
चलो रोहिंग्या मुसलमानों को लठियाया जाए, जबकि पूँजीवाद में पैदा हो चुके हैं नरमांसभक्षी
कामता प्रसाद, कार्यकारी संपादक
अपेक्षाकृत संभ्रांत और तनिक खाते-पीते घर की स्त्री-बच्ची के विरुद्ध अपराध होने पर बहुतेरी अगिया-बैताली "रंडियां" योगी-मोदी को घेरने के लिए सड़कों पर उतर पड़ती हैं। राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपे जाते हैं। चिरकुट पत्रकारों को खबर लिखने के लिए मसाला मिल जाता है। ज्ञापन लेने वाले अधिकारी की भी फोटो छपती है और वह भी गच्च हो जाता है। शाम ढलते-ढलते सब सामान्य हो जाता है। अगिया-बैताली "रंडियां" दारू-मुर्गा पार्टी करती हैं।
केरल में जीबी रोड जैसा रेड लाइट एरिया नहीं है लेकिन प. बंगाल में तो सोनागाछी है, जहाँ पर दशकों तक कथित कम्युनिस्टों का राज रहा है। CPI-M के बैनर तले लाल झंडा उठाने वाले अगर कम्युनिस्ट होते तो स्त्री-शरीर को खरीदे-बेचे जाने की प्रथा पर पर जरूर सवाल उठाते लेकिन वे तो मानव-योनि में पैदा हुए सूअर थे और हैं जिन्हें बस संसद-विधानसभा की गद्दीदार कुर्सियों पर बैठना है।
इसी तरह से बिहार में कई शहरों और जिलों में रेड लाइट एरिया मौजूद हैं क्या लिबरेशन मार्का कम्युनिस्ट कहेंगे कि उन्होंने गोचर वेश्यावृत्ति को खत्म कराने और उनके पुनर्वास के लिए कोई आंदोलन छेड़ा, जबकि ये हराम के जने सूअर की औलादें वहाँ सरकार में भी शामिल रह चुके हैं। क्या नेहरू राज में या शीला दीक्षित के जमाने में जीबी रोड का रेड लाइट एरिया नहीं था?
जिन्हें न पता हो उन हरामी के पिल्लों के लिए लिख रहा हूँ, चीन में माओकालीन कम्युनिस्ट पार्टी ने समस्त रंडियों की डोलियां उठवा दी थीं। सोवियत संघ में हर स्त्री अपनी संपूर्ण मानवीय गरिमा के साथ जी रही थी, वह श्रमजीवी थी, देहजीवी नहीं।
अभी कल ही फेसबुक पर मैं एक एनजीओ वाली की बात सुन रहा था। कोठे पर जाने वाले विकृत मानस वहाँ की रहवासिनों को कई बार मार तक डालते हैं। भाँति-भाँति का वीभत्स उत्पीड़न तो आम बात है। रहन-सहन की नारकीय स्थितियों पर कुछ न कहा जाए तो ही ठीक है। पंचसितारा होटलों में भिखारी, कूड़ा बीनने वाले लड़कों के साथ कुकर्म किया जाता है। हिलेरी क्लिंटन जैसों के नरमांसभक्षी होने की बात सामने आ चुकी है।
वज्र कठोर मार्क्सवादी के रूप में हम तो नारा देते हैं कि दुनिया के मजदूरों एक हो और हमारे अंशू पाठा हमें लाठी थमाना चाहते हैं कि चलो रोहिंग्या मुसलमानों को लठियाया जाए। खैर, यह तो मजाक हुआ। आज पूँजीवाद मनुष्यता के भारी हिस्से को सड़ा-गला रहा है। संपत्ति का कुछ हाथों में संकेंद्रण कैंसर के नानाविध रूपों को जन्म दे रहा है, जिसमें मनुष्यता के अंग-प्रत्यंग कट-कटकर चू रहे हैं।
तो हे अगियाबैताली "रंडियों" अगली बार जब बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ नारे की आड़ में योगी-मोदी पर हमला बोलने मैदान में उतरना तो चंद सिक्कों की खातिर बेचे जाने वाले मानव-शरीर का भी ख्याल कर लेना और अपनी पूरी लड़ाई को किसी उन्नाव-पीड़िता को न्याय दिलाने से आगे ले जाकर समस्त मानव-जाति की मुक्ति की लड़ाई से जोड़ना और हाँ इसके लिए राष्ट्रपति को ज्ञापन देने जाने की कोई जरूरत नहींं, क्योंकि चकलाघर पुलिस-सरकार की जानकारी में चलते हैं और वजह यह है कि पूँजीवाद अब मनुष्यता को कुछ भी सकारात्मक नहीं दे सकता।
युद्ध होता है पुल-अस्पताल ध्वंस होते हैं फिर नए के निर्माण का ठेका दिया जाता है लेकिन मानव जीवन नष्ट हो रहा है और हम मानववादी हैं तो बहुत जरूरी हो गया है कि पूँजीवाद को उखाड़कर समाजवाद के लिए संघर्ष किया जाए और योगी-मोदी को निशाने पर लेने की बजाय व्यवस्था को निशाने पर लिया जाए। कांग्रेस और राहुल गाँधी अल्ला मियां के अवतार नहीं, वे भी उतने ही कुत्सित और गलीज़ हैं।
शराब व भाँति-भाँति के नशों के चलते व्यक्तित्व के विघटन के शिकार, बचपन में यौन शोषण के शिकार मनुष्य जब अपनी पारी में इंसानियत खोकर हैवान बन जाएं तो हैरत कैसी? बचपन बचाएं-इंसानियत बचाएं और समाजवाद के लिए संघर्ष को तेज करें।
आज खाने-पीने की समस्त चीजों में मिलावट की खबरें आती रहती हैं, अनाज-सब्जियाँ दूषित हैं। यह सब सदुपदेश से ठीक होने वाला नहीं, निगरानी और स्टैंप से भी कुछ नहीं बदलेगा। उपाय एक ही है कि सब कुछ मानव समाज की जरूरत के लिए संगठित किया जाए, मुनाफे के लिए नहीं तभी दिल्ली की यमुना का जल स्वच्छ होगा। तभा इको-सिस्टम दुरुस्त होगा और गौरैया को पीने के लिए जल मिलेगा।



