
मज़दूर आंदोलन के पक्ष में बयान जारी कर रहे हैं छिनरे, भँड़वे, भीख मंगवाने वाले, पुलिस आखिर इन्हें कब चाँपेगी?
श्री चीकू सिंह बुंदेला उर्फ दीवान जी की कलम से
असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए पीएचडी करना होता है जबकि आइएएस बनने के लिए बीए करना काफी होता है। तो जिसकी शैक्षिक योग्यता ज्यादा उसकी पगार ज्यादा। कॉमन सेंस की बात है। पर यहाँ पूछने वाली बात यह है कि अगर सिर्फ पगार को ही पैमाना बनाया जाए तो क्या कोई भी लोक-सेवक मध्य-वर्ग में आएगा? यकीनन नहीं आएगा। एक जमाना ऐसा भी था जब हम जैसे अनुवादकों ने हर महीने पाँच-पाँच हजार अमेरिकी डालर कमाए हैं, लेकिन जिंदगी लुलुआते हुए ही बीती है।
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चुनाव लड़ने के लिए पैसा चाहिए, पैसा श्रम के शोषण से आता है। किसी भी देश का कोई भी चुनावी नेता फैक्टरी मालिकों के खिलाफ भला कैसे जा सकता है? सरकार की ओर से जब डीएम और पुलिस प्रशासन को निर्देश आएगा कि मजदूरों के स्वतःस्फूर्त आंदोलन को कुचलो तो किस पुलिस अधिकारी में इतना नैतिक बल है कि आदेश मानने से इन्कार कर दे क्योंकि सभी को मध्यवर्गीय ही नहीं उच्च-वर्गीय जिंदगी चाहिए। एकाध सिरफिरा अगर निकल भी आए तो सिस्टम उसे पागलखाने भिजवाने का माद्दा रखता है। क्योंकि बहुमत की दादागिरी भी तो मायने रखती है और बहुमत चोट्टों, बिना रीढ़ के अनैतिक लोगों का है, जो मूलतः इंद्रियसुखभोगी हैं।
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किसी भी देश के माननीय जजों की सैलरी कितनी होती है, उन्हें मिलने वाली सुविधाओं की बात अगर दरकिनार कर दी जाए तो। तो भइया, पूँजीवादी दुनिया में निष्पक्ष और भ्रष्टाचार मुक्त न्याय-व्यवस्था बस एक छलावा है। पुलिस जब कथित उपद्रवियों यानि कि अपनी बेबसी-निरुपायता पर चीत्कार कर रहे मजदूरों को अभियुक्त बनाकर कोर्ट में पेश करती है तो सभी देशों के माननीय जज वही करते हैं, जो उन्हें करना चाहिए। अर्थात, अपनी उच्च-वर्गीय जिंदगी की आकांक्षा की पूर्ति के लिए आपराधिक पूँजीवादी तंत्र के साथ नाभिनालबद्ध हो जाने का काम।
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अब बड़ी पूँजी से संचालित मुख्यधारा के मीडिया की बात कर लेते हैं। गुजरे जमाने में एक बार में फिल्मी पत्रिका निकालने वाले मालिक के पास नौकरी मांगने गया था, जो कि फिल्मी पत्रिका निकालने से पहले प्लास्टिक के कवर में ढँकी पोर्न सामग्री से लबरेज चौपतिया निकालने का काम किया करता था। हिंदी के सभी अखबारों की वेबसाइटें देखकर कोई भी समझ सकता है कि अर्द्ध-पोर्न सामग्री परोसी जा रही है। पीत पत्रकारिता के मुकाबले निहायत ही घृणास्पद कांटेंट। इन्हीं चिरकुट अखबारों में मैंने भी बरसों गुजारे हैं और अपने निजी अनुभवों से जानता हूँ कि मरभुक्खा सब एडिटर डीटीपी ऑपरेटर को हेय दृष्टि से देखता है। परम बकचोद स्टाफ-परम पूँजीपरस्त सोच। यहाँ भी अपक्लास होने की होड़ मची रहती है, फैक्टरी वर्कर तो कीड़े-मकोड़े हैं और ये हरामजादे लॉटसाहब, जो कि इतनी भी पगार नहीं पाते कि इंसानी गरिमा के साथ जी सकें, लेकिन नहीं साहब पत्रकार हैं और वह भी बड़के मीडिया समूह के।
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बनारस कचहरी के जाने-माने वकील हैं श्री अजय कुमार गेठे, मैं उनसे सादर अनुरोध करना चाहूँगा कि मजदूर आंदोलन को लेकर वकीलों के बीच किस तरह की चर्चाएं चल रही हैं, अगर कोई विमर्श है तो, हमारे साथ यानि कि हमारा मोर्चा के साथ साझा करें
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आलेख को गैर-जरूरी तौर पर बहुत लंबा न खींचते हुए निचोड़ पेश करते हैं। शशिप्रकाश सिन्हा के साथ मेरा दो दशक से अधिक समय तक का जुड़ाव रहा है। मास वर्क करने में पुलिस-पेलाई का खतरा था और इस खतरे को भाँपकर न तो शशि ने और न ही उसकी लंगड़ी औलाद ने कभी जमीन पर उतरने का साहस किया। दोनों ही मार्क्सवादी विद्वान बनने में अपने जीवन की सार्थकता तलाशते रहे। जितना चोटाते हैं उससे हजार गुना चिल्लाते हैं। एसीपी ने पूछताछ करने के लिए जरा सा बुला क्या लिया, इन हरामजादों ने आसमान सिर पर उठा लिया। मजे की बात देखिए, अपने बचाव में बुर्जुआ दुनिया में अपनी हैसियत का बखान करने लगे। अनुवाद का काम बाजार से खत्म हो चुका है और अब सत्यम-अभिनव समेत इनकी पूरी मंडली भीख की कमाई पर पलने के लिए मजबूर है और युवाओं से भीख मंगवाने के लिए पुलिस को इस गिरोह को कायदे से पेलना चाहिए।
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पर्याप्त सैद्धांतिक पढ़ाई के बावजूद मुझे घंटा कुछ नहीं मालूम था। 2017 में जब बनारस आया तो यहाँ लिबरेशन का तलछट की जिंदगी जी रहा एक कार्यकर्ता मिला। उसके साथ बनारस घुमाई के दौरान जनता-जनार्दन के दर्शन हुए और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद पटना का प्रतिबद्ध छिनरा संपर्क में आया, जो कि अपनी यौन-लिप्सा की पूर्ति हेतु अभी भी मुझे जेल भिजवाने का गुंताड़ा भिड़ा रहा है। यह सड़ीका-भो इंटरनेट पर सेक्स खोजता रहता है। मजे की बात देखिए यह एक कथित कम्युनिस्ट ग्रुप का मुखिया भी है। इसका एक चेला है, जो इसका प्रतिद्वंद्वी भी है और दोनों मिलकर एक ही जगह झपट्टा मारने की कोशिशों में लगे हुए थे। दोनों को ही मायूसी हाथ लगी या किसी एक के अथवा दोनों के ही वारे-न्यारे हुए, कौन जाने। अब अगर पुलिस प्रशासन या विधि-प्रवर्तन एजेंसियाँ ऐसे लोगों को पकड़कर पेलें तो हम जैसों की आत्मा गच्च हो जाएगी। रही मजदूरों की बात तो उन्हें तो अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी।
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थोड़ी बात माकपा, भाकपा अथवा लिबरेशन मार्का लाल झंडाधारियों की कर लेते हैं। यह पार्टी विषयक लेनिन की प्रस्थापना को क्या सिद्धांत अथवा व्यवहार में मानते हैं। अजी, मानना तो दूर की बात जानते तक नहीं। तो ऐसे परजीवियों और मूर्खों को पुलिस अगर पकड़कर पेले तो भी मेरी आत्मा में खुशी की लहर दौड़ पड़ेगी।
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