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सोवियत धन, केजीबी और संसद में सीपीआई सांसद
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सोवियत धन, केजीबी और संसद में सीपीआई सांसद

January 17, 2026
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सुमन्त

राजधानी में पांच सितारा पार्टी मुख्यालय सहित देश भर में ताबड़तोड़ बनने वाले भारतीय जनता पार्टी के आलीशान कार्यालय भवनों की खूब चर्चा होती है। अब ये पूछने की जरूरत नहीं कि इनके निर्माण में जो अथाह धनराशि लगी हैं, भाजपा ने उन्हें कहा से जुटाया है? इस गुत्थी को Open Secret (खुला राज) की तरह देश का प्राय: हर नागरिक जान चुका है।

मगर, एक समय ऐसा भी था जब देश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की चर्चा इस रूप में खूब होती थी कि दिल्ली में भव्य पार्टी मुख्यालय 'अजय भवन' सहित उसके कहां कहां अपने कार्यालय भवन नहीं है? प्रायः प्रत्येक राज्यों की राजधानी और कहीं कहीं जिला मुख्यालयों में भी पार्टी के अपने कार्यालय भवन का अस्तित्व था/है। कांग्रेस लंबे समय से सत्ता में थी और भाजपा सेठ साहूकारों की पार्टी समझी जाती थी। फिर भी, इस मामले में कम्युनिस्ट पार्टी के मुकाबले वे बहुत 'गरीब' थे। तब अक्सर ईर्ष्यावश और दुष्टतापूर्वक भी यह सवाल दागा जाता था कि अपने को मेहनतकशों की पार्टी बताने वाले कम्युनिस्टों के पास इन भवनों के निर्माण के लिए इतने धन आते कहां से हैं? हालांकि, मुझे याद है पार्टी का साधारण से साधारण कॉडर भी तब इस दुष्ट प्रचार के प्रतिवाद में बड़ा सटीक उत्तर देता था : "कम्युनिस्ट पार्टी अपने लाखों सदस्यों तथा मेहनतकश जनता से प्राप्त सहयोग राशि/चंदा से अपने पार्टी कार्यालयों का निर्माण करती है। जबकि बुर्जुआ पार्टी के नेता सेठ-साहूकारों तथा पूंजीपति घरानों से मिलने वाली मोटी रकम से पार्टी के लिए नहीं, अपने स्वयं के लिए आलीशान बिल्डिंग खड़ी करते हैं।" पर, दुष्प्रचार रूकता कहां था!

उस समय सोवियत संघ का अस्तित्व अपने उरूज पर था। तीसरी दुनिया के नव स्वतंत्र देश आर्थिक रूप से साम्राज्यवादी/पूंजीवादी देशों की जकड़बंदी से मुक्त होकर स्वतंत्र रास्ता अख्तियार कर सके, इसके लिए वह उन्हें हर संभव सहायता प्रदान करने की अपनी संकल्पना को लेकर पूरी दुनिया में ख्याति प्राप्त कर चुका था। भारत सरकार को भी अपने राजकीय उद्योग धंधों की व्यापक और सुदृढ़ ऋंखला तैयार करने की दिशा में उसने किस हद तक मदद की थी, यह सर्वविदित है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और सोवियत संघ के बीच परस्पर मित्रता और सहयोग का घनिष्ठतम रिश्ता भी जगजाहिर था। इसी रिश्ते को आधार बना कर इस दुष्टतापूर्ण प्रचार को खूब हवा दी जाती थी कि कम्युनिस्ट पार्टी को अपनी राजनीतिक गतिविधि चलाने तथा पार्टी कार्यालयों के निर्माण के लिए सोवियत संघ से भरपूर आर्थिक मदद मिलती है। गाहे बगाहे इस दुष्प्रप्रचार को औद्योगिक घरानों के बड़े अखबार भी हवा देने से चूकते नहीं थे।

हद तो तब हो गयी जब अमेरिका का एक प्रमुख अखबार "वाशिंगटन पोस्ट" ने यह खबर छाप दी कि सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने केजीबी के जरिये सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) को एक लाख रूपये की मदद पहुंचायी है। फिर क्या था, खबर के छपते ही विशेष रूप से भाजपा के नेताओं को कम्युनिस्टों के खिलाफ सड़क से संसद तक हल्ला बोलने का मनचाहा हथियार मिल गया। संसद में विरोधी दल के नेता आडवाणी जी ने इस मामले को उठा दिया। हालांकि, यह प्रचार इतना प्रबल था कि दोनों कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकांश सांसदों की राय थी कि इस सवाल में उलझने की बजाय हमलोगों को अयोध्या का मामला उठा देना चाहिए। परंतु, बिहार से सीपीआई के अत्यंत प्रखर सांसद का० भोगेंद्र झा अड़ गये कि हमें इस बहस से बचने की बजाय इसका मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए।

फिर तो संसद में का० भोगेंद्र झा ने उल्टे आडवाणी जी को ही कटघरे में खड़ा करने की कैसी व्यूह रचना रचीं, इसका दिलचस्प विवरण हुबहू उन्हीं के शब्दों में यहां प्रस्तुत है : "... तीन साल पहले वाशिंगटन पोस्ट में खबर छपी थी, येल्तसिन सत्ता में आए थे तभी, कि येल्तसिन की सरकार ने खबर निकाली है कि सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी ने एक लाख रुपया केजीबी को भारत की सीपीआई को देने के लिए दिया था। सदन में आडवाणी ने मामला उठाया कि भारत सरकार इसकी जांच करे। सीपीएम के लोग, जनता दल के लोग सब मुझ से कह रहे थे इसको छोड़ो। यह गड़बड़ मामला है, हमलोग अयोध्या का उठा देते हैं। हमने कहा कि यह बुजदिली होगी। आडवाणी जी जब बोलकर बैठ गए तो मैंने कहा आडवाणी जी वाशिंगटन पोस्ट की खबर के अलावा भी कोई जानकारी है? वहां की केन्द्रीय कमेटी ने केजीबी को एक लाख रुपया दिया इतनी ही जानकारी है। सीपीआई ने वह पाया, क्या यह भी आपको जानकारी है। अगर है तो कह दीजिए। आडवाणी जी ने कहा कि सीपीआई ने पाया यह न तो मैं जानता हूं न भोगेन्द्र जी जानते हैं। इसीलिए कहता हूं कि भारत सरकार इसकी जांच करे। तब मैंने कहा कि सरकार इसकी जांच करे, अभी सदन के नेता प्रधानमंत्री हैं, विपक्ष के नेता आडवाणी जी हैं। मैं यह कहता हूं कि सरकार क्यों करे, सरकारी अफसर क्यों करें, सर्वदलीय संसदीय समिति बने। आडवाणी जी उसके अध्यक्ष बनें । सीपीआई से जांच शुरू करें, सभी दलों के हिसाबों की जांच हो जाए, एक शुद्धिकरण हो जाए, यह स्वीकार किया जाए।

मैंने बार-बार जोर दिया। आडवाणी जी चुप। तब हमारे सीपीआई के, सीपीएम के, जनता दल के लोग कहने लगे - स्वीकार करो, स्वीकार करो। लेकिन, नहीं कुबूल किया। जब यह हवाला आदि को देख रहा हूं तो होता है कि यही कारण तो नहीं था। 3-4 साल पहले की बात है। यह सब उस वक्त अखबार में आया था। ... हममें से पार्टी के सभी एमपी की आधी आमदनी एकाउंट विभाग से ही बैंक में सीपीआई के नाम पर चली जाती है। यहीं ऊपर में स्टेट बैंक है। आडवाणी जी एक साल भी आप भी भाजपा में शुरू कर दीजिए । मेरी समझ में कुछ का इलाज हमारे जनतंत्र में है जो बार बार मैंने कहा है। परन्तु वेस्ट मिनस्टर सरीखे पार्लियामेंटरी तंत्र से इसको मिटाना संभव नहीं है।" ('क्रांति-योग' पुस्तक से)

भोगेंद्र जी ने न सिर्फ सोवियत धन की प्राप्ति के अनर्गल दोषारोपण पर इसकी जांच सर्वदलीय संसदीय समिति से करवाने की आडवाणी जी को खुली चुनौती दे डालीं बल्कि संसद के माध्यम से पूरे देश को यह भी बताया कि पार्टी की आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए पार्टी के सभी सांसद अपने तनख्वाह की आधी राशि पार्टी कोष में जमा कर देते हैं। यदि आप में हिम्मत है तो आप भी अपने सांसदों से पार्टी के लिए यह त्याग करने की अपील करिये। जाहिर है, सर्वदलीय‌ संसदीय जांच समिति के नाम पर कि कहीं अपनी ही पार्टी को प्राप्त होने वाली अनैतिक कमायी की पोल पट्टी न खुल जाये, आडवाणी जी चुप्पी साध गये। कम्युनिस्ट सांसदों की भांति अपने सांसदों से भी आर्थिक त्याग करने की अपील करने के सवाल पर तो जैसे उनकी घिग्घी ही बंध गयी!

कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्थापना की सौवीं सालगिरह का उत्सव मना रही है। मगर, इस पूरे दौर में पार्टी ने अपने विरूद्ध संसद से लेकर सड़क तक प्रतिक्रियावादी ताकतों के घिनौने से घिनौने प्रहार को किस अपार नैतिक बल के साथ मुकाबला किया, पार्टी कॉडरों को इस स्वर्णिम अध्याय से भी अवगत कराने की जरूरत है।

Sumant, Patna
6202403279

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