
पार्टी के सौवें बरस का जश्न और इति~ सुमन्त

सौ बरस की हो गयी मेरी पार्टी और तुम न रही मेरी प्यारी बेटी
इस दुनिया में अब इस दुनिया को बदलने की लड़ाई में मैने जो दुनिया बसायी थी
उसकी आखिरी क्यारी थी तुम सबकी आंखों का तारा,
सबसे प्यारी थी तुमयह समझ पार्टी ने ही मुझे दी थी कि दुनिया को बदलने की लड़ाई से जुदा नहीं है
खुद की दुनिया को संवारना एक आदर्श कम्युनिस्ट होने का अर्थ ही है
तमाम दुनिया को एकसार करके एक अनुपम राग तैयार करना
अलग अलग नहीं, एक ही बहाव में बहना मैने खुद की एक दुनिया बसा कर अपनी सीमा तय नहीं कर ली थीं
बल्कि उस क्षुद्र धारा की तरह खेतों खलिहानों से होते हुए महानद में समा कर जैसे हर सीमाओं को तोड़ने की असीम ताकत अपनी छाती में भर ली थीं
बेटी, तुम उस ताक़त की अटूट हिस्सा थीमेरे संघर्षों की अहा, तुम अप्रतिम क़िस्सा थी तुम थी तो तुमने जाने कैसे कैसे रंग भरे थे तुम्हारी कलम/कूचियों के दम सेजन संघर्षों के क़िस्से खूब हरे थे
तुम थी एक चंचल दरिया जिसमें पांव धरो तो सिहरन हो जाये
फिर पल भर में मन भर जाये ऐसे जैसे कोई हिरनी आकर गोदी में सो जाये तुम न रही तो एक बारगी लगा पूरी दुनिया खतम अब पार्टी वार्टी क्या है दर्द के अथाह गह्वर में हज़म सब मगर, थोड़ा थिर होकर जब मैने तुम्हारी कृतियों का ध्यान किया
अपने नाम को एक नया अर्थ देने की खातिर तुम्हारी लाजवाब उक्ति का संज्ञान लिया :"इति का अर्थ अंत नहीं, एक नया आरंभ है"तो मैं एक नये तेज से भर उठा मुब्तिला हूं मैं पार्टी के सौवें बरस के जश्न में और तुम्हारी बातों की तरक़ीब ए हुस्न में।



