
प्रस्तुत है अलका प्रकाश के कविता संग्रह ’अलंघ्य है प्रेम’ की पुस्तक समीक्षा
डॉ. प्रवीण कुमार द्विवेदी
डॉ. अलका प्रकाश, सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भय्या) विश्वविद्यालय, प्रयागराज द्वारा विरचित “अलंघ्य है प्रेम” शीर्षक कविता-संग्रह का आज मैंने अध्ययन किया। इसका शीर्षक स्वयं ही व्याख्या की अपेक्षा रखता है। इस पुस्तक की भूमिका में प्रो. राजेन्द्र कुमार, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज ने कहा है कि प्रेम मनुष्य की सबसे विलक्षण अनुभूति है।

यह वह अनुभूति है जो समय, समाज, सत्ता और तर्क की सीमाओं को बार-बार लांघने का प्रयास करती है, किन्तु स्वयं कभी पूरी तरह लांघी नहीं जा सकती। “अलंघ्य है प्रेम” इसी विडम्बना और इसी सत्य का काव्यात्मक प्रतिफल है। वास्तविक रूप से देखा जाय तो प्रेम की परिभाषा देना अत्यन्त कठिन है- किसी ने उसे सर्वस्व समर्पण कहा, तो किसी ने उसे पंचम पुरुषार्थ की संज्ञा दी। प्रेम के विषय में भक्त कवियों का चरमोत्कर्ष प्रदर्शित हुआ है-
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पण्डित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय ॥
यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहीं।
शीश काटि भुईयां धरो तब पैठो घर माहीं॥
यह प्रेम निश्चित रूप से भावनाओं का वह उद्रेक है, जिसमें प्रत्येक प्राणी रमण करना चाहता है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों का प्रेम स्वयं ही अनूठा है। जहाँ स्त्री पुत्री, सखी, पत्नी और माता के रूप में अपने कर्त्तव्यों के निर्वहण को प्रतिफलित करती है तो वहीं पुरुष पुत्र, सखा, पति और पिता के रूप में अपने उत्तरदायित्वों का अनुपालन करने का प्रयत्न करता है। प्रेम जीवन का अपर अभिधान है। उसके बिना सब कुछ अधूरा है। उसे न कोई चुरा सकता है, न बाँट सकता है, न छीन सकता है, न जला सकता है, न बहा सकता है। यदि आपको वास्तव में प्रेम होता है तो उसके विषय में केवल आपका अनुभव ही अन्तिम प्रमाण है क्योंकि यह तत्त्व निश्चयेन अनिर्वचनीय है। इसको कितना भी शब्द दिया जाय ; इसके विषय में कितना भी लिखा जाय ; अत्यल्प ही है।
इस कविता संग्रह में कुल 65 कविताएँ हैं ; जिनमें प्रायः अतुकान्तता में ही अपने महीन भावों को बखूबी प्रदर्शित किया गया है। कवियित्री ने करूणा, ममता, संवेदना को अपने शब्दतार से झंकृत कर दिया है। कवयित्री कहती हैं –
मैं नहीं हूँ किसी दृश्य में
हर परिदृश्य से कर दी गई बाहर
प्रत्येक समूह से बहिष्कृत
अकेले कमरे का एकान्त
जिसमें हवा बहुत कम
सांस नहीं ली जाती
दरवाजा बाहर से बंद
कमरे के बाहर भी बहुत शोर
इतना कोलाहल आपाधापी
जाने कैसी आवाज़ें
तेजी से गूंजते अट्टहास
सामने होतीं व्यंग्य मिश्रित मुस्कुराहटें
कवियित्री ने स्त्री-संवेदना को चरितार्थ करते हुए कहा है-
लड़की का कोई घर नहीं होता
कोई जाति नहीं होती ; मिसेज अ, ब, स........
स्त्रियाँ बहुत भावुक होती हैं। करूणा के कारण अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाती और रोने भी लगती हैं। कवयित्री ने “तुम क्यों रोती हो” शीर्षक कविता में कहती हैं-
जब तुम्हें महत्त्वाकांक्षी सिद्ध किया गया था
और तुम रो पड़ी थी
दस साल मेहनत से घर चलाने के बाद
डिग्रियों के लिए पच्चीस साल की आँख फुटौवल
देख इतना निरादर
कन्यादान के विषय में कवयित्री कहती हैं –
डोली में बिठा दी गयी
किताबें खत्म करने से पहले
यह कुछ अभूतपूर्व तो था नहीं
ऐसा तो होता ही है।
इस प्रकार “अलंघ्य है प्रेम”, डॉ. अलका प्रकाश (सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भय्या) विश्वविद्यालय) द्वारा रचित एक अत्यन्त संवेदनशील कविता-संग्रह है। इस संग्रह की भूमिका प्रो. राजेन्द्र कुमार (पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) ने लिखी है, जिसमें उन्होंने प्रेम को मनुष्य की सबसे विलक्षण और अनिर्वचनीय अनुभूति बताया है। “अलंघ्य है प्रेम” – यह शीर्षक स्वयं में एक गहन दार्शनिक संकेत समेटे हुए है। प्रेम वह अनुभूति है जो समय, समाज, सत्ता और तर्क की सीमाओं को लांघने का प्रयास करती है, पर स्वयं पूर्णतः परिभाषित या सीमाबद्ध नहीं की जा सकती। यह उसकी विडम्बना भी है और उसकी महिमा भी। यहाँ प्रेम समर्पण, त्याग और आत्म-विलय की पराकाष्ठा है। इस संग्रह में कुल 65 कविताएँ हैं, जिनमें अधिकांश अतुकान्त (Free Verse) शैली में रचित हैं। कवयित्री ने करूणा, ममता और संवेदना को अत्यन्त सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया है। उनकी भाषा सरल होते हुए भी अत्यन्त प्रभावोत्पादक है। यहाँ स्त्री की अस्तित्वगत पीड़ा, सामाजिक बहिष्करण और आत्म-संघर्ष का चित्र अत्यन्त मार्मिक ढंग से उभरता है। डॉ. अलका प्रकाश की कविताओं में स्त्री-जीवन की बहुआयामी स्थितियाँ प्रतिबिम्बित होती हैं। वे स्त्री की पहचान, अस्मिता और संघर्ष को अत्यन्त सशक्त स्वर देती हैं। यह पंक्तियाँ स्त्री की सामाजिक पहचान के संकट को उद्घाटित करती हैं—जहाँ उसका नाम, घर और अस्तित्व तक किसी और से परिभाषित होता है। इस कविता में स्त्री की महत्त्वाकांक्षा को दोष की तरह प्रस्तुत किए जाने की विडम्बना दिखाई देती है। जब तुम्हें महत्त्वाकांक्षी सिद्ध किया गया था
और तुम रो पड़ी थी। यहाँ स्त्री के श्रम, उसकी शिक्षा और उसके आत्मसम्मान की अवमानना पर तीखा प्रश्न है। कन्यादान द्वारा कवयित्री कन्यादान की परम्परा को भी प्रश्नांकित करती है। पंक्तियाँ स्त्री के अधूरे स्वप्नों, बाधित शिक्षा और सामाजिक रूढ़ियों की ओर संकेत करती हैं। “ऐसा तो होता ही है” जैसी पंक्ति में व्यंग्य की गहरी धार छिपी है। प्रेम जीवन का अपर अभिधान है। कवयित्री के अनुसार प्रेम जीवन का पर्याय है। वह न चुराया जा सकता है, न छीना, न जलाया, न बहाया जा सकता है। वह केवल अनुभव का विषय है—अनिर्वचनीय, किन्तु सर्वस्व।
प्रेम यहाँ केवल स्त्री-पुरुष सम्बन्ध तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का व्यापक विस्तार है—करुणा, ममता, त्याग और आत्मिक एकात्मता का समुच्चय। इस प्रकार “अलंघ्य है प्रेम” केवल प्रेम की काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि यह स्त्री-अस्तित्व, सामाजिक संरचना और मानवीय संवेदनाओं की गहन पड़ताल है। डॉ. अलका प्रकाश ने अपनी अतुकान्त शैली में प्रेम को दार्शनिक ऊँचाई और स्त्री-संवेदना को सामाजिक संदर्भ प्रदान किया है। यह संग्रह पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है और यह स्मरण कराता है कि—
प्रेम को लांघा नहीं जा सकता; उसे केवल जिया जा सकता है। आप सभी इस पुस्तक को पढ़ेंगे ऐसा विश्वास है।



