कि संकलित उपन्यास अपेक्षाकृत कम पढ़ा गया है, इसपर और विमर्श होना चाहिए।

अध्यक्ष प्रो. हेरंब चतुर्वेदी ने कहा कि ये अनुवाद भारतीय बिंबधारा के साथ किए गए हैं। हर क्रांति पूर्व की क्रांति से जुड़ती है। उन्होंने कहा कि रूस और रूसी समाज को समझने के लिए यह पुस्तक अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। समाज में आमूलचूल परिवर्तन संस्थाओं द्वारा ही संभव होता है। भारतीय संस्कृति पर गोपेश की पकड़ आश्चर्यजनक थी, इसलिए वे ऐसा अनुवाद कर सके। उन्होंने कहा कि पुस्तक को छपने में बहुत समय लगा, इसे बहुत पहले आ जाना चाहिए था। अंत में उन्होंने कहा कि इन अनुवादों का प्रभाव दूर तक जाएगा।

कार्यक्रम का संचालन संध्या नवोदिता और धन्यवाद ज्ञापन अमरजीत राम ने किया।

कार्यक्रम में उपस्थित रहे —
प्रो. अली अहमद फातमी, आनंद मालवीय, सुनील शुक्ला, प्रो. रतन कुमारी वर्मा, प्रियदर्शन मालवीय, शिरीष गोपेश, शिशिर गोपेश, स्नेह लता, कृष्ण शंकर मिश्र, सुनील कुमार सुशांत चट्टोपाध्याय, वकार आलम, विवेक सुल्तानवी, मनीष कुमार, चन्द्रबली कुशवाहा, सुमन, विभु गुप्त, वंदना गुप्त, सचिन गुप्ता, शिवम चौबे, सुधीर क्रान्तिकारी, शाश्वत गोपेश, केशव गौड़, अरूप आर्यन, अभिषेक, शशि भूषण, प्रदीप पार्थिव, आदि।
दो छोटे बच्चे अलंकार और गोरी भी अंत तक उपस्थित रहे।

रिपोर्ट : प्रकर्ष मालवीय
फोटो : अमरजीत, आर्यन, संध्या नवोदिता