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अंग्रेज न आए होते तो दलित-पिछड़े बनते कारखानों के मालिक, राजाओं-नवाबों से लेते लोहा और बाभनों-ठाकुरों की मुंडिया काटकर लाते जनतंत्र
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अंग्रेज न आए होते तो दलित-पिछड़े बनते कारखानों के मालिक, राजाओं-नवाबों से लेते लोहा और बाभनों-ठाकुरों की मुंडिया काटकर लाते जनतंत्र

May 7, 2026
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ब्रिटिश साम्राज्यवादी लूट से देश की सभी जातियों और धर्मों के गरीबों का नुकसान हुआ है। सबसे अधिक नुकसान दलितों व पिछड़ों का हुआ है। मगर इन वर्गों के अधिकांश बुद्धिजीवी साम्राज्यवादी लूट के समर्थक बने हुए हैं। शायद वे विकास की गति के नियमों को नहीं समझ रहे हैं।

अगर देश का स्वतंत्र और स्वाभाविक विकास हुआ होता, तो हमारी दस्तकारी ही बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग का रूप ले लेती और यही मैन्युफैक्चरिंग आगे बढ़कर बड़े उद्योगों का रूप ले लेती। इस तरह अगर हमारे देश में स्वतंत्र रूप से पूँजीवाद का विकास हुआ होता, तो कपड़े की मिलों के मालिक कोरी और जुलाहों में से बनते, डेयरी उद्योगों के मालिक अहीरों व गड़ेरियों में से होते, बड़े-बड़े स्लॉटर हाउस के मालिक कसाइयों में से होते, चमड़े के उद्योगों के मालिक चमारों में से बनते, राइस मिलों और आटा मिलों के मालिक कृषक जातियों में से निकलते, कृषि का औद्योगीकरण करके कृषक जातियों में से पूँजीपति बनते, लोहे के कारखानों के मालिक लोहारों में से बनते। इसी तरह अन्य दस्तकार जातियों में से पूँजीपति निकलते।

और यही दबे-कुचले वर्गों में से बने हुए पूँजीपति आगे चलकर मजदूरों और किसानों की अगुवाई करके सामंतवाद का उन्मूलन करते। यही लोग जोतने वालों को जमीन का हक दिलवाते और लोकतंत्र के मालिक बन जाते। इस तरह दस्तकार और कृषक वर्गों में से ही एक नया शासक वर्ग पैदा होता। चूँकि अधिकांश पूँजीपति दबे-कुचले वर्गों में से होते, इसलिए इन्हें कोई भी नीच या अछूत बनाकर नहीं रख पाता।

विकास का यह खाका कोई हवा-हवाई कल्पना नहीं है। इंग्लैंड, फ्रांस और यूरोप के अधिकांश देशों में इसी तरह का स्वतंत्र विकास हुआ था। वहाँ लगभग सारे पूँजीपति दस्तकारों और कृषक जातियों में से ही निकले थे। उसी तरह भारत के दस्तकार भी दस्तकारी से मैन्युफैक्चरिंग की तरफ बढ़ चुके थे, मगर अँग्रेजों ने भाप के इंजन के बल पर हमारी मैन्युफैक्चरिंग और दस्तकारी को ध्वस्त कर दिया। भाप के इंजन का आविष्कार हो जाने से अँग्रेजों का विकास तीव्र हो गया। वे लोग हमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से बहुत पीछे ढकेलते हुए बलपूर्वक गुलाम बना लिए।

प्राचीन काल में दलितों-पिछड़ों में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षिक पिछड़ापन था, उसका कारण सामंती अर्थव्यवस्था पूरी तरह जिम्मेदार थी, जिसमें मनुस्मृति जैसे विधान लागू रहे होंगे। परंतु आज भारत में सभी जातियों और धर्मों के लोगों में जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षिक पिछड़ापन है, उसमें ब्रिटिश साम्राज्य और उनके भारतीय वारिसों की भूमिका सबसे अधिक है।

परंतु भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थन करने वाले लोग सवाल खड़े करते हैं कि—

1. अगर अँग्रेज दलितों के हितैषी नहीं थे, तो संपत्ति का अधिकार क्यों दिया?

उत्तर:

इस सवाल का जवाब आपके आसपास मौजूद है। अँग्रेजों ने संपत्ति का अधिकार दिया, मगर संपत्ति नहीं दी। इसे देखना है तो आज भी दलित बस्तियों में जाकर देख लीजिए— लगभग 90 प्रतिशत मकान सरकारी मदद और कर्ज से बने हैं। आज भी सबसे ज्यादा गरीबी और बेरोजगारी दलितों में ही है। पाँच किलो राशन पर दलितों की अस्सी प्रतिशत आबादी आश्रित हो चुकी है।

अगर अंग्रेज बड़े हितैषी थे, तो उस वक्त अंग्रेजी हुकूमत के हाथ में पूरा देश था। वह हुकूमत चाहती, तो अछूतों को भी जमींदार बना सकती थी, मगर किसी भी अछूत को जमींदार नहीं बनाया। किसी भी दलित किसान को जमीन का मालिक नहीं बनाया।

क्रांतिकारी कम्युनिस्टों ने तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह, नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह समेत सैकड़ों बड़े-बड़े आंदोलन चलाए, लाखों कुर्बानियाँ दीं, तब सरकार ने दबाव में आकर थोड़ी जमीनों के पट्टे आदि दिए। वरना तीन पीढ़ी पहले सारी जमीन जमींदारों की थी और दलितों में से एक भी जमींदार नहीं था।

2. अगर अँग्रेज दलितों के हितैषी नहीं थे, तो शिक्षा का अधिकार क्यों दिया?

उत्तर:

इस सवाल का जवाब भी किसी किताब में मत खोजिए। सीधे दलित बस्तियों में जाइए। वहाँ देखिए— 99 प्रतिशत दलित आज भी आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा से वंचित हैं। उनके पास जो बीए, एमए जैसी डिग्रियाँ हैं, वे निरर्थक हैं। वे इन डिग्रियों के बल पर एक समय का भोजन भी नहीं जुटा सकते।

ये लोग शोषक वर्गों का फर्जी इतिहास, घिसा-पिटा विज्ञान, अवैज्ञानिक एवं भाववादी दर्शन, गुलामी समर्थक और क्रांति-विरोधी पढ़ाई पढ़कर अशिक्षितों से भी ज्यादा खतरनाक बन चुके हैं। यही लोग आज जातीय उन्माद फैला रहे हैं। ये लोग ऐसे अंधभक्त बन गए हैं, जो खुद को बहुत जागरूक समझते हैं।

3. अगर अँग्रेज दलितों के हितैषी नहीं थे, तो फिर आरक्षण क्यों दिया?

उत्तर:

इस सवाल का जवाब भी आपकी आँखों के सामने मौजूद है। जरूरत है ईमानदारी से समझने की। लोग सोचते हैं कि आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों पर रहम खाकर आरक्षण दिया गया, मगर ऐसा नहीं है।

ब्रिटिश इंडिया गवर्नमेंट ने दलितों में से उभरती हुई प्रतिभाओं को आत्मसात करके अपनी राजसत्ता को मजबूत बनाने के लिए आरक्षण का प्रावधान लागू किया था। मार्क्स ने बहुत पहले ही कहा था—

“शोषक वर्ग की राजसत्ता उतनी ही मजबूत और टिकाऊ होती है, जितना कि वह शोषित-पीड़ित वर्गों की उभरती हुई प्रतिभाओं को आत्मसात करने में सक्षम होती है।”

मार्क्स के इस कथन पर विश्वास मत कीजिए, आप खुद व्यवहार में जाकर देखिए कि दलित जातियों के चुने गए प्रतिनिधि किस तरह शोषक वर्गों की राजसत्ता को मजबूत कर रहे हैं। किस तरह वे जातीय संघर्षों को बढ़ावा देकर जनता को जनता से लड़ाने के लिए अपना तन-मन-धन लगा रहे हैं।

पूनापैक्ट से डॉक्टर अंबेडकर भी खुश नहीं थे। उन्होंने कहा था—

“इससे दलाल और भड़वे पैदा होंगे।”

अंबेडकर की बात आज हमारी आँखों के सामने सच होती दिखाई दे रही है। पूनापैक्ट का फायदा उठाकर जो लोग शासक वर्गों के खेमे में शामिल हो गए हैं, वे किस तरह जातीय उन्माद फैलाकर जनता को जनता से लड़वा रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

दलाल और भड़वे पूनापैक्ट से बहुत खुश हैं। अँग्रेजों ने हमारे करोड़ों दस्तकारों और लाखों मैन्युफैक्चररों को उजाड़ दिया। इसमें लगे करोड़ों लोगों को बेरोजगार और कंगाल बनाकर सड़क पर ला दिया। बदले में एकाध हजार लोगों को विधायक और सांसद बना दिया और दो-चार लाख लोगों को मामूली तनख्वाह वाली नौकरी दे दी, तो अँग्रेज बड़े हितैषी कैसे बन गए?

यह तो उसी तरह हुआ कि कोई हमारा पूरा घर लूट ले और फिर दो-चार रुपये दान कर दे, और हम उसे बड़ा दानदाता घोषित करके उसकी इबादत शुरू कर दें। साम्राज्यवादी लूट के समर्थन में आकर कुछ दलित बुद्धिजीवी ऐसा ही कर रहे हैं। अंधभक्ति छोड़कर इस सवाल पर विचार किए बिना चेतना आगे नहीं बढ़ सकती।

— रजनीश भारती

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