
उठानी होगी काम के घंटों को 8 की बजाय छह करने की मांग, सप्ताह होगा 5 दिन का
संपादकीय टिप्पणी
गाँव-गिरांव के मालिक किसानों को साढ़े तीन सौ रुपया भी दिहाड़ी देना अखरता है। मशीनों की उत्पादकता लाखों गुना अधिक हो चुकी है लेकिन अभी भी काम के आठ घंटों का चूतिया राग अलापा जाता है। हुक्मरान आठ का 12 कर चुके हैं, तुम 8 को छह कराने के लिए क्यों नहीं लड़ रहे। वर्किंग डेज 6 नहीं 5 हों। व्यवहार में देखने में आता है कि अत्यधिक कम मजदूरी के कारण मजदूर मिल-कारखाने के बाद कहीं चौकीदारी भी करने लगता है। हगने-खाने का काम भी चलताऊ ढंग से ही कर पाता है। पूँजीवाद के रहते हालात सुधरने-बदलने वाले नहीं, यह बात मजदूरों को बतानी होगी। पहले के संघर्षों से जो मिला था, लड़ाई उसे बचाने से आगे की होनी चाहिए। काम के घंटे छह करो, न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए सरकार की गांड़ में डंडा करो। पूँजीवाद ने शातिराना ढंग से मजदूरों के मन में यह बात बैठा दी है कि जितना अधिक पीस बनाओगे उतना ज्यादा पैसा बनेगा। सेठियों की बजाय सीधे राज्य के गोचर अंगों से टकराना होगा, अपनी समस्त मांगे राज्य के आगे रखनी होंगी। यह एनजीओवाद नहीं, आज के दौर की जरूरत है।
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हरियाणा में पानीपत स्थित इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) की रिफाइनरी में कार्यरत हजारों मजदूर हड़ताल पर हैं। 23 फरवरी को सुबह 11 बजे से 30 से 40 हजार की संख्या में मजदूरों ने रिफाइनरी गेट 1 और 4 पर प्रदर्शन शुरू किया था, जिसके कुछ घंटे बाद ही पुलिस की तरफ से प्रदर्शन को जबरन समाप्त कराने के लिए लाठीचार्ज शुरू कर दिया गया जिसमें कुछ मजदूर घायल भी हुए, जिसके बाद हालात पर काबू पाने के लिए सीआईएसएफ द्वारा हवाई फ़ाइरिंग करने की भी खबर आई है। मजदूरों के शांतिपूर्ण और जायज़ प्रदर्शन पर प्रबंधन व ठेकेदारों के इशारों पर दमन कर माहौल को तनावपूर्ण बना देने के लिए यहां सीआईएसएफ जिम्मेदार है।मजदूरों का कहना है कि देश के सबसे सार्वजनिक उपक्रमों में से एक के कर्मचारी होने के बावजूद उनकी कार्य परिस्थितियाँ बेहद दयनीय हैं। 12-12 घंटे काम करने के बाद भी वेतन 8 घंटे का ही दिया जाता है, यानि ओवरटाइम का कोई पैसा नहीं दिया जाता। महीने में बस 2 दिन की ही छुट्टी निर्धारित है, बाकी 2 रविवार के दिन भी काम करना होता है। वेतन भुगतान करने में अक्सर देरी की जाती है। PF कटौती में प्रबंधन व ठेकेदारों द्वारा धांधली की जाती है, कार्यस्थल पर शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की भी व्यवस्था नहीं है।मजदूरों के संगठित प्रतिरोध और गुस्से से तत्काल पीछे हटे प्रशासन, प्रबंधन व ठेकेदारों ने उनके संघर्ष को बिखेर देने के मकसद से उनके सामने एक लिखित परंतु अस्पष्ट आश्वासन भी पेश किया है लेकिन मजदूर इसमें फंसे बिना अपनी मांगों के पूरा होने तक हड़ताल और प्रदर्शन जारी रखने का निर्णय ले चुके हैं।24 फरवरी को मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA) की एक टीम ने तथ्यान्वेषण व संघर्षरत मजदूरों से संवाद करने हेतु रिफाइनरी परिसर का दौरा किया, जिससे पता लगा कि 23 फरवरी को मजदूरों का उपरोक्त विद्रोह फूटने का मुख्य उत्प्रेरक था 2 दिन पहले रिफाइनरी में हुए एक कार्य संबंधित हादसे में 2 मजदूरों की मृत्यु और 1 का बुरी तरह घायल हो जाना (एक पैर घुटने तक कट जाना), और इसपर भी प्रबंधन का उदासीन रवैया। सालों से शोषण और प्रबंधन-ठेकेदारों का अभद्र व्यवहार झेल रहे मजदूरों का दबा हुआ गुस्सा इस हृदयविदारक घटनाक्रम से फूट पड़ा। गौरतलब है कि सम्पूर्ण परिसर में, विशेषतः मजदूरों के प्रदर्शन स्थल पर, मोबाईल नेटवर्क और इंटरनेट सेवा को बंद करने के लिए जैमर लगा दिए गए हैं ताकि संघर्ष और दमन दोनों की खबरें बाहर ना पहुंच सकें। गौरतलब है कि पुलिस प्रशासन 2500 अज्ञात मजदूरों के नाम से एफआईआर भी दर्ज कर चुका है, वहीं प्रबंधन व ठेकेदारों पर श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन करने व प्रशासन द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर लाठीचार्ज करने के लिए कोई एफआईआर या न्यूनतम कानूनी कार्रवाई भी नहीं हुई है।गौरतलब है कि पानीपत की यह रिफाइनरी 1998 से क्रियाशील है जिसमें विभिन्न इकाइयों में 50 हजार से अधिक मजदूर कार्यरत हैं। यह दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी इंटिग्रेटेड रिफाइनरियों में से एक है। इसके बावजूद इन हजारों मजदूरों में से अधिकतर विभिन्न ठेकेदारों के तहत काम करते हैं और स्थाई नौकरी तथा बुनियादी श्रम अधिकारों से वंचित हैं। आज प्राइवेट सेक्टर ही नहीं, सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी कंपनियों में भी ठेका प्रणाली रोजगार की प्रमुख व्यवस्था बन गई है, जो मजदूरों के बुनियादी अधिकारों को निरस्त कर उनके शोषण को और भी तीव्र बना देती है।सभी केन्द्रीय श्रम कानूनों को ध्वस्त कर मोदी सरकार द्वारा पिछले साल लागू किए गए 4 नए लेबर कोड इस ठेका प्रणाली और इसके और भी खतरनाक रूप ‘फिक्स टर्म रोजगार’ को सभी क्षेत्रों में सर्वव्यापी बना देते हैं जिससे स्थाई रोजगार, 8 घंटे काम, ओवरटाइम PF जैसे सारे बुनियादी अधिकार, जो मजदूर वर्ग ने अपने बलिदानी संघर्षों से हासिल किए थे, एक झटके में खत्म हो चुके हैं। यही नहीं, यूनियन बनाना और हड़ताल करना भी लगभग असंभव व जुर्म के बराबर बना दिया गया है। पानीपत रिफाइनरी में मजदूरों की हड़ताल असल में तीव्र शोषण और गुलामी की इस नई घोर मजदूर-विरोधी प्रणाली का ही नतीजा है जिसके खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिए मजदूर वर्ग को जाति-धर्म-भाषा आदि के विभाजनकारी षड्यंत्रों में बिना फंसे वर्गीय एकता बनानी होगी।IOCL रिफाइनरी, पानीपत के संघर्षरत मजदूरों की बिंदुवार मांगें इस प्रकार हैं - 1. 8 घंटे की ड्यूटी सख्ती से लागू की जाए।2. वेतन का भुगतान प्रत्येक माह की 1 से 7 तारीख के बीच सुनिश्चित किया जाए तथा 240 दिन पूर्ण करने पर पूरी देय राशि का भुगतान किया जाए।3. कंपनी के बोर्ड रेट के अनुसार वेतन दिया जाए तथा भविष्य निधि (PF) की राशि बराबर और नियमित रूप से जमा की जाए।4. कार्य के दौरान किसी भी दुर्घटना या अनहोनी की स्थिति में कंपनी पूर्ण जिम्मेदारी ले और उचित मुआवज़ा दे।5. के.के.एस. से उठाए गए मजदूर साथियों को तुरंत रिहा किया जाए।6. ओवरटाइम (OT) का भुगतान दोगुनी दर से किया जाए।7. सभी राष्ट्रीय अवकाश मजदूरों को प्रदान किए जाएँ।8. मासिक ड्यूटी 26 कार्यदिवस निर्धारित की जाए।9. कार्यस्थल पर शौचालय और स्वच्छ पेयजल की समुचित व्यवस्था की जाए।मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA) पानीपत रिफाइनरी के मजदूरों के संघर्ष के साथ पूर्ण रूप से खड़ा है, तथा मजदूरों की उपरोक्त जायज मांगों को तत्काल लागू करने की मांग करता है। साथ ही, शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मजदूरों पर पुलिस दमन की कड़ी भर्त्सना करते हुए MASA जिम्मेदार अधिकारियों पर तथा सालों से खुलेआम श्रम कानूनों का उल्लंघन कर रहे IOCL प्रबंधन व ठेकेदारों पर कानूनों कार्रवाई की मांग करता है। मजदूरों पर दर्ज हुए FIR को तत्काल रद्द किया जाना चाहिए, तथा आगे मजदूरों पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। साथ ही, MASA देश भर के मजदूरों के श्रम अधिकारों को ध्वस्त करने वाले नए लेबर कोड को रद्द करने की मांग करता है।
जारीकर्ता :-केन्द्रीय समन्वय टीम,मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA)
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