
"आदमी मजबूर है और इस क़दर मजबूर है!"
बात शहर के एक फूड प्लाजा की है। एक मैडम सपरिवार लंच पर आई हुई थीं। काफ़ी देर से तमाशा लगा रखा था, रिसेप्शनिस्ट को बुलाकर जली-कटी सुनाए जा रही थीं। वह इस क़दर नाराज़ थीं कि रिसेप्शनिस्ट को बोलने का मौक़ा ही नहीं दे रही थीं।
इत्तेफ़ाक से हम भी वहीं मौजूद थे। हमने ओखली में सर डालते हुए मैडम से बोल ही दिया कि, "बात क्या है? क्यों आप इन्हें इतना सुना रही हैं?"
मैडम ने कहा, "बकवास रेस्टोरेंट है! मैंने कब से ऑर्डर दे रखा है, मेरा खाना नहीं आया और मुझसे पीछे आने वाले बंदे की टेबल पर तुरंत सर्व कर दिया गया। क्यों भाई? या तो यह पहचान वाला होगा, या इसने इनको ठीक किया होगा कभी?"
मैंने रिसेप्शनिस्ट से पूछा, "ऐसा क्यों?"
उसने कहा, "मैम, वे लोग बहुत पहले आकर खाने का ऑर्डर देकर चले गए थे। मैंने कहा, 'सर थोड़ा समय लगेगा', तो वे बोले, 'ठीक है हम लोग थोड़ी देर बाद आते हैं।' वे अभी आए तो खाना तैयार था, इसलिए उन्हें पहले दे दिया गया। मैडम को कब से यही बताने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन वे सुन ही नहीं रहीं।"
मुझे लगा सच जानकर मैडम को थोड़ा पछतावा होगा। माफ़ी न सही, रिसेप्शनिस्ट के प्रति थोड़ी मानवीयता ज़रूर दिखाएंगी, लेकिन उनको कोई फ़र्क ही नहीं पड़ा।
यह कोई एक दिन या एक जगह की घटना नहीं है; हर दिन, हर जगह ऐसा कुछ होता रहता है।
क्या हमने कभी सोचा है? जब हम किसी फूड प्लाजा या रेस्टोरेंट में सप्ताहांत (वीकेंड) या कोई पार्टी मना रहे होते हैं, तो ये वही लोग हैं जो आम दिनों से ज़्यादा मेहनत करके, अपने वीकेंड्स को दरकिनार करके हमारी सेवा में दिन-रात लगे रहते हैं। एक सीमित आय में लगातार बारह घंटे खड़े रहकर, हमारी छोटी से छोटी सुविधाओं का ख़याल रखते हैं।
इनके तीज-त्यौहार, होली-दिवाली, जन्मदिन, विवाह दिवस—सब हमारी ख़िदमत में गुज़र जाते हैं। ये चाहकर भी अपने गाँव, शहर या अपने अपनों के पास उतना नहीं पहुँच पाते, जितना पहुँचना चाहिए।
हर रोज़ कितने ही मुश्किल ग्राहकों का सामना करते हुए ये रिसेप्शनिस्ट वही बातें दोहरा-दोहरा कर थक जाते होंगे। कितना बोरिंग लगता होगा हर ग्राहक का ऑर्डर लेना, फ़ायदे बताना और एक इशारे पर उनके पास जाकर उनकी बातें सुनना!
हमने कभी इनके थके हुए पैरों की तरफ़ ध्यान ही नहीं दिया, जो बेहद थके होते होंगे। इनका चाहे दिल टूटा हो, रिश्ता टूटा हो या घर में कुछ ठीक न चल रहा हो, फिर भी यह हमारा स्वागत मुस्कुराकर करते हैं, बड़े अदब से मिलते हैं।
माना कि हम भी पैसे देकर आराम से खाना खाने जाते हैं, तो क्या हमारा पैसा किसी की भावनाओं, किसी के आत्मसम्मान से भी बड़ा होता है?
हमारी आप सभी से प्रार्थना है कि मेहनत करने वाले किसी भी इंसान को छोटा न समझें। वह भी सम्मान का उतना ही अधिकारी है, जितना वह आपको देता है। जब कभी किसी फूड प्लाजा जाएँ, थोड़ा ज़्यादा समय लेकर जाएँ।
अगर आपको उनकी सर्विस से कोई शिकवा है, तो आराम से कहें; उन्हें नीचा न दिखाएँ। कम से कम उन्हें इंसान समझकर बात करें। अगर उनकी सर्विस और उनका खाना अच्छा लगा हो, तो एक तारीफ़ ज़रूर करें। शायद आपकी एक तारीफ़ उनकी दिनभर की थकान मिटा दे और अगले दिन के लिए एक नया उत्साह जगा दे।
— शालू शुक्ला लखनऊ
टिप्पणियाँ (Comments)
एक टिप्पणी जोड़ें
कमेंट करने के लिए लॉगिन करें


