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आप मज़दूरों के बीच अगर वक्त नहीं गुजारेंगे तो सरकार द्वारा पेले जाने पर मध्य-वर्ग ही तो चिल्ल-पों मचाएंगा, क्यों सत्यम?
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आप मज़दूरों के बीच अगर वक्त नहीं गुजारेंगे तो सरकार द्वारा पेले जाने पर मध्य-वर्ग ही तो चिल्ल-पों मचाएंगा, क्यों सत्यम?

May 19, 2026
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चीकू सिंह बुंदेला उर्फ दुलरू की कलम से

खाते-पीते घर का होना और बेहतर दुनिया-समाज की चाहत रखना कोई अपराध नहीं है। दिन में बढ़िया साहित्य पढ़ना, लच्छेदार भाषण देना और शाम को वाइन पीना और पियानो बजाना माने कुछ-कुछ कल्चरल ऐक्टिविस्ट जैसा होना भी आपको कत्तई अपराधी नहीं बनाता है। सत्यम वर्मा के बाप प्रो. लालबहादुर वर्मा से मेरा भी प्रत्यक्ष परिचय रहा है। बाप-बेटा दोनों ही नागरिक के तौर पर अच्छे इंसान रहे हैं लेकिन मज़दूर वर्ग के किस काम के।

अभी हाल ही में बनारस में कुछ लखैरे मिलकर RCLI से संबद्ध लता नामक झारखंड की एक कार्यकर्ता की अगुवाई में सत्यम वर्मा 'उगाही' मंच के बैनर तले योगी-मोदी को गरिया रहे थे। मुझे बनारस आए हुए 8-9 साल हो गए। यहाँ पर संशोधनवादी-अंबेडकरवादी-एनजीओवादी लखैरों के अलावा खलिहर ऐक्टिविस्टों की अच्छी-खासी तादात पाई जाती है, जिनके अनुयायियों की संख्या कमोबेश शून्य है।

एकमात्र BSM ही सच्चे अर्थ में कम्युनिस्ट संगठन है लेकिन नामालूम क्यों मजदूर आबादी में अपनी पैठ बनाने में वे लोग भी नाकाम रहे हैं। सत्यम वर्मा और उनके बापू जिस खाते-पीते मध्यवर्ग की नुमाइंदगी करते रहे हैं, उसके बारे में सरकार को भलीभाँति पता है कि वह उसकी नीतियों का लाभुक और समर्थक है, तो लोड लेने की जरूरत नहीं। RCLI तो मजदूरों की बात करती है और कई बरसों से इलाहाबाद-बनारस में उसकी मौजूदगी रही है तो 100-50 मजदूर भी क्यों शास्त्रीघाट पर जमा नहीं होते हैं। कारण जाहिर सा है, उनके बीच कभी किसी ने काम ही नहीं किया। अब किसी का नाम क्या लूँ, जो खुद कमाकर अपना पेट नहीं भर सकते, वही हर तरह के अन्याय का प्रतिकार करने के लिए मुस्तैद पाए जाते हैं।

जनमित्र न्यास के श्री लेनिन रघुवंशी कहते हैं कि यूरोप का मानस अलग ढब-ढर्रे का है, वहाँ सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी और इच्छाशक्ति का लेवल ही अलग है जबकि एशियाई मुल्कों में अगर कोई लौंडा पढ़ाई-लिखाई के दौरान लाल बंदरों की लपेट में आ गया तो वे हरामजादे उसे किसी लायक नहीं छोड़ते। वह लखैरा ही बनेगा, इसकी कमोबेश 99 परसेंट गारंटी होती है। अब ऐसा भी नहीं है कि वे ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल की ग्राम्शीशियन अवधारणा से परिचित नहीं है। रघुवंशियों के यहाँ जन्मे और वैद्यकी की औपचारिक शिक्षा पाए डॉ. लेनिन कहते हैं कि कई साल मजदूर के रूप में गुजारने के उपरांत विचारधारा से लैस होकर जब कोई समूह पूर्णकालिक क्रांतिकारी बनेगा, तभी इस देश में मजदूर आंदोलन परवान चढ़ सकेगा। इन मध्यवर्गीय चोट्टों से मजदूर वर्ग को कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

सुल्तानपुर की पावन धरती पर अवतरित हुए इंटरनेशनल लेवल के इतिहासकार डॉ. मोहम्मद आरिफ फरमाते हैंः पहले मैं इस तरह के विरोध-प्रदर्शनों में चले जाया करता था लेकिन अब मैं बचता हूँ। देश-प्रदेश में जिस तरह का राजनीतिक माहौल है, उसे देखते हुए यह कत्तई सुरक्षित नहीं है कि मजदूरों की सघन गोलबंदी के बिना इंकलाबी हुआ जाए। सरकार कब और किस तरह से पेलने पर उतर आए, कहा नहीं जा सकता। चार ठो लखैरे विरोध प्रदर्शन करके और राष्ट्रपति के नाम संबोधित ज्ञापन किसी एसडीएम को देकर का उखाड़ लेंगे। उन्होंने सरकारी मास्टरों से भी सावधान रहने को कहा कि अति-क्रांतिकारिता आज के दौर में व्हेल मछलियों के समूह में खुदकुशी करने जैसा है। वह कहते हैं कि पहले इंतजार करो कि खुद उसके अपने बीच से निकले नेताओं की अगुवाई में मजदूर आंदोलन परवान चढ़े। वर्ना तो बहुतेरे छिनरे, भँड़वे, समलैंगिक और पुरुष-वेश्या कम्युनिस्ट नेता बने फिर रहे हैं और ये आपको जेल की काल-कोठरी तक पहुँचाने का माद्दा रखते हैं, जबकि आप गाफिल हों।

दुलरू के सथुआ प्रदीप के मोटू फरमाते हैंः ऐसा नहीं है कि इस देश में क्रांति के हालात परिपक्व नहीं हैं लेकिन मनोगत ताकतें किसी लायक नहीं हैं। पूँजीवाद मनुष्यता को अब कुछ भी सकारात्मक नहीं दे पा रहा है लेकिन खुद से तो ढहने से रहा, उसे बलपूर्वक नष्ट ही करना होगा वर्ना मानवजाति के साथ-साथ उन लोगों (कूकुर वंश के लोगों) का जीवन भी कष्टमय बना रहेगा। समाजवाद ही पृथ्वी पर निवास करने वाले समस्त प्राणियों का भला कर सकता है।

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हमारे दुलरू आज शैंपू से नहलाए गए हैं, आप लोग देखिए और खुद फैसला कीजिए कि दुलरू अधिक सुंदर हैं या लेनिन के भैरव। डॉ. लेनिन से गुजारिश है कि वे कमेंट बॉक्स में अपने भैरव की तस्वीर कॉपी-पेस्ट कर दें।

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