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खुद के साथ वक्त बिताने की आदत और परिवार के साथ संपृक्त जीवन जीने की खुशी का कोई मोल नहीं
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खुद के साथ वक्त बिताने की आदत और परिवार के साथ संपृक्त जीवन जीने की खुशी का कोई मोल नहीं

December 19, 2025
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कामता प्रसाद

बच्चों के विरुद्ध होने वाले यौन अपराधों से जुड़ा एक मसला फेसबुक पर तैर रहा है। आज मेरी बीएचयू के प्रोफेसर मनोज कुमार सिंह जी फोन पर बात हो रही थी। वह कंप्यूटर साइंस पढ़ाते हैं। हम दोनों ही इस बात को लेकर सहमत थे कि लॉजिक-रीजनिंग अगर कमजोर हो तो बंदा कंप्यूटर साइंस पढ़-समझ नहीं सकता।
मेरी उम्र 56 साल है जो अगर बहुत अधिक नहीं तो बहुत कम भी नहीं होती। मैंने मेहनत की और भर-भरकर लॉजिक लगाया और वेब डेवलपमेंट सीख लिया। यही नहीं सॉफ्टवेयर बनाना और मोबाइल ऐप बनाना भी मोटा-मोटी आ ही गया। माना कि मुझे बाइपोलर डिसआर्डर है लेकिन इतना तो तय है कि दवाएं काम कर रही हैं और मैं स्वस्थ मनःस्थिति के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। सुखमय-उत्पादक-सक्रिय जीवन।
इस बात को धीरे-धीरे कई साल होने को आ रहे हैं जब पटना के एक ऐसे कम्युनिस्ट नामधारी शख्स से मेरा संपर्क हुआ, जिसके बारे में आज भी मेरी यही राय है कि वह यकीनन बाल यौन-दुराचारी रहा होगा या क्या पता अभी भी हो क्योंकि बुढ़ौती में न कोई सुधरता है और न बदलता है। तथ्यों से निष्कर्ष पर पहुँचने की मार्क्सवादी पद्धति और सादृश्य-निरूपण के जरिए मेरी इस तरह की समझ बनी है। जीवन में भाँति-भाति के विकृत रुचि वाले मनुष्यों को देखा है। सभी ने देखा होता है, मैं कोई अपवाद थोड़े हूँ।
गली-सड़क पर अगर कचरा-पेटी है तो नजर तो सभी की पड़ेगी ही। इसी तरह से समाज में अगर घृणित-विकृत रुचियों वाले लोग हैं तो उनकी भी पहचान-शिनाख्त तो होती ही चलेगी। एक उम्दा इंसान ने इस बाल यौन दुराचारी और उसके आवेगों-भावावेशों को लेकर कहा थाः इसकी रेंज और इंटेसिटी (तीव्रता) देखने लायक है। अगर यह कहीं फोकस्ड रहा होता तो भी मैं इसे कब का माफ कर चुका होता लेकिन यह तो जहाँ-तहाँ यहाँ तक कि फेसबुक की मायावी दुनिया में भी अपने लिए "जुगाड़" ढूँढ़ने की जेहनियत रखता है।
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लेकिन, मजा देखिएः नारीवाद के खोखले नारे के नाम पर, विक्टिम गेम के नाम पर सारे एक सुर में हुआँ-हुआँ करते नजर आए। आभासीय दुनिया में हिजड़ों की फौज आनन-फानन में तलवार भाँजने लगी। पर वास्तव में "विक्टिम" की मदद करने के लिए कोई नहीं आया। थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी का पूरा चक्कर उसे अपने ही दम पर काटना पड़ा, अपने ही पैसे खर्च करने पड़े। इसी घामड़ ने एक चौपतिया में मुस्लिम बुनकरों पर लिखते समय कल्पना के घोड़े दौड़ाए और इस आशय का इशारा किया मानो मुस्लिम कारीगर अरक्षित बच्चों का यौन शोषण करते हों।
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इन पंक्तियों के लेखक के विरोध करने पर वह पंक्ति हटाई गई कि देश में पहले से ही मुस्लिम-नफरत अपने चरम पर है तो हमें सजग रहना होगा। यह घामड़ उस बाल यौन दुराचारी की रसातली मिठास के सारतत्व तक पहुँच पाने में नाकाम है। उसका तर्क यह रहा है कि वह अपना भला-बुरा समझने और अपनी हिफाजत करने में सक्षम-समर्थ है, किसी और को उसका गार्जियन बनने की जरूरत नहीं। पर यहाँ मुद्दे की बात यह है कि मनुष्य के रूप में इस तरह के घिनौने चरित्र क्या कम्युनिज्म के उदात्त आदर्शों को अमल में लाने के लिए कोई भी सार्थक योगदान दे पाएंगे। ऐसे गलीज़ प्राणियों से जो घृणा नहीं कर सकता, वह श्रमिकों से मोहब्बत क्या खाक करेगा। अपने अवसाद-एकाकीपन से उबरने के लिए प्रगतिशील-जनपक्षधर होने का स्वांग भले रचे।
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जब खाली समय काटने को दौड़े, खुद के साथ वक्त बिताने की आदत न हो, परिवार बिखरा-बिखरा सा हो तो पागलों की तरह कभी दिल्ली तो कभी दौलताबाद, बस यही है क्रांतिधर्मिता का मर्म। ईश्वर ऐसे क्रांतिकारियों से मजदूरों को बचाए।
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मज़दूरों को बाँटने के लिए हर शहर में 10 ठो कम्युनिस्ट संगठन और 72 ठो नेता पैदा हो चुके हैं, ये सभी खलिहर हैं। जिस दिन मजदूरों के बीच से नेता-संगठनकर्ता निकलेंगे और वह भी दिहाड़ी करते हुए, उसी दिन मजदूर आंदोलन प्राण फूँक उठेंगे, उसके पहले सब बकवास।