
सत्यम वर्मा के संबंध में गोरक्षधाम के मुखिया और हिंदू हृदय सम्राट श्रद्धेय योगी आदित्यनाथ को तथ्यों से कराया अवगत
माननीय योगीबाबा, सनातन में संपूर्ण आस्था रखने वाले ब्राह्मण के नाते सर्वप्रथम मैं आपके चरणों में शीश नवाता हूं। स्पष्ट कर दूँ कि मैं यह खुली चिट्ठी गोरक्षधाम के मुखिया को लिख रहा हूँ, जो संयोगवश प्रदेश के सीएम भी हैं।
मेरा नाम कामता प्रसाद तिवारी है और मैं बाइपोलर डिसआर्डर नामक गंभीर मानसिक रोग से ग्रस्त हूँ। इस वक्त मेरी उम्र 56-57 वर्ष है और मेरी जिंदगी का उल्लेखनीय हिस्सा बौड़मों की तरह इधर-उधर भटकते हुए गुजरा है क्योंकि न तो समय रहते बीमारी का निदान हो पाया था और न ही उपचार शुरू हुआ था।
आजमगढ़ में भूमिहार कुल में पैदा हुए रामनाथ ने कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया (सीएलआई) की स्थापना की थी, जिससे टूटकर रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया (RCLI) बनी थी, जिसके नेता पहले शशिप्रकाश सिन्हा थे और अब उनका बेटा अभिनव सिन्हा है। वर्ष 1996 के आसपास मैं शशिप्रकाश सिन्हा के संपर्क में आया था और लगभग 2 दशक तक परिधि पर उससे जुड़ा रहा। मैं मानसिक रोगी जरूर हूँ लेकिन न तो मूर्ख हूँ और न ही पागल। Observe करने की मेरी क्षमता कमाल की है। शशिप्रकाश सिन्हा सामाजिक अर्थों में अत्यंत आत्म-केंद्रित और मनोरोगी किस्म का इंसान है, इसमें रत्ती भर भी नैतिक-संकोच नाम की कोई चीज नहीं है। कॉ. अरविंद सिन्हा जब गुजरे थे तब यह ये सोचकर मगन था कि इसका लौंडा अब बड़का कम्युनिस्ट नेता बनेगा। घिनहा है हरामजादा। इसकी मार्क्सवादी साहित्य की पढ़ाई-लिखाई कमाल की है और साहित्य-भाषा पर पकड़ भी कमाल की है, जिसका उपयोग इसने अपने और अपनी लंगड़ी औलाद अभिनव सिन्हा के लिए हर तरह की सुख-सुविधा का इंतजाम करने के लिए किया।
अब सीधे सत्यम वर्मा पर आते हैं। शशिप्रकाश सिन्हा मानव मन का अद्भुद जानकार है और वह भलीभाँति जानता था कि जग में प्रसिद्धि की चाहत सत्यम वर्मा की बुनियादी कमजोरी है इसीलिए उसने अपनी बीवी कात्यायनी और सत्यम वर्मा के नाम से बेहिसाब लेखन किया। सत्यम वर्मा कोई संत-महात्मा तो है नहीं और न ही उसने जग की भलाई के लिए दुनियावी सुखों का परित्याग ही किया था। शशिप्रकाश सिन्हा ने अपने साढू सत्यम वर्मा की मगजधुलाई की और उसे लेनिन का अवतार बताते हुए निःसंतान बने रहने के लिए तैयार कर लिया ताकि ऐन-केन प्रकारेण बटोरी गई समस्त संपत्ति की एकमात्र मालिक उसकी अपनी लंगड़ी औलाद बने। कात्यायनी 5 बहने हैं लेकिन लौंडा सिर्फ एक और वह भी लंगड़ा। कैसी तो विडंबना है।
शशिप्रकाश सिन्हा बेहद आत्मग्रस्त, लालची और पुत्रमोह के मामले में धृतराष्ट्र को भी पीछे छोड़ देने वाला गलीज़ इंसान है और यह बात लाल लंगूरों में लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। वहीं अभिनव सिन्हा अपने लंगड़े होने को कभी पचा नहीं पाया और सुपर जीनियस के तौर पर खुद को स्थापित करने का गुंताड़ा भिड़ाता रहा। ये कहाँ-कहाँ से पैसे बटोरकर किन-किन देशों की यात्राएं करता रहा और वहाँ पर किस तरह से देश-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहा है, इसकी जानकारी अगर दिल्ली-नोयडा-लखनऊ-गोरखपुर पुलिस को नहीं है तो यह हैरानी की बात है। माननीय केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को इस ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए और अपने विभाग के जिम्मेदार अफसरों को टाइट करना चाहिए।
शशिप्रकाश सिन्हा का बियाह कात्यायनी नामक औरत के साथ हुआ है, जिसे हफ्ते में अगर 2 दिन खँसी और 5 दिन मुर्गा खाने को न मिले तो उसे मिर्गी के दौरे पड़ने लगते हैं। अब यह तो मानी हुई सी बात है कि 400-500 रुपये हर दिन कमाने वाले मजदूर तो खँसी-मुर्गा खिला नहीं सकते तो ये लोग मध्यवर्ग से धन-उगाही करते रहे हैं। सत्यम वर्मा लंबे समय तक अनुवाद करके मोटे पैसे कमाता रहा है और वह सारा पैसा अपने रिश्तेदारों को खँसी-मुर्गा खिलाने और बीयर पिलाने पर उड़ाता रहा है। RCLI ऐसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है, जिसके मुख्य किरदार आपस में रिश्तेदार भी हैं।
समय पर मेरा बियाह हुआ और तीन बेटियों और कालांतर में दो बच्चों का नाना बना। बीच में कमाई अच्छी होने लगी थी तो कार भी खरीद ली लेकिन एआई की मेहरबानी से अनुवाद का काम ठप्प पड़ गया है तो अब दवा के भी पैसे नहीं हैं। जब मैं किसी से उधार मांगता हूँ तो अहं घिसता है। परिवार के भरण-पोषण के लिए लोग क्या नहीं करते। इस बुढ़ौती में भी 10-12 घंटे कोडिंग करता हूँ, हर दिन बिना नागा। मैंने निजी स्कूलों-कॉलेजों के लिए दो बेहतरीन सॉफ्टवेयर बनाए हैं।
अगर हम मजदूरों की जिंदगी की ही बात करें तो मैंने देख रहा है कि तमाम मजदूर रेलवे पटरी पर हगने जाते हैं। एक छोटे से कमरे में कई-कई मजदूर रहते हैं। लेकिन, कम्युनिस्ट नेता शशिप्रकाश-अभिनव सिन्हा और कात्यायनी-कविता वगैरह प्रोफेसरों के समतुल्य लग्जरी लाइफ जीते हैं।
माननीय योगी बाबा और प्रशासन से मेरी करबद्ध विनती है कि इस बाप-बेटे शशि-अभिनव को जेल में डाला जाए, ये सभ्य समाज के नाम पर कलंक हैं, ताकि कल को फिर कोई कामता प्रसाद, कोई सत्यम वर्मा इनके झाँसे में न आए और अपनी जिंदगी न बर्बाद करे। मेरी कवि बनने की बड़ी तमन्ना थी लेकिन कविताई करना नहीं आता। शशिप्रकाश ने मुझसे कहा था कि जैसे कात्यायनी के नाम पर उसने विपुल लेखन किया है, मेरे नाम पर भी एक काव्य-संकलन रच देगा।
सत्यम वर्मा को अगर कोई औलाद होती तो वह दूसरों के उगले हुए शब्दों के सहारे अमरत्व पाने की बजाय नाती-पोते को गोद में खेलाने में मगन रहता। सामान्य पारिवारिक जिंदगी जीता। चारों धाम की यात्रा पर जाता, गोरखधाम के मुखिया को सांप्रदायिक बताने पर अपनी ऊर्जा न खर्च करता।
जितनी समझ थी, लिख दिया। अगर कुछ गलत लिख-बोल दिया हो तो माफी।
टिप्पणियाँ (Comments)
एक टिप्पणी जोड़ें
कमेंट करने के लिए लॉगिन करें



