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India

सांप्रदायिक सत्यानाशियों की काट में लगे जातिवादी नफरती चिंटू, क्या होगा इस देश का?

27 दिसंबर 20257
सांप्रदायिक सत्यानाशियों की काट में लगे जातिवादी नफरती चिंटू, क्या होगा इस देश का?

लखनऊ में किसानों से जमीन हड़प कर, किसानों की छाती पर भाजपा सरकार राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल बना रही है। उस राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल में उनके तीन महापुरुषों की मूर्तियां लगाई जा रही हैं। ये महापुरुष हैं - अटलविहारी वाजपेई, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय।अब जातिवादी बुद्धिजीवी इसकी आलोचना कर रहे हैं। चूंकि इन बुद्धिजीवियों में वर्गचेतना का अभाव रहता है, इसलिए वे अमीर बनाम गरीब की बात नहीं करते। उनका कहना है कि उसमें फूले दम्पति, अम्बेडकर, पेरियार... की मूर्ति लगाये बगैर यह राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल नहीं बन सकता। इसका मतलब समझिए - इन जातिवादी बुद्धिजीवियों की बुद्धि देखिए, वे साम्प्रदायिक उन्माद के मुकाबले जातीय उन्माद का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे साम्प्रदायिक उन्माद के प्रतीकों के साथ-साथ जातीय उन्माद के प्रतीकों को शामिल कर लेने को राष्ट्रवाद की पूर्णता मान बैठे हैं।कुछ लोग भाजपा के उपरोक्त दिवंगत नेताओं के महापुरुष होने पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं।मगर उपरोक्त तीनों नेताओं के महापुरुष होने में मुझे कोई संदेह नहीं है। निश्चित ही वे महापुरुष थे, मगर वे किसके महापुरुष थे? भारत की गरीब जनता के या भारत के मुट्ठी भर शोषकवर्गों के?अगर आप कहते हैं कि हिन्दुओं के महापुरुष थे तो मैं पूछना चाहूंगा कि वे गरीब हिन्दुओं के पक्षधर थे या अमीर हिन्दुओं के?अगर आप कहते हैं कि वे दलितों के हितैषी थे तो मैं पूछना चाहूंगा कि वे गरीब दलितों के हितैषी थे या अमीर दलितों के?क्यों कि कोई व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, वह ज़ालिम और मज़लूम में से किसी एक ही का पक्ष ले पायेगा।शोषक वर्गों में बहुत से ऐसे महापुरुष हुए हैं जो शोषित पीड़ित वर्ग के हित की बात करते थे।इसका मतलब ये नहीं कि वे कर्मों से भी शोषित पीड़ित वर्ग के हितैषी थे। वे व्यवहार ही नहीं सिद्धांत में भी शोषित पीड़ित वर्ग के विरुद्ध लुटेरे वर्ग के साथ खड़े थे। बहुत ऐसे महापुरुष रहे हैं जो ब्रिटिश सरकार में बड़े-बड़े पदों पर बैठे थे मगर हिन्दुओं, मुसलमानों, दलितों के हित की बात करते थे। मगर वे सिर्फ बातें ही करते थे क्योंकि वे ऐसे शब्दाडंबरों से जनता को गुमराह कर रहे थे। वे जाति-धर्म के झगड़े लगा कर जनता को जनता से लड़ा रहे थे। यह ब्रिटिश साम्राज्य के लिए उनकी सबसे बड़ी सेवा थी। आज भी यह सेवा जातियों और धर्मों के ठेकेदार कर रहे हैं। जातिवादी और साम्प्रदायिक सोच वाले पुरुषों के माननीय महापुरुष लोग राष्ट्रवादी थे इस पर मुझे कत्तई यकीन नहीं है। मेरी नज़र में ये लोग सिद्धांत और व्यवहार दोनों में ही राष्ट्र विरोधी थे।सिद्धांत और व्यवहार में जो ब्रिटिश साम्राज्य के साथ खुल कर खड़ा हो, जो ब्रिटिश साम्राज्य की चाटुकारी करने वाले सामन्तों के साथ खड़ा हो, जो ब्रिटिश साम्राज्य की दलाली करने वाले पूँजीपतियों के साथ खड़ा हो, या ऐसे शोषक वर्ग के समर्थकों को अपना आदर्श मानता हो वह राष्ट्रवादी कैसे हो सकता है?ब्राह्मणों को गाली दे कर जातिवाद को बढ़ावा देना तथा मुसलमानों को गाली देकर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना राष्ट्रीय विघटनकारी दुष्कर्म है। अगर ऐसे लोग राष्ट्रवादी कहे जायेंगे तो राष्ट्रविरोधी किसे कहा जायेगा? ऐसे लोगों के नाम पर जनता कौन सी राष्ट्रीय प्रेरणा ले पायेगी।रजनीश भारती जनवादी किसान सभा