
ग्रामीण श्रमजीवियों से काम की गारंटी का अधिकार छीनने के विरुद्ध MASA का बयान
एक परम जंगरचोट्टे का आत्मकथन और मनरेगा मजदूरः लोग कहते हैं कि मैं बहुत ही संघर्षशील-कर्मठ-मेहनती-अध्यवसायी रहा हूँ। उम्र के 55वें साल में जब मैंने कंप्यूटर भाषाएं और वेब डेवलपमेंट सीखना शुरू किया तो उसकी भी जमकर तारीफ हुई। लेकिन, सच बहुत ही कड़ुआ और उल्टा है। जिस काम में मुझे मजा नहीं आता, वह काम मैं कर नहीं पाता। मैंने तभी तक अनुवाद किया, जब तक मुझे उसमें मजा आया, जिस दिन से किक मिलनी बंद हुई, मैंने अनुवाद करना भी छोड़ दिया। कोडिंग करने में मजा आ रहा है, इसलिए वेबसाइटें बना रहा हूँ। ----------------- तो हे झँटहे कम्युनिस्टों, तुम्हारी मांग यह होनी चाहिए कि मजदूरी प्रथा ही समाप्त हो, ऐसी दुनिया बने कि सब लोग गतिविधि में संलग्न हों, काम कोई न करे।
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हमारे गाँव के मखाड़ू गवाह हैं कि नाले की खुदाई के समय में पूरे गाँव के साथ मैंने भी जमकर मेहनत की थी लेकिन वही अगर मजूरी के लिए करना होता तो शायद मैं नहीं करता। ह्यमेनाइड रोबोट का दौर आ चुका है, काम करे मशीन और वे लोग जिन्हें मजदूर कहा जाता है, खाएं मगही पान। माँग यह होनी चाहिए। लेकिन, हमारे देश के लाल लंगूर अभी भी मजदूरी इतनी कर दो, उतनी कर दो की माला जप रहे हैं। मरो, हरामजादों, तुमसे मेरी कोई सहानुभूति नहीं। ------- कामता प्रसाद
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केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा कानून को बदलकर "विकसित भारत-गारंटी प्रदायक रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून" (वीबी-जीराम-जी कानून) के जरिये ग्रामीण श्रमजीवियों के न्यूनतम 100 दिनों के काम की गारंटी के अधिकार को छीनने के विरुद्ध तीव्र संघर्ष छेड़ें!ग्रामीण श्रमिकों के लिए साल में 300 दिन काम की गारंटी और 1000 रुपये दैनिक मजदूरी सहित अन्य लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर देश भर में सड़कों पर उतरें!देश के श्रमिकों को पूंजीपति वर्ग की 'नंगी-गुलामी' में धकेलने वाली नयी चार श्रम संहिताएँ लागू करने और संविधान विरोधी 'नयी श्रमशक्ति नीति 2025' पेश करने के बाद, अब भाजपा नीत केंद्र सरकार वीबी-जीराम-जी कानून के जरिये लगभग 30 करोड़ ग्रामीण श्रमजीवी जनता से साल में न्यूनतम 100 दिन काम पाने का अधिकार छीन रही है।संविधान के नीति निर्देशक तत्त्व के अनुच्छेद 39(क) और अनुच्छेद 41 के तहत सभी नागरिकों के लिए सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य है। स्वतंत्रता के 60 साल बाद 2005 में यूपीए सरकार ने मनरेगा कानून पास किया जो रोजगार की पूरी गारंटी तो नहीं देता था, लेकिन यह मजदूरों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन था जिससे उन्हें काफी राहत मिल जाती थी। केंद्र सरकार ने उसे खत्म कर दिया और नया कानून ले आई है।नये कानून में ग्रामीण श्रमिकों के लिए साल में काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 करने की बात तो कही गई है, लेकिन इसका मुख्य लक्ष्य श्रमिकों के एक बड़े हिस्से को इस अधिकार से वंचित करना है। पिछले 11 साल से केंद्र में बीजेपी सरकार होने के बावजूद 100 दिन तो नहीं, औसतन 50 दिन ही काम दे सकी। इससे अलग राज्य सरकारों को भी की भी मनरेगा में अतिरिक्त 50 दिन काम देने की जिम्मेदारी थी, वह भी ठीक से पूरी नहीं हुई। इससे स्पष्ट है कि नए कानून में 125 दिन रोजगार देने की बात दिवास्वप्न दिखाने जैसा है और असल में मजदूरों के अधिकारों को छीन लेना है।मनरेगा का मूल मंत्र था—सार्वभौमिक गारंटी; यानी ग्रामीण क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति यदि अकुशल श्रम करने का इच्छुक है, तो उसे काम देना ही होगा। इस सार्वभौमिकता को खत्म करके, वीबी-जीराम-जी कानून रोजगार को केंद्र सरकार की इच्छा और निर्णयों पर निर्भर बना रहा है। अब केंद्र सरकार अधिसूचना जारी कर तय करेगी कि किन ग्रामीण क्षेत्रों में काम दिया जाएगा और उसी आधार पर राज्य सरकारों को काम देने के लिए कहा जाएगा। यह कानून ‘मांग-आधारित काम’ की गारंटी को पूरी तरह समाप्त कर देता है।पुराने कानून में जहाँ ग्राम-सभा के माध्यम से काम की योजना बनाने का अधिकार हासिल था, उसके विपरीत केंद्र सरकार अब इस कानून के ज़रिए अपनी पसंद के अनुसार श्रमिकों की सूची तैयार करेगी। उन्होंने ग्रामीण भारत को तीन हिस्सों में विभाजित किया है। जिस हिस्से को वे "विकसित भारत" मानेंगे, वहाँ के ग्रामीण गरीबों को अब यह काम नहीं मिलेगा। बाकी क्षेत्रों में भी उनकी मर्जी से सूची तैयार की जाएगी। ग्राम सभा या पंचायतों के हाथ से इससे जुड़ी तमाम शक्तियां छीन ली गई हैं। स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार काम निर्धारित करने में ग्राम सभा की जो संवैधानिक भूमिका थी, उसे हटाकर यह कानून एक केंद्रीकृत ढांचा खड़ा कर रहा है, जहाँ तकनीकी जटिलता और व्यापक निगरानी ही मुख्य विशेषता है।मनरेगा के भीतर ही जबरन थोपी गई ‘आधार आधारित भुगतान प्रणाली’ (एबीपीएस) का अनुभव पहले ही इस तरह के केंद्रीकरण के भयानक परिणाम दिखा चुका है-- लाखों ग्रामीण श्रमिकों को लंबे समय तक मजदूरी न मिलना, आधार लिंक की समस्याओं के कारण जॉब कार्ड रद्द होना और तकनीकी त्रुटियों का शिकार होना अब आम बात हो गई है। इस कानून में श्रमिकों को मजदूरी देने की जो पूर्ण जिम्मेदारी केंद्र सरकार की थी, उसे बदल दिया गया है और राज्य सरकारों की नीति निर्धारण की शक्तियां छीन ली गई हैं। साथ ही, इस परियोजना का वित्तीय बोझ योजनाबद्ध तरीके से राज्यों पर डाल दिया गया है, जबकि सभी निर्णय लेने की शक्ति केंद्र सरकार के पास रखी गई है—जिसमें केंद्र की कोई जवाबदेही भी नहीं होगी। वीबी-जीराम-जी में प्रस्तावित राज्य-वार 'नॉर्मेटिव एलोकेशन' नीति के तहत केंद्र सरकार राज्यों को फंड आवंटन के मामले में पूरी तरह से मनमानी शक्ति का उपयोग करेगी। जहाँ मनरेगा के तहत केंद्र और राज्य का खर्च अनुपात 90:10 था। इसका मतलब केंद्र सरकार 90 प्रतिशत रोजगार देती थी और राज्य सरकारों को 10 प्रतिशत देना होता था, वहीं नये कानून में केंद्र ने अपनी हिस्सेदारी घटाकर केवल 60 प्रतिशत कर दी है। राज्यों को 40 प्रतिशत खर्च वहन करने के लिए मजबूर किया जाएगा और निर्धारित आवंटन से ऊपर के किसी भी अतिरिक्त खर्च का पूरा भार भी राज्यों को ही उठाना होगा।इस कानून की धारा 6(ए) एक और भयानक और प्रतिगामी कदम है। यह 'काम के अधिकार' के मूल सिद्धांत का उल्लंघन करती है। इस धारा के तहत, खेती के व्यस्त सीजन के दौरान लगातार 60 दिनों तक काम देने पर रोक लगा दी गई है। इसके परिणामस्वरूप, उस समय काम के इच्छुक और जरूरतमंद ग्रामीण श्रमिकों को जबरन काम से वंचित किया जाएगा। हम सभी जानते हैं कि खेती में रोजगार घट रहा है। मजदूर परिवारों की संख्या बढ़ रही है। खेती में बढ़ता मशीनीकरण और आधुनिक तकनीकों का प्रयोग हो रहा है यानी मजदूर खेती के काम से बाहर हो रहे हैं। दो महीने के ब्लैकआउट का क्या मतलब बनता है? नए कानून में खेती के पीक सीजन में दो महीने काम बन्द करना अन्यायपूर्ण है। यदि खेती के पीक सीजन में दो महीने काम नहीं मिलेगा तो मजदूरी और गिरेगी। इसके साथ ही यह प्रावधान विशेष रूप से महिला श्रमिकों पर घातक प्रभाव डालेगा। खेती में रोजगार घटते जाने के कारण ही रोजगार गारंटी के दिन बढ़ाए जाने की मांग उठती रही है।इसके अतिरिक्त, नया कानून सभाओं की भूमिका और महत्व को पूरी तरह खत्म कर रहा है। मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण श्रमिकों में अपने अधिकारों के प्रति एक चेतना जागी थी और वे कुछ हद तक आत्मनिर्भर हुए थे। लेकिन नया कानून लागू होने पर ग्रामीण श्रमिकों को फिर से मालिकों और धनी किसानों पर निर्भर होना पड़ेगा। इसके अलावा, कार्यस्थल पर श्रमिकों के लिए आवश्यक सुविधाएं जैसे—पीने का पानी, टेंट, बच्चों के लिए बिस्कुट, दूध, खिलौने, पालना घर, मेडिकल किट और काम के औजारों के बारे में इस कानून में कोई बात नहीं की गई है। अनुच्छेद 32 में सद्भावना से की गई कार्रवाई का जिक्र है जिसका अर्थ है-- जिला कार्यक्रम समन्वयक, कार्यक्रम अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ, जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 2 के खंड (28) के अर्थ में एक लोक सेवक है, या जिसे लोक सेवक माना जाता है, इस अधिनियम या इसके तहत बनाए गए नियमों या योजनाओं के तहत सद्भावना से किए गए या किए जाने के इरादे से किए गए किसी भी काम के संबंध में कोई मुकदमा, अभियोजन या अन्य कानूनी कार्यवाही नहीं की जाएगी। कानून के उल्लंघन पर मात्र जुर्माना अधिकतम 10 हजार रुपए का प्रावधान है जबकि सजा कारावास की होनी चाहिए। यह पहले भी कमी थी मनरेगा में जुर्माना एक हजार रुपए था। यानी कर्मचारियों और अधिकारियों के श्रमिक-विरोधी रवैये, लापरवाही, लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी कठोर दंडात्मक कार्रवाई का भी उल्लेख नहीं है। यानी भ्रष्टाचार और लापरवाही का रास्ता पूरी तरह खुला रखा जा रहा है। काम के दौरान मृत्यु होने पर मुआवजे या भत्ते का भी कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। हकीकत में, केंद्र सरकार पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट्स को सस्ता श्रम उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सुनियोजित तरीके से मनरेगा को नष्ट कर रही है।हम मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) की ओर से वर्तमान केंद्र सरकार के इस अन्यायपूर्ण कानून को पूरी तरह वापस लेने की मांग करते हैं। हमारा मानना है कि पुराने मनरेगा कानून में भी कई सीमाएं थीं और उसमें भ्रष्टाचार भी था, फिर भी संघर्षों के माध्यम से उस कानून से ग्रामीण गरीबों को कुछ रोजगार मिल पा रहा था। भाजपा सरकार का वर्तमान कानून ग्रामीण श्रमजीवियों के संवैधानिक अधिकार पर एक भयानक हमला है।आज यह स्पष्ट हो गया है कि भारत की फासीवादी शक्तियों द्वारा संचालित केंद्र सरकार ने पूंजीपति वर्ग के इशारे पर धर्म, जाति और लिंग से ऊपर उठकर देश की श्रमजीवी जनता को ही अपने आक्रमण का मुख्य लक्ष्य बनाया है। इसलिए, मासा का मानना है कि इसके खिलाफ शहर-गांव, संगठित-असंगठित क्षेत्र और धर्म-जाति-लिंग के भेदभाव को भुलाकर सभी श्रमजीवी जनता को एकजुट होकर सड़कों पर उतरना होगा। एक व्यापक प्रतिरोध संघर्ष खड़ा करना होगा। मासा देश की श्रमजीवी जनता को एकजुट कर उस संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ने के लिए संकल्पबद्ध है।क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,केंद्रीय समन्वय टीममजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA)



