
मरगिल्ला लाला सत्यम वर्मा और पटना के प्रतिबद्ध छिनरे के बीच के अंतरसंबंधों को उजागर करती बुंदेला जी की रिपोर्ट
चीकू सिंह बुंदेला उर्फ दुलरू की विशेष रिपोर्ट
मरगिल्ला लाला सत्यम वर्मा पुलिस गिरफ्त में। यही सड़ीका-भो मुझे भीड़ से पिटवाकर फिर पुलिस के सुपुर्द किए जाने का दिवास्वप्न देख रहा था। इसको और इसकी भैंसिया सढ़ुआइन को शुगर है। भीख के पैसों से मुर्गो-खँसी चापोंगे तो अमीरों वाली बीमारियाँ तो होंगी ही। वैसे इसकी भैंसिया सढ़ुआइन गांड़ से खाती है और मुँह से हगती है, माने मुख-शौच करती है। भरोसेमंद सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार लँगड़वा की सरगर्मी से तलाश जारी है जो लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटना चाहता है। यह अलग बात है कि लँगड़ा है तो ठीक से चल भी नहीं पाता। ---------------------योगी बाबा की पुलिस जिंदाबाद। ऐसे ही पेलाई होनी चाहिए। ये हराम के जने मजदूरों के हितैषी नहीं हैं। अगर हितैषी होते तो मध्यवर्ग से भीख माँग कर खँसी खाने की बजाय नोयडा समेत तमाम फैक्टरी इलाकों में मजदूरों के बीच कमेटी-स्टडी सर्किल का जाल बिछाते और तब उन्हें मजदूरों के स्वतःस्फूर्त उभार के पीछे-पीछे मेढ़क फुदकना नहीं पड़ता। सब कुछ व्यवस्थित ढंग से होता। सारी माओवादी ऐक्टिविस्ट फुदक ही रहे हैं स्साले। अगर निरंतर काम किया होता तो मजदूर सुनियोजित तरीके से मैदान में उतरते। ----------------------------------एक ऐक्टिविस्ट अगर अपनी पूरी जिंदगी में मजदूरों की दस कमेटियाँ भी बनाए तो विचारधारा से अनुप्राणित 100 मजदूर हो जाएंगे। किसी एक फैक्टरी इलाके में 500 मजदूर भी अगर ऐसे तैयार हो गए तो बुर्जुआ लूट-खसोट की चूलें हिल जाएंगी। ---------------- ये सब स्साले मुफतखोर-हरामखोर और सूअर के जने हैं, पुलिस इन्हें पेले और हम जैसे लोग ब्राह्मणों को भोजन करवाएं। लाल लंगोटी धारण करके मुफ्त की रोटी खाने वाले अधिकांश भँड़वे पटना के प्रतिबद्ध छिनरे के पक्ष में खड़े होकर लाठी भाँज रहे थे क्योंकि सब के सब बिना किसी अपवाद के वैसी ही जिंदगी जी रहे हैं। बिना मेहनत के दूसरों की मेहनत से कमाए गए पैसों से अन्न खाने की लानत भरी जिंदगी। पटना पुलिस को भी सूचना तो होगी ही, देर-सवेर उसकी भी पेलाई तो होगी ही। ---------------------------------------मजदूरों को अपने बीच से आंगिक बुद्धिजीवी तैयार करने होंगे तभी उनकी और शेष मानवता की मुक्ति हो पाएगी।अगर स्कूल, राशन, इलाज, परिवहन, आवास सब कुछ मुफ्त और सर्वसुलभ हो जाए तो क्या वर्दीधारियों के बीच का 99 परसेंट हिस्सा खुशी से कुप्पा नहीं हो जाएगा। वे बेचारे भी तो इंसान ही हैं। पूँजीवाद उनके अंदर के मनुष्य को मार रहा है और इससे उनका बचाव सिर्फ और सिर्फ आंगिक बुद्धिजीवी ही कर सकते हैं। --------------------------------रूपेश राय जैसा अनपढ़-गँवार जब मजदूरों के बीच जा सकता है तो लँगड़वा क्यों नहीं, उसका बापू क्यों नहीं। मरगिल्ला लाला सत्यम क्यों नहीं। उसकी गोल गदहिया सढुआइन क्यों नहीं। मुफ्त का खा-खाकर सूअरिया हो गई है। अगर फैक्टरी में जाकर मजदूरी करती तो क्या 100-200 औरतों में भी मार्क्सवाद के बीज नहीं डाल सकती थी। लेकिन, ये सब के सब मध्यवर्ग को प्रबुद्ध बनाने और उनसे धनउगाही करके खँसी-सूअर पेलने में व्यस्त थे। हाय-हाय फिर भी यूपी पुलिस पेल रही है। --------------------------मजा आ गया। -------------------लेकिन अंत में मेरा गुस्सा सिर्फ हराम के जने कथित ऐक्टिविस्टों को लेकर है। 12-15 हजार पर जानलेवा-कमरतोड़ मेहनत करने वाले मजूरों के साथ मैं दिल से हूँ। उन पर हुई पुलिस कार्रवाई की निंदा-भर्त्सना करता हूँ। ---------------उनका साथ देने वाले पत्रकारों-वकीलों-मानवाधिकार कर्मियों, उन्हें लेकर दर्द महसूस करने वाले पुलिस के सिपाहियों का अभिनंदन करता हूँ।------------------------जंगली भाई कहीं सीन में नहीं है। उनकी एक अगियाबैतालिन अपनी फेसबुक वॉल पर लिख रही है कि मजदूर बिगुल के हरामखोरों को बस डिटेन किया गया है, माने जैसे उसको जेल भेजा गया था, वैसे जेल नहीं भेजा गया। ---------------- वैसे इन लोगों के यहाँ कमेटी सिस्टम ठीक से काम करता है। अगर ये मैदानी इलाकों में सामंत खोजना बंद कर दें और अपना पूरा फोकस मजदूर आबादी पर लगाएं तो कुछ सार्थक काम कर सकते हैं। पर चूतिया लाला मनीष श्रीवास्तव लिखकर स्टालिन के प्राधिकार की हिफाजत करना चाहता है। इस गधे को इतनी मामूली बात समझ में नहीं आती कि इलाहाबाद में हजार-पाँच सौ मजदूरों को सड़क पर उतारने की सलाहियत पैदा कर, स्टालिन-माओ सभी के प्राधिकार की हिफाजत खुद ब खुद होने लगेगी। ------------------------------------
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