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मज़दूर राज की जरूरत को रेखांकित करती एक जरूरी पहल, आयोजकों को पहुँचा लाल सलाम
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मज़दूर राज की जरूरत को रेखांकित करती एक जरूरी पहल, आयोजकों को पहुँचा लाल सलाम

December 31, 2025
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साहित्य और श्रम. साहित्य का श्रम से क्या सम्बन्ध है? आज हिंदी साहित्य की मुख्यधारा के परिदृश्य से ऐसे प्रश्न गायब हैं। यह देखा जाता है कि ऐसे प्रश्न पूछने पर उसका या तो घुमा फिराकर उत्तर मिलता है या फिर श्रम के प्रश्न को ‘राजनीतिक प्रश्न’ कहकर ख़ारिज कर दिया जाता है। साहित्य को मूलतः ‘सौंदर्यबोध’ का सेवक बना दिया गया है। साहित्यकार अभिजन और गणमान्य हैं। पिछले दिनों हिंदी साहित्य के इसी संकट को संबोधित करने के लिए ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता के संतोष और वरिष्ठ लेखक रणेन्द्र जी ने मिलकर एक अलहदे कार्यक्रम की परिकल्पना की। जिसका प्रारूप कुछ यूं था – दिल्ली में एक ऐसी दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की जाए, जिसमें मुख्य वक्ता हों भिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक, मजदूर कार्यकर्ता, घरेलू कामगार, गिग वर्कर्स आदि और श्रोता हों हिंदी के लेखक। इसी क्रम में गत 27 और 28 दिसम्बर को यह कार्यशाला दिल्ली के हरकिशन सिंह सुरजीत भवन में आयोजित की गई। इस कार्यशाला में गुड़गांव और मानेसर में मारुति आंदोलन में शामिल और निलंबित कर्मचारियों जैसे साथी खुशी राम, सरबजीत, सतीश और अजीत ने हिस्सा लिया। घरेलू कामगारों के संगठन से साथी श्रेया, उबर ड्राइवर साथी नरेश, भट्ठे पर काम करने वाली साथी निशू ने भी हिस्सा लिया। इन सभी साथियों ने विस्तार से काम के अपने अनुभव, अपने जीवन संघर्ष, आर्थिक कठिनाइयों, मारुति में आंदोलन, यूनियन बनाने के संघर्ष, जेल के अनुभव और उसके बाद हासिल हुए सामाजिक और सांस्कृतिक समझ को लेखकों के सामने प्रस्तुत किया। दो दिन तक चली इस कार्यशाला में श्रमिक साथियों के जीवन अनुभव, आंदोलनों और जेल के अनुभव सुनना श्रोताओं के लिए निश्चय ही एक आँखें खोलने वाला अनुभव था। यह अनोखी परिकल्पना लेखकों को आम जीवन के थोड़ा और करीब लाने की एक पहल थी जिसमें यह दो दिन लेखकों को कई वर्षों की परियोजनाओं और विचारों का एक प्लेटफॉर्म दे दिया। साहित्य एक ऐसी चीज है जिसका मूल उद्देश्य सदा ही जनोन्मुख होना रहा है। अगर साहित्य और संस्कृति जनता और उसके संघर्षों से कटकर शब्दाडंबर भर रह जाए तो इसमें कोई बहुत आश्चर्य नहीं कि ऐसे समाज पर एक दिन अधिनायकवादी और पुरातनपंथी लोगों का वर्चस्व हो जाए।श्रम साहित्य से भिन्न विषय नहीं है। श्रम साहित्य का हिस्सा है। श्रम हर जगह है। हमारे जीवन के हर पहलू में श्रम है। हम जो कपड़े पहनते हैं, वे भी किसी के श्रम का परिणाम हैं। जो हमारे लिए खाना बना रहा है, वह भी श्रम है फिर श्रम का ऐसा अवमूल्यन क्यों? उद्योगों और कॉरपोरेट ने श्रम का अवमूल्यमन तो किया ही है, साहित्य ने भी इसमें जाने अनजाने में योगदान दिया है। अगर हम एक बेहतर संसार का सपना भी देखना चाहते हैं तो लेखकों को वापस श्रम की महत्ता को स्वीकार करना होगा, उसे समझना, जीना और अभिव्यक्त करना होगा। हम आम जीवन की अभिव्यक्ति को कब तक एक्टिविज्म के नाम पर ख़ारिज करते रहेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम साहित्य और संस्कृति के बृहद उद्देश्यों से काटने के सत्ताई अभियान का चाहे अनचाहे हिस्सा बन रहे हैं? कार्यक्रम में मजदूर साथियों और कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त हिंदी के कई लेखक जैसे रणेन्द्र कुमार, कविता, पंकज मित्र, अरुण असफल, रश्मि रावत, राही डूमरचीर, तनुज कुमार, विभांशु कल्ला, विनीत तिवारी, श्यामवीर, कैफ़ी हाशमी, आशु वर्मा, भारती, दिगम्बर, आदित्य शुक्ला, अनुपम सिंह, सविता सिंह, अदनान कफ़ील दरवेश, आदि शामिल रहे। अर्थशास्त्री जया मेहता ने भी कार्यक्रम में शिरकत की। कम से कम कार्यक्रम में उपस्थित लेखक तो यह जरूर कहेंगे कि उन्होंने इन दो दिनों में इस दुनिया के कई ऐसे रंग देखे जो उनके लिए अब तक अनदेखा था। ये अनुभव सिर्फ़ लफ्फाजियां नहीं हैं बल्कि ऐसा यथार्थ हैं जिसके सामने कई बार लेखकों के अपने अनुभव बौने साबित होते हैं। ये अनुभव लेखकों को अपने आस पास देखने के लिए ललकारते हैं लेकिन इसके पीछे कोई विचारधारात्मक मजबूरी नहीं बल्कि एक मानवीय चेतना है – हर लेखक यह जानता है कि उसका लेखन समाज से लिया हुआ ऋण है। ऐसे में वह कम से कम इतना तो कर ही सकता है कि समाज को पूर्णता में देखने का यत्न करे, अपनी सीमाओं की पड़ताल करे, खुद को ही चुनौती दे और समाज की पीड़ाओं को अधिक से अधिक अभिव्यक्त करे। उपस्थित लेखक इस बात की तस्दीक करेंगे कि इस कार्यशाला ने उन्हें समृद्ध किया है। उम्मीद है ये पहल भविष्य में इसी शिद्दत से जारी रहेगी और ऐसे अन्य दूसरे पहल भी दिखाई देंगे। ये पहल हमारी आज की मुश्किल होती जा रही दुनिया को समझने और उससे जूझने की एक साझी समझ विकसित करने की पहल है। इस ऐतिहासिक आयोजन की परिकल्पना के लिए साथियों को ढेरों मुबारक।

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एक जमाना था जब जनता के साहित्यकार बुनियादी उत्पादक वर्गों, यानी मजदूरों और किसानों की जिंदगी से जुड़कर उनकी जिंदगी के सुख-दुख, आशा-आकांक्षा, संघर्ष के अनुभव लेकर साहित्य सृजन करते थे। लेकिन आज के दौर में यह दुर्लभ प्रतीत हो रहा है। यही वजह है कि एक तरफ साहित्यकार पाठकों के अभाव का रोना रोते हैं तो दूसरी तरफ मेहनतकश वर्ग और उनके साथ जुड़े संगठनकर्ता अपनी जिंदगी की हकीकत को मौजूदा साहित्य में तलाश करके निराश होते हैं।ग्रामशी ने जिन्हें आवयविक बुद्धिजीवी कहा था और माओ ने क्रांतिकारी बुद्धिजीवी, वैसे लोग किसान मजदूर संगठनकर्ता के रूप में तो हैं, लेकिन रचनाकार के रूप में उनका दर्शन दुर्लभ है।श्रम और साहित्य के बीच की इस दूरी को पाटने के उद्देश्य से दिल्ली के सुरजीत भवन में दो दिनों का एक कार्यक्रम हुआ, जिसमें साहित्य सृजन और बुनियादी उत्पादन में लगे कुछ लोगों के बीच अंतरंग बातचीत हुई।इस संवाद में संगठित और असंगठित मजदूर और उनके संगठनकर्ताओं में साहित्यकारों के साथ अपने जीवन की कठिनाइयों, उम्मीद, सपनों और संघर्षों की दास्तान साझा किया। इनमें मारुति सुजुकी और अन्य औद्योगिक क्षेत्र के जुझारू मजदूरों के अलावा ईंट भट्ठा मजदूर, निर्माण मजदूर, खेतिहर मजदूर, घरेलू नौकरानी, सेवा क्षेत्र के कामगार और उनके बीच संगठन का काम करनेवाले लोग शामिल थे। साथ ही, मजदूरों के खिलाफ बनाई गई नीतियों और उनके राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्येता कार्यकर्ताओं और मजदूर वर्ग के हित में पुस्तक प्रकाशन में लगे साथियों ने भी अपनी बात रखी।इस बेहद जरूरी पहल की रूपरेखा साथी रणेन्द्र ने बनाई और साकार करने वालों में कुछ मजदूर संगठनकर्ताओं के अलावा साथी संतोष की अग्रणी भूमिका रही। इसी दौरान दो किताबों का विमोचन भी हुआ -- गार्गी प्रकाशन से आयी रणेन्द्र की पुस्तिका "लोक, शास्त्र और सांस्कृतिक वर्चस्व" तथा पल्लव के संपादन में निकालनेवाली बनास जन पत्रिका का पंकज मित्र पर केंद्रित ताजा अंक।इस कार्यक्रम में रणेन्द्र, संतोष, पंकज मित्र, श्रीधर करूणानिधि, अरुण असफल, रश्मि रावत, कविता, राही डूमरचीर, तनुज, आदित्य, विभांशु कल्ला, विनीत तिवारी, श्यामवीर, कैफ़ी हाशमी, आशु वर्मा, विक्रम, भारती राजन, दिगम्बर, निशु, रेनू, जैनब, खुशी राम, श्रेया, सिद्धांत, स्वाति, ऋचा, और कई अन्य साहित्यकार, मजदूर और संगठनकर्ता शामिल हुए।