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मनरेगा में प्रस्तावित बदलाव के खिलाफ वाराणसी में प्रदर्शन
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मनरेगा में प्रस्तावित बदलाव के खिलाफ वाराणसी में प्रदर्शन

December 19, 2025
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संपादकीय टिप्पणीः मनरेगा कानून किसके इशारे पर बदला जा रहा है। एकाधिकारी वित्तीय पूँजी को लाभ पहुँचाने के लिए और लाभेतर संगठनों को वित्तपोषण कहाँ से प्राप्त होता है, इन्हीं इजारेदार पूँजीपतियों से। तो मुंसिफ भी वही, मुद्दई भी वही और गवाह भी वही। लेकिन, सजा किसको मिलेगी--- आम मेहनतकश जनता को। ------------------कहा-बताया और माना जाता है कि ऐसा विरोध-प्रदर्शनों की जनता किराए पर लाई गई होती है। कम से कम LIU के हमारे भाई साहब लोग तो यही प्रचारित करते हैं और मुझे तो उनकी बातों में सच्चाई मालूम पड़ती है। इस तरह से विरोध का स्वांग रचने से सत्ता पर काबिज लोग तो भयभीत होने से रहे और हमारी नंगी-भूखी जनता को थोड़ा मनोरंजन और थोड़ा नजराना मिल जाए तो वह भी खुश। ------------पर यहाँ असल सवाल तो उन लोगों से बनता है जो क्रांति के विज्ञान से परिचित हैं, कहाँ हो भाई और कर क्या रहे हो?

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बनारसः मनरेगा कानून में प्रस्तावित बदलाव के विरोध में आज शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025 को साझा संस्कृति मंच के नेतृत्व में वाराणसी के शास्त्री घाट, वरुणापुल कचहरी पर एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। इसके बाद मजदूरों, किसानों और महिलाओं ने रैली निकालकर जिला मुख्यालय तक मार्च किया और राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी, वाराणसी के माध्यम से सौंपा गया।

भारी जनाक्रोश का गवाह बनता बनारस।

भारी जनाक्रोश का गवाह बनता बनारस।

जनसभा में वाराणसी के ग्रामीण इलाक़ों से आए मज़दूर, किसान, महिलाएँ, मेहनतकश जनता और शहर के विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में शामिल हुए। सभा के दौरान मनरेगा का नाम बदलकर उसके अधिकार-आधारित स्वरूप को खत्म करने वाले प्रस्तावित विधेयक के खिलाफ मज़दूर-विरोधी बिल की प्रतियां जलाकर कड़ा विरोध दर्ज कराया गया।

सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि वर्षों के संघर्ष के बाद बना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा, 2005) कोई साधारण योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण और हाशिये पर खड़े समुदायों का संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। इसे कमजोर या समाप्त करने का प्रयास ग्रामीण भारत को गंभीर संकट में डाल देगा और यह सामाजिक सुरक्षा, रोज़गार तथा संविधान प्रदत्त अधिकारों पर सीधा हमला है।

वक्ताओं ने बताया कि कोविड-19 जैसी आपदा के दौरान मनरेगा के तहत 389 करोड़ व्यक्ति-दिवस का रोज़गार सृजित हुआ, जिसने लाखों परिवारों को भुखमरी से बचाया। आज इस कानून को कमजोर करने की कोशिश चंद पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने और महात्मा गांधी के नाम, विचार तथा ऐतिहासिक संघर्ष को मिटाने की तानाशाही साज़िश है।

सभा में यह भी कहा गया कि प्रस्तावित VB-G RAM G बिल मनरेगा की मूल भावना के विपरीत है। जहाँ मौजूदा कानून में काम की माँग के अनुसार संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं, वहीं नया विधेयक रोज़गार को सीमित बजट और केंद्र सरकार की अधिसूचना तक बाँध देता है। इससे सार्वभौमिक रोज़गार गारंटी खत्म होकर यह एक रहम-आधारित योजना बन जाएगी।

वक्ताओं ने चिंता जताई कि 26 करोड़ से अधिक पंजीकृत और 12.6 करोड़ सक्रिय मजदूरों को प्रभावित करने वाला यह बिल बिना मजदूरों, ट्रेड यूनियनों, ग्राम सभाओं और राज्य सरकारों से सार्थक लोकतांत्रिक परामर्श के लाया गया है, जो संविधान की भावना और 73वें संविधान संशोधन के भी खिलाफ है।

ज्ञापन में प्रमुख मांगें रखी गईं, जिनमें मनरेगा में महात्मा गांधी का नाम यथावत रखने, नए विधेयक को संसद की स्थायी समिति के पास भेजने, अधिसूचना के जरिए काम के क्षेत्रों को सीमित करने की व्यवस्था खत्म करने, खेती के मौसम में 60 दिन के “ब्लैकआउट पीरियड” को हटाने, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण को अनिवार्य न बनाने और पंचायतों की स्वायत्तता बहाल करने की मांग शामिल है।

जनसभा और मार्च के दौरान तख्तियों पर “मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम नहीं हटेगा”, “रोज़गार गारंटी लागू करो”, “मनरेगा का बजट बढ़ाओ”, “लेबर लॉ में बदलाव बंद करो”, “किसान-मज़दूर विरोधी फैसले वापस लो” जैसे नारे लिखे गए, जो चर्चा का केंद्र रहे।

इस कार्यक्रम में आशा राय, अनिता, सोनी, मनीषा, रेनू सरोज, वंदना, संजीव सिंह, पूजा, झुला रामजनम, अफलातून, डॉ. आनंद प्रकाश तिवारी, नंदलाल मास्टर, रामधीरज, एकता, रवि, संध्या सिंह, धनंजय, रौशन, शाश्वत, जितेंद्र, ईश्वर चंद्र, अर्पित दिवाकर, राजेश, सपना, सूबेदार, गौरव, सुमन, सीमा, रुखसाना, निशा, संतोष, सुरेश, मुस्तफा, नीति पंचमुखी सहित सैकड़ों मेहनतकश लोग शामिल हुए।

प्रेषक:
नंदलाल मास्टर
साझा संस्कृति मंच, वाराणसी
संपर्क: 9415300520

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