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बलबीर पुंज : शालीन असहमतियाँ, वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी जी की फेसबुक वॉल से साभार
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बलबीर पुंज : शालीन असहमतियाँ, वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी जी की फेसबुक वॉल से साभार

April 20, 2026
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इसी महीने की सात तारीख़ को मैंने एक तल्ख़ सा उलाहना लिखकर बलबीर पुंज के बनाए ग्रुप में भेजा और बाहर निकल गया. ठीक 12 दिन बाद आज सुबह व्हाट्सऐप पर Hemant Sharma का मैसेज था: “बलबीर पुंज चले गए.”विश्वविद्यालय से निकलने के बाद दिल्ली के जिस अख़बार में मैंने ट्रेनी रिपोर्टर की नौकरी शुरू की वो विचारधारा-प्रेरित पत्रकारों का गढ़ हुआ करता था. वहाँ संघ की विचारधारा के लोग तो थे ही, हर रंग के समाजवादी, सर्वोदयी और चंद वामपंथी पत्रकार भी थे. सब साथ काम करते थे और विचारधारा को लेकर तल्ख़ियाँ कम से कम हुआ करती थीं. हिंदी अख़बार जनसत्ता को शुरू हुए तीन-चार बरस हुए थे. एक्सप्रेस ग्रुप का मतलब होता था इंडियन एक्सप्रेस. एक्सप्रेस में काम करने वाले रिपोर्टरों का रौबदाब देखते ही बनता था. हालाँकि बहुत कम समय में जनसत्ता ने हिंदी पट्टी के पाठकों में अपनी सिक्का जमा लिया था, लेकिन एक्सप्रेस ग्रुप के भीतर उन्हें अभी वो मेआर नहीं मिला था जिसके वो हक़दार थे. हिंदी में काम करने वाले ख़ुद को तो कमतर समझते ही थे, उन्हें “अँग्रेज़ी वाले” भी बहिरागत जैसा ही मानते थे. (या शायद मेरी निगाह में ही ऐसा था).लेकिन दो ऐसे वरिष्ठ संपादक थे जिन्होंने हिंदी और अँग्रेज़ी के बीच की अदृश्य दीवार को तोड़कर मुझ जैसे ट्रेनी रिपोर्टर से दोस्ताना अंदाज़ में बात की – इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ संपादक हिरण्मय कार्लेकर और फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस के वरिष्ठ संपादक बलबीर पुंज. पता नहीं कैसे ये बात फैली कि इलाहाबाद से आया ये ट्रेनी वामपंथी है. कार्लेकर साहब ने सबसे पहले कलकत्ता में अपने छात्र जीवन की कहानियाँ सुनाईं और बताया कि वो वामपंथी नहीं थे बल्कि छात्र परिषद से जुड़े थे. बलबीर पुंज अक्सर एक्सप्रेस बिल्डिंग की लॉबी में मुझे देखकर रुक जाया करते थे और फिर तुरंत बातचीत का रुख़ विचारधारा की ओर ही मुड़ जाता था. मुझे पहली मुलाक़ात में ही पता चल गया कि पुंज साहब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं और उनके लिए हिंदुत्व की विचारधारा ही अटल सत्य है.वो अक्सर मुझे रोककर इस्लाम, क़ुरआन, मुस्लिम देशों में मची मारकाट, भारत के विभाजन में मुसलमानों की भूमिका पर अपने विचार मुझे बताते रहते. ज़ाहिर है मुसलमानों के प्रति संघ का अनुदार दृष्टिकोण ही पुंज साहब के विमर्श आधार हुआ करता था. मैं हमेशा उनसे असहमति जताता था और वो हमेशा मुस्कुराकर करते – राजेश जी, इस्लाम के असली चरित्र को समझना ज़रूरी है. उन्हें पता था कि वो मुझे कनवर्ट नहीं कर सकते और मुझे पता था कि वो भी कभी अपने विचारों से नहीं डिगेंगे. पर कुछ तो ऐसा था कि विचारधारात्मक तौर पर दो विपरीत छोरों पर खड़े दो लोगों के बीच कभी वैसी तिक्तता नहीं आई जैसी आज दिखाई पड़ती है.जनसत्ता छोड़कर जब मैं आउटलुक पत्रिका में काम करने के लिए गया तब भी पुंज साहब से संपर्क बना रहा. हालाँकि पत्रिका के संपादक विनोद मेहता को संघ से प्रभावित लोग “सोनिया का चमचा” कहते थे लेकिन मेहता साहब का कहना था कि पत्रिका के पन्नों में हर विचारधारा का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. इसलीए वो बलबीर पुंज और तरुण विजय जैसे संघ से जुड़े पत्रकारों को लिखने के लिए आमंत्रित करते रहते थे ताकि अगर अरुंधति रॉय के विचार पत्रिका में छपें तो आरएसएस की सोच भी सामने आए.आउटलुक के बाद लंबे समय तक पुंज साहब से मेरा संपर्क ख़त्म हो गया. लगभग दस साल बाद जब मैं हिंदुस्तान लौटा तो वो संपर्क फिर से जीवंत हो उठा. शायद हम किसी समारोह में मिले थे, और पुंज साहब उसी गर्मजोशी, उसी स्नेहिल मुस्कान के साथ मिले जैसे वो मुझसे पहली बार मिले थे. उस वक़्त वो राज्यसभा सांसद थे. कुछ समय बाद उन्होंने सच (SACH – Society Against Communalism and Hatred) नाम से एक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया. संघ पर सांप्रदायिकता और घृणा फैलाने के आरोपों का प्रतिकार करने (और उनसे बदला लेने का भी) का शायद ये उनका अपना तरीक़ा था. जैसे आजकल सोशल मीडिया में संघ समर्थक कुछ लोग धर्मनिरपेक्ष और उदार विचारों वालों को फ़ासिस्ट कहने लगे हैं.पता नहीं क्या सोचकर पुंज साहब ने कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा वाले उस व्हाट्सऐप ग्रुप में मुझे शामिल कर लिया. मैं अकेला “सिकुलर” – बाक़ी लगभग सभी हिंदुत्ववादी. (अगर सुधींद्र कुलकर्णी अब ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहने लगे हों तो वो भी उस ग्रुप के सदस्य हैं). उस ग्रुप में दिनरात गोडसे का गुणगान होता था, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू को देश का दुश्मन या बदचलन साबित करने के लिए सोशल मीडिया पर चलाए जाने वाले विमर्श को जगह मिलती थी (है), लेकिन साथ ही उसमें बलबीर पुंज का लिखा भी पढ़ने को मिल जाता था. वो धुआँधार लिखते थे, लगातार लिखते थे – हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में. उनके सभी लेख हिंदुत्व की विचारधारा से ओतप्रोत होते थे.जब जब उस ग्रुप में महात्मा गाँधी को निशाना बनाते हुए अनर्गल और निराधार बातें कही गईं, या जब जब नत्थूराम गोडसे को राष्ट्रभक्त संत के तौर पर दिखाने की कोशिश की गई तब तब मैंने असहमति में हाथ उठाया. इसके लिए एक वरिष्ठ पत्रकार और एक कथित पत्रकार (नाम जानबूझकर नहीं लिखा जा रहा है) ने मुझे “राक्षसी की योनि से उत्पन्न” तक कहा. संघ के एक स्तंभकार ने मुझे “धूर्त और कुटिल” विशेषणों से कृतार्थ किया. कई एक बार ख़ुद बलबीर पुंज के लिखे पर भी मैंने असहमति जताई. वो मेरे तर्कों का जवाब अपने तर्कों से देते थे लेकिन कभी भूल से भी उन्होंने उपरोक्त विद्वानों की तरह गाली-गलौज को अपनी शब्दावली में नहीं आने दिया. हमारी असहमतियाँ बनी रहीं और उनका मेरे प्रति स्नेह और मेरा उनके प्रति आदर भी.तीन अप्रैल को मेरी नज़र से गुज़रा एक वीडियो भयानक था. उसमें 15-20 बरस की बच्चियाँ डीजे की धुन पर नाच रही थीं और डीजे में बज रहे गाने के साथ ख़ुद भी मगन होकर नाच रही थीं – “भारत में जो देशद्रोही हैं, उनकी माँ *$%@*&#!” ये कैसा राष्ट्रवाद था? ये कैसा देशप्रेम था? हिंदुत्व के नाम पर ये कैसी “संस्कारी” पीढ़ी तैयार की जा रही है? कौन हैं वो लोग जो महिलाओं को सरेआम शब्दों से निर्वस्त्र कर रहे हैं और ये काम ख़ुद महिलाओं से ही करवा रहे हैं?ये सब सवाल मैं उनसे पूछना चाहता था जो ख़ुद को भारत की प्राचीन संस्कृति के प्रहरी मानते हैं. भारत माता को परम वैभव तक ले जाने का दावा करते हैं. कहते नहीं थकते कि भारत में नारी की पूजा होती है और इसी वजह से यहाँ देवताओं का वास है. देवत्व का ढोंग करते हुए सड़कों पर दैत्य नृत्य कर रहे हैं और इसका उत्सव मनाया जा रहा है. किससे पूछता?मैंने अपनी बात बलबीर पुंज और रामबहादुर राय तक पहुँचाने का फ़ैसला किया. मेरी नज़र में ये दो व्यक्ति ही ऐसे थे जिनसे मैं खुलकर असहमति ज़ाहिर कर सकता था.मैंने लिखा: “(चेतावनीः वीडियो में अश्लील शब्दों का प्रयोग किया गया है)। इस वीडियो को यहाँ पोस्ट करने के लिए मैं अग्रिम माफ़ी माँगता हूँ। लेकिन आप लोगों को ये जानना ज़रूरी है कि कैसी संस्कारी पीढ़ी तैयार की जा रही है। छोटी-छोटी बच्चियों के मुँह से मातृ-विरोधी, महिला-विरोधी अश्लील गालियाँ ऐसे निकल रही हैं जैसे वो कोई पवित्र बात कर रही हों। बलबीर पुञ्ज साहब, रामबहादुर राय साहब - आप कैसे इस पागलपन को अनदेखा कर सकते है?”जवाब नहीं आया. मैंने फिर लिखा: “मैं उम्मीद कर रहा था कि संस्कारी बंधुओं-भगिनियों के इस ग्रुप में किसी की तो आत्मा कलपेगी, कोई तो ये कहने का साहस करेगा कि भारत की नई पीढ़ी के दिमाग़ को राष्ट्रभक्ति के नाम पर जो लोग सड़ा रहे हैं उनसे जवाब माँगा जाना चाहिए, उन्हें राष्ट्र विरोध का ऐसा महापाप करने से रोका जाना चाहिए। इस ग्रुप की विदुषी माताओं-बहिनों में से कोई तो ये कहेगा कि छोटी-छोटी बच्चियों से महिला विरोधी गालियाँ दिलवाना बलात्कार से कम अपराध नहीं है। लेकिन अफ़सोस कि सन्नाटा टूटा नहीं। किसी ने -एक व्यक्ति ने भी नहीं - विरोध में हाथ उठाने की हिम्मत नहीं की, हालाँकि मैंने नाम लेकर अपील की थी। क्या डॉक्टर हेडगेवार जी और परम पूज्य गुरूजी ने २१वीं शताब्दि में हिन्दुओं की ऐसी ही कुन्द बुद्धि पीढ़ी तैयार करने का स्वप्न देखा था? क्या छोटी बच्चियों को भ्रष्ट करने की इस कोशिश के खिलाफ अखबारों में किसी ने भी लेख लिखे? किसी ने भी सवाल उठाया कि जहां दूसरे देशों में नई पौध को सँवार कर उन्हें वैज्ञानिक, ओलम्पिक चैम्पियन और बेहतरीन इंसान बनाने के प्रयास चल रहे हैं, हम अपनी बच्चियों को सड़क छाप गुंडों-मवालियों की तरह माँ-बहिन की गालियाँ देना सिखा रहे हैं? कहाँ गया सनातनी संस्कार, कहाँ गए ऋषि-मुनियों और महापुरुषों की सीख? कहाँ गए प्राचीन भारत के मूल्य? आप में से एक-एक व्यक्ति जवाबदेह है!”जवाब नहीं आया.मैंने अंतिम संदेश सात अप्रैल को लिखा. इस बार सीधे बलबीर पुंज को संबोधित करते हुए:“@Balbir Punj जी, ***** और एक स्वयंभू इतिहासकार से मैंने माँ की गाली खाई, हर तरह की फेक न्यूज़ फैलाई गई और महात्मा गाँधी के ख़िलाफ़ घृणास्पद बातें इस ग्रुप में की गईं। जितना संभव था मैं प्रतिरोध करता रहा पर पुंज साहब आपके एहतराम में आज तक इस ग्रुप को छोड़ा नहीं। बार बार सोचता था कि आरएसएस के इस ग्रुप में आपने मुझे शामिल किया है तो आपका मान रखना ही होगा। लेकिन अब महसूस होने लगा है कि आप भी गलत को गलत कहने से बचते हैं. मैं उम्मीद कर रहा था कि आप तो कम से कम एक वाक्य लिखेंगे कि बच्चियों को कुसंस्कारी बनाने वाले समाज के दुश्मन हैं। पर आप चुप रहे। इसलिये लगता है कि इस ग्रुप में मेरी उपस्थिति अब मुझे खुद अपनी नज़रों में गिरा देगी। धन्यवाद.”अब अफ़सोस करके क्या होगा कि मैंने ग्रुप को अलविदा कहने से पहले पुंज साहब को फ़ोन क्यों नहीं किया, क्यों मैं उनकी बात सुने बग़ैर निकल गया? अब ये सोचकर क्या होगा कि पुंज साहब ने तो हार्ट सर्जरी करवा ली थी और बताया था कि हार्ट अटैक होने से पहले ही बचाव कर लिया गया? अब उनसे हुई तमाम मुलाक़ातों, संवादों और असहमतियों को रील की तरह अपने ज़ेहन में बार-बार घुमाने से क्या होगा? बेहद असहिष्णु विचारधारा में रचे-पगे उस सहिष्णु व्यक्ति को और ज़्यादा न जान पाने, उनसे और ज़्यादा संवाद न कर पाने का मलाल करके भी क्या होगा?अलविदा, पुंज साहब. (तस्वीर साभारः X)#RSS #BalbirPunj #Hindutva #condolences #RIPराजेश जोशी

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