ग्रामीण आदिवासियों को नहीं पता कि विश्व आदिवासी दिवस होता क्या है 

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विशद कुमार

एक तरफ झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन घोषणा करते हैं कि हर वर्ष नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर झारखंड में राजकीय अवकाश रहेगा। यानी इस दिन की सरकारी छुट्टी होगी। यह घोषणा उन्होंने विश्व आदिवासी दिवस पर आयोजित मोरहाबादी स्थित नीलांबर-पीतांबर पार्क के एक कार्यक्रम में की है। वहीं दूसरी ओर राज्य का मुख्यालय रांची से 300 किलोमीटर दूर गिरिडीह जिला अंतर्गत देवरी प्रखंड के खटौरी पंचायत का कारीमाटी गांव के संथाल आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों और युवाओं को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के बारे में कुछ पता ही नहीं है।

इस बावत ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड, के महासचिव विश्वनाथ सिंह बताते हैं कि ”अगस्त क्रांति और विश्व आदिवासी दिवस मनाने के लिए हम 9 अगस्त को रांची से 300 किलोमीटर और गिरिडीह जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर प्रखंड मुख्यालय देवरी से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित खटौरी पंचायत के कारीमाटी गांव गए और जब हमने कार्यक्रम का आयोजन किया, तब आयोजित कार्यक्रम ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के मौके पर उपस्थित स्थानीय संथाल आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों और युवाओं ने साफ कहा कि यह ‘विश्व आदिवासी दिवस क्या है? हम लोग नहीं जानते थे।’

वे बताते हैं कि उनके इस अनभिज्ञता पर हम जहां एक तरफ  भौचक रह गए, वहीं दूसरी ओर यह समझने में हमें कोई कठीनाई नहीं हुई कि ‘विश्व आदिवासी दिवस’ वर्ष 1994 से लेकर आज 26 वर्षों तक यह बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच केवल शुभकामना देने तक सीमित रहा है। ऐसे में हमें यह एहसास हुआ कि विश्व आदिवासी दिवस की मौलिकता और प्रासंगिकता को लेकर हमें पूरी तैयारी के साथ सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाना होगा।”

यहां यह बताना जरूरी होगा कि यह क्षेत्र उत्तरी छोटानागपुर के तहत आता तो जरूर है परंतु यह संथालपरगना से पूरी तरह सटा हुआ है, जहां से शुरू हुआ संथाल हुल ने अंग्रेजों की नाकों में दम कर दिया था।

यहां यह बताना प्रासंगिक हो जाता है कि 30 जून 1855 ई. को वर्तमान संथालपरगना के 400 गांवों के लगभग 50,000 आदिवासी लोग वर्तमान साहेबगंज के भोगनाडीह पहुंचे और अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन का विगुल फूंका। इसी सभा में यह घोषणा कर दी गई कि वे यानी संथाल समुदाय अब मालगुज़ारी नहीं देंगे। इसके बाद अंग्रेज़ों ने, सिद्धू, कानू, चांद,भैरव इन चारों भाइयों को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया। परंतु जिस पुलिस दरोगा को वहां भेजा गया था, संथालियों ने उसकी गर्दन काट कर हत्या कर दी। इसके बाद सरकारी अधिकारियों में भी इस आंदोलन को लेकर भय प्राप्त हो गया।

यह आन्दोलन लगभग जनवरी 1856 में समाप्त हुआ और तब जाकर संथाल परगना का निर्माण हुआ जिसका मुख्यालय दुमका बना। इस संथाल हुल के फलस्वरूप ही जब 1900 में मैक पेरहांस की अध्यक्षता बंदोबस्त अधिनियम बना तो उसमें यह प्रावधान किया गया कि आदिवासी की जमीन कोई आदिवासी ही खरीद सकता है। क्रेता एवं विक्रेता का निवास एक ही थाने के अंतर्गत होना चाहिए। संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम जब 1949 में पारित किया गया तो 1900 के बंदोबस्ती नियम के इस शर्तें को धारा 20 में जगह दी गयी जो आज भी लागू है ।

इस संथाल हुल के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि मार्क्सवादी दर्शन के प्रणेता कार्ल मार्क्स ने भी अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री’ में इस ‘संथाल हुल’ को सशस्त्र जनक्रान्ति की संज्ञा दी है।

जब यह ‘संथाल हुल’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा के केंद्र में आता है, तब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले स्वतंत्रता सेनानी के नाम की चर्चा भी होनी शुरू हो जाती है, जहां राष्ट्रीय पटल पर मंगल पांडे का जिक्र होता है, जबकि सच यह है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी थे।

बताना लाजिमी होगा कि 1771 से 1784 तक जंगल का बेटा तिलका मांझी ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी समर्पण नहीं किया, न कभी झुके और न ही डरे।

ऐसे में संथाल समाज का अपनी विरासत को न जान पाना चिंता का विषय इसलिए है कि झारखंड अलग राज्य गठन के बाद से अब तक राज्य में केवल सत्ता की मारामारी और राजनीति के अलावा और कुछ नहीं हो पाया है, जिसके परिणाम स्वरूप  आदिवासी समाज आज भी वहीं खड़ा है, जहां वह अंग्रेजी शासनकाल में खड़ा था।

बता दें कि 1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने आदिवासियों के उत्थान के लिए एक कार्यदल गठित की गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के पहल पर 9 अगस्त 1982 को एक सम्मेलन किया गया और उसकी स्मृति में 1994 से प्रतिवर्ष 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाने की घोषणा की गई।

आयोजित कार्यक्रम के मौके पर उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि जबकि यह सच है कि विभिन्न आदिवासी विद्रोहों के परिणाम स्वरूप अंग्रेजों की सत्ता के नीति निर्धारक और अंग्रेजी सत्ता को हमने इतना बाध्य किया कि उन्हें मजबूर होकर आदिवासियों के हक व हित में कानून बनना पड़ा। बावजूद यह दुखद है कि वनाधिकार कानून 2006, छोटा नागपुर टेंडेंसी एक्ट 1908,संथाल परगना टेनेंसी एक्ट, पांचवीं अनुसूची में वर्णित आदिवासी स्वशासन व्यवस्था का महत्त्व को गांव के लोग नहीं जानते हैं।

वक्ताओं ने कहा कि इस विषय में झारखंड सरकार के मुखिया हेमन्त सोरेन ने यह घोषणा करके कि इस बार से विश्व आदिवासी दिवस प्रखंड स्तर तक मनाए जाएंगे, स्वागत योग्य है। वहीं गांवों के आदिवासी समाज में अपने अधिकार के बारे न जानना केवल आदिवासी समाज के लिए ही नहीं पूरे झारखंड के लिए चिंता का विषय है।

वक्ताओं में खटौरी के मुखिया नवीन मुर्मू ने कहा कि अगले साल पारम्परिक कृषि वन उत्पादन के महत्व पर स्थानीय स्तर से जागरूकता पैदा करके लोगों को उत्साहित करेंगे और पररम्परिक खेलों का प्रक्षिशण देकर नई पीढ़ी को प्रोत्साहित किया जाएगा और उन्हें पुरस्कृत भी किया जाएगा।

कार्यक्रम में हेमन्त सोरेन की घोषणा को संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य को सार्थक करने की दिशा में स्वागत योग्य कदम बताया गया, जो आदिवासी समाज को उत्साहित करेगा। इसी उत्साह को बरकरार रखने के लिए आयोजित कार्यक्रम में प्रकृति और पर्यावरण से आदिम समाज के योगदान, सहजीविता और श्रम—साध्य जीवन, वैज्ञानिक समझ, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क एवं ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड द्वारा मनरेगा मजदूर व आदिवासी संथाल के संदर्भ में दशा दिशा और भविष्य की कार्य योजना पर चर्चा की गई और 8 अगस्त के मौलिकता को 9 अगस्त की मौलिकता को स्थापित करने के लिए जानकारी बांटने, पारंपरिक शुद्ध पौष्टिक अनाज के उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ाने, खेल के क्षेत्र में प्रतिभाओं को उभारने, लोगों में खासकर महिलाओं में पुरातन अंधविश्वास की बजाय वैज्ञानिक चेतना को विकसित करने पर चर्चा के साथ—साथ योजना के सार्थक पहल और संकल्प के साथ कार्यक्रम की घोषणा की गई और कार्यक्रम में उपस्थित लोगों के साथ एक नैतिक समझ की साझेदारी के साथ साथ चलने और वर्तमान संदर्भ के सापेक्ष कदम उठाने लिए भविष्य की कार्य योजना तैयार की गई।

अवसर पर दिवस कुमार, योगेन्द्र गुप्ता, अजय विश्कर्मा, किशोर मुर्मू, महेंद्र हजारा, दिलीप कुमार रजक, संताल सोमाज सुसार बायसी के सचिव सुलेमान मुर्मू तथा संजोजक लालो हांसदा सहित पंचायत के सभी गांव के ग्रामीण उपस्थित थे।

 

 

 

 

 

 

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