
मनोज रूपड़ा कांडः बुद्धिजीवियों को लेकर ललाइन रहती है बहुत चिंतित, पर आखिर क्यों?
कथाकार मनोज रूपड़ा गए थे कुलपति को ज्ञान देने, अब ज्ञान देने गए थे या मुफ्त का लंच खाने यह तो भगवान ही जाने। अरे भइया, हमारे पास ताकत है और पॉवर स्ट्रक्चर में हम तुमसे बहुत-बहुत ऊपर हैं तो तुम्हारा तो फर्ज बनता है कि हमारी विद्वता से लाभान्वित हो, उल्टे तुम हमें ज्ञान देने लगोगे तो कैसे चलेगा।
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लखनऊ में एक ललाइन रहती है, जिसका लौंडा लंगड़ा है और पति गज़ब का चालबाज और संपत्ति-बटोरू। पूरा कुनबा बोटी-दारू का सेवन करते हुए अच्छी-भली जिंदगी बसर कर रहा है और दुर्भिक्ष के शिकार अल्कोहलिक मजदूर-वर्ग का तारणहार बनकर विश्वविद्यालयी बुद्धिजीवियों से धन-उगाही करता है।
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मनोज रूपड़ा के इस ललाइन कुनबे के साथ घनिष्ठ संबंध मालूम पड़ते हैं। तुम अगर जनता के आदमी होते तो मजदूरों के बीच जाते और मांगकर बाटी-चोखा खाते, वहाँ क्या अपनी ऐसी-तैसी कराने गए थे। सभी को बुद्धिजीवियों की ही फिक्र सताती रहती है, कॉलेज-यूनिवर्सिटी के लौंडो से कहीं दुनिया बदलती है भला, पिचके हुए गालों वालों, गुटखा-बीड़ी से सड़े हुए दाँतों वाले मजदूरों को कुछ सिखाओ-पढ़ाओ तो मानें।
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जंगली भाइयों के एक कथित ऐक्टिविस्ट के साथ बियच्चू का एक स्टूडेंट कभी मेरे घर आया था। समाजशास्त्र में एमफिल टाइप की कोई चीज कर रहा था। प्रोफेसरों की दास्तान सुनाने लगा। एक प्रोफेसर पीएचडी के उम्मीदवार अपने मेल स्टूडेंट से कह रहा था कि कल मुर्गा-दारू लेकर आ जाना तुम्हारी आंटी कहीं गई हुई हैं। फीमेल स्टूडेंट्स के यौन-शोषण की कहानियाँ तो जब-तब बाहर आ जाती हैं लेकिन मेल स्टूडेंट्स का क्या?
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एडवांस एलिमेंट निकालने के नाम पर अपने लिए बोटी का इंतजाम करने में लगा रहता है ललाइन का कुनबा। पूँजीवाद में मुफ्त में कुछ नहीं मिलता, मुफ्त का लंच खाने जाओगे तो लात तो खानी ही पड़ेगी। वर्ना दुनियादारी का तकाजा तो यह कहता है कि जब चले ही गए थे तो चुपचाप गलियारे में एडवांस एलिमेंट तलाशते और लंच खाकर अपने घर चले जाते।
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निजी तौर पर मुझे तो उम्मीद पिचके गालों वाले शराबी मजदूरो से ही है, इन्हें गोलियाने वाले जब भी अवतरित हों। बढ़िया खाते-कमाते बुद्धिजीवियों को लेकर छाती पीटने वाले हरामजादों के साथ मेरी कोई सहानुभूति नहीं। लेकिन वह क्या है न कि वर्ग बोलता है, ललाइन को तो अपने जैसों की ही चिंता होगी न। जिस तरह का कपड़ा-भोजन उसको मिलता है, वह तो बुद्धिजीवीगण ही दे सकते हैं, मजदूर बेचारे तो बाटी-चोखा ही खिला सकते हैं।



