Edit
फ़िलिस्तीन - ध्वंस से उपजी कला
World

फ़िलिस्तीन - ध्वंस से उपजी कला

March 19, 2026
0 views
Giving Birth in a Prison Cell- Malak Mattar..jpgIn Pursuit of Utopia-Nabil Anani.jpgNo Words- Malak Mattar.jpg'Where to' - Ismail-Shammout.jpg

फ़िलिस्तीन में कलाकार होना दरअसल खुद के अस्तित्व को खोजने की यात्रा पर निकल जाना है। फ़िलिस्तीन में कलाकार होना उस परचम को थामे रहना है जो वहां की जनता की उम्मीदों से धड़कता रहता है। फ़िलिस्तीन में कलाकार होना ध्वंस से कराहती मानवता के विश्वास को बचाये रखना है। जब सारे हथियार खत्म हो जायेंगे, जब मनुष्य के अंदर का जानवर हार जायेगा और जब सुबह का सूरज, आंगन में लगे जैतून के दरख्त के पीछे, धीरे से सर उठाएगा। कलाकार स्मित भाव से मुस्कुराएगा। खोज पूरी हो चुकी होगी। थकाहारा पथिक घर आ चुका होगा उन चाबियों के साथ जिनको सीने से लगाए न जाने कितनी निर्वासित पीढ़ियां गुज़र गयीं। 

प्रलेस, दिल्ली द्वारा विगत 9 मार्च 2026 को आयोजित एक कार्यक्रम में प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव और लेखक विनीत तिवारी ने अपनी फ़िलिस्तीन यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने अपना समय फ़िलिस्तीन के वेस्ट बैंक के शहरों और गाँवों में गुज़ारा। वे बेथलेहम, जेरुसलम, जेरिको, नाबलूस, जबाबदह आदि जगहों पर गए और विद्यार्थियों, किसानों, कामगारों, आंदोलनकारी लोगों से और अरबी बंजारे "बेदुइनों" से मिले। उन्होंने फलस्तीनी लोगों की जीवन की मुश्किलात, लेकिन मुश्किलों में भी भरपूर रचनात्मकता के साथ जीने के अनेक वाकियात सुनाये। विनीत तिवारी, अनेक मंचों से फ़िलिस्तीन की जनता के संघर्षों पर अपनी बात प्रतिबद्धता और मज़बूती के साथ रखते रहे हैं। अपनी फ़िलिस्तीन यात्रा के अनुभव साझा करने के लिए वह लगातार पूरे देश में अलग-अलग शहरों और कस्बों में जा रहे हैं। फ़िलिस्तीन की जनता की बात अपने देश की जनता तक पहुंचाने के लिए और उनके दुःख बाँटने के लिए भी।

9 मार्च 2026 के कार्यक्रम में प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव और लेखक विनीत तिवारी ने अपनी बात फ़िलिस्तीनी कलाकारों पर भी केंद्रित रखी। फ़िलिस्तीन की जनता की आवाज़ को रंग, आकार और अभिव्यक्ति देने में फ़िलिस्तीनी कलाकारों का योगदान अनुपम है। किसी भी सभ्यता के जीवंत होने का प्रमाण यह नहीं है कि उस सभ्यता ने कितने युद्ध लड़े, कितने मुल्कों को जीता बल्कि सभ्यता के जीवंत होने का प्रमाण यह है कि वहां की आम जनता ने अपनी कला और संस्कृति बचाये रखा और वहां के कलाकारों ने अपनी बात बिना डरे कही।

विनीत तिवारी ने मलक मत्तार, नबील अनानी और इस्माइल शमूत के चित्र सबके बीच साझा किये। उन्होंने सुप्रसिद्ध फ़िलिस्तीनी लेखक नसार अब्राहम से अपनी मुलाकात का भी ज़िक्र किया। नसार अब्राहम की कहानी 'जूते' के कथानक पर भी बात हुई।

फ़िलिस्तीन में कला, उम्मीद की कला है। कला जो नारा बन कर गूंज उठे। रंग भरे कैनवास, सच बोलते रंग, गूँज उठते गीत, नाटक, कवितायेँ। फ़िलिस्तीन में कला उस पुरसुकून सुबह के सपने से जुड़ी है जिसे फ़िलिस्तीन के चित्रकार, रंगकर्मी, लेखक और कवि ना जाने कितने सालों से देख रहे हैं। कमाल यह है कि ये ख़्वाब पीढ़ी दर पीढ़ी बरक़रार है। इतने ध्वंस के बाद भी, सालों साल चलते दमन में सबकुछ तबाह होने के बाद भी ये सपना बना हुआ है।

इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल

कोहरे डूबी दिशाएं

कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल

किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी

...क्योंकि सपना है अभी भी!

-धर्मवीर भारती

फ़िलिस्तीन की कला उदासी में उतरी कला है। उदासी जितनी गहरी उतनी ही गहरी मुक्त होने की छटपटाहट भी। कभी यह एक खुशनुमा ख़्वाब में दिखायी देती है और कभी एक चीख में। फ़िलिस्तीन की कला अपने समय का दस्तावेज़ बन हमारे सामने आती है। वह अपने वक़्त की बात कहती है और वह ये भी बताती है कि हम ऐसे वक्त को स्वीकार नहीं करते।

लन्दन में निर्वासित युवा चित्रकार मलक मत्तार की काले सफ़ेद रँगों से बनी पेंटिंग 'नो वर्ड्स'- 'No Words' को " गाज़ा की ग्वेर्निका" कहा गया है। अप्रैल 1937 में स्पेन के ग्वेर्निका पर इटली और जर्मनी की बमबारी से ही द्वितीय विश्वयुद्ध के आरम्भ होने का बिगुल बज उठा था। ग्वेर्निका के शहर बास्क पर हुई बमबारी के चलते हजारों लोगों की मौत हुई। पिकासो की पेंटिंग 'ग्वेर्निका' युद्ध की तबाही का प्रतीक थी। मलक मत्तार की पेंटिंग "नो वर्ड्स" युद्ध और आतंक की तबाही को फिर से जीती है जिसके चलते गाज़ा और फ़लस्तीन के और हिस्सों में 80,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।

मलक मत्तार कहती हैं "मैं गाज़ा स्ट्रिप में बड़ी हुई हूँ। मेरा ये हमेशा से मानना रहा है कि फ़िलिस्तीन में भरपूर जीवन है लेकिन त्रासदी यह, कि लोग जीने के लिए छटपटा रहे हैं ,” मलक मत्तार कहती हैं, “फ़लस्तीन में लोग भूख से जूझ रहे हैं… और उन्हें उन अनजानी जगहों की ओर विस्थापित किया जा रहा है जहाँ कोई जगह नहीं है।”

मलक मत्तार की एक और पेंटिंग 'जेल की कोठरी में बच्चे का जन्म' - 'Giving Birth in a Prison Cell' का यहाँ ज़िक्र किया जा सकता है जिसमें जेल की कोठरी में एक फ़िलिस्तीनी माँ के गर्भ में बच्चे की आँखों में भय और आतंक की छाया दिख रही है। वह दुनिया जिसमें उसे अभी आना है वह कितनी भयावह है यह उस अजन्मे बच्चे को पता है। और वह माँ जो इसे जन्म दे रही है वह खुद भी ग्लानि, भय और दुःख से सिमटी जा रही है।

1943 में फ़िलिस्तीन में जन्मे नबील अनानी समकालीन फ़िलिस्तीनी कला आंदोलन के प्रमुख संस्थापकों में से एक हैं। अनानी फ़िलिस्तीनी कला और लोककथाओं पर कई पुस्तकों के सह-लेखक भी हैं। उन्हें 1997 में यासर अराफात द्वारा दृश्य कला के लिए पहला फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। वे फ़िलिस्तीनी कलाकारों के एक प्रमुख संघ के प्रमुख बने और फिलिस्तीन में ललित कला की पहली अंतर्राष्ट्रीय अकादमी की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नबील अनानी के चित्र उम्मीद से भरे हैं। उनके उनकी पेंटिंग्स में ख़्वाब हैं एक पुरसुकून सुबह के, ख़्वाब हैं जैतून के दरख्तों के और ख़्वाब हैं अमन और शांति के। उनकी पेंटिंग्स रंगों से भरी हैं। उनकी एक पेंटिंग 'यूटोपिया की तलाश'- 'In Pursuit of Utopia' 2020 का ज़िक्र किया जा सकता है। इस पेंटिंग में दूर क्षितिज तक फैले जैतून के बाग़ हैं। ऐसा लग रहा है की जैसे कलाकार ने खुशियां बिखेर दो हों। नबील अनानी के चित्र आने वाले भविष्य की सकारात्मक तस्वीर हैं जिसकी प्रतीक्षा हर फ़िलिस्तीनी कर रहा है। नबील अनानी ने चमड़े, मेहंदी, प्राकृतिक रंग, पेपर-मैशे, लकड़ी के मनके और तांबे जैसे स्थानीय माध्यमों का उपयोग कर के कलाकृतियों को रचा है।


इस्माइल शम्मौत का जन्म 1930 में फिलिस्तीन के लिद्दा में हुआ था। 1948 के दौरान, उनके शहर पर किए गए हमले के कारण उन्हें और उनके परिवार को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। पैदल लंबी यात्रा के बाद वे गाजा के खान यूनिस के शरणार्थी शिविरों में बस गए, जहाँ उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया। 1950 में वे कला की पढ़ाई के लिए काहिरा गए, जहाँ से उन्हें बाद में रोम के एकेडेमिया डि बेले आर्टि में ललित कला का अध्ययन किया। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, वे 1959 में बेरूत चले गए, जहाँ उन्होंने काहिरा की अपनी सहपाठी, फ़िलिस्तीनी कलाकार तमीम अल-अखाल से शादी की। दोनों 1983 तक बेरूत में रहे और काम किया, फिर कुवैत, उसके बाद जर्मनी और अंत में 1994 में अम्मान चले गए। शम्मौत का निधन 3 जुलाई 2006 को हुआ। इस्माइल शम्मौत की कला कृतियों को यूरोप और मध्य पूर्व के प्रसिद्ध संग्रहालयों और कला प्रदर्शनी हॉलों सहित दुनिया भर के विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शित किया गया है।

उनकी पहली प्रदर्शनी 1953 में गाजा में आयोजित हुई, जहाँ उन्होंने अपनी प्रतिष्ठित कृति 'वेयर टू?' - 'Where to?' प्रदर्शित की। ‘Where to?' में एक व्याकुल पिता को दिखाया गया है, जो 1948 के दौरान शम्मौत के जन्मस्थल लिद्दा से जबरन निकाले जाने की उस लंबी पदयात्रा में अपने बाएँ कंधे पर सोए हुए बच्चे को उठाए हुए है। उसकी दाहिनी हाथ को एक छोटी बच्ची थामे हुए है, जो थकान से चूर होकर उसकी ओर देख रही है, और तीसरा बच्चा पीछे-पीछे चल रहा है।

यह पेंटिंग उस खोए हुए घर-बार और असहायता को दर्ज करती है, जो उस वर्ष लगभग 8 लाख फ़िलिस्तीनियों पर थोपी गई थी—और जिसे आगे चलकर 'अल नक़बा' के नाम से जाना गया। इस्माइल शम्मौत की यह कालजयी कृति फ़िलिस्तीन संस्कृति की पहचान बन चुकी है और पहचान बन चुकी है पूरी दुनिया के विस्थपितों की जिन्हें धकियाकर, डरा कर और रौंद कर उनके मूल निवास से खदेड़ा जा रहा है।


इनके अलावा अबेद आब्दी, समाह शिहादी, फात्मा शानान, फातिमा अबू रूमी जैसे अनेक चित्रकारों की एक लम्बी फेहरिस्त है जो फ़िलिस्तीन की जनता की आवाज़ बनी हुई है, उनके हक़ के लिए लड़ रही है और उनके सपनों में रंग भी भर रही है।

फ़िलिस्तीन की जनता निर्वासन के दर्द से जूझ रही है। वह अपनी जड़ों से कटने की भयावह त्रासदी से गुजर रही है। वह रोज़मर्रा के अपमान और दमन से भी जूझ रही है। गाज़ा में हर दो कदम पर बने लौह दरवाज़े और उनपर तैनात सैनिक फ़िलिस्तीनियों को हर क्षण ये अहसास दिलाते रहते हैं उनका घर अब उनका नहीं है। वह अब अपने ही घर में निर्वासित हैं।

फ़िलिस्तीन की जनता के लिए जैतून न केवल एक आर्थिक सम्बल है बल्कि यह उसकी सांस्कृतिक पहचान भी है। जैतून के दरख़्त एक हज़ार साल तक भी जिन्दा रह जाते हैं। फ़िलिस्तीन की जनता के लिए जैतून उनके बुज़ुर्गों का आशीर्वाद भी है और एक अनवरत परंपरा से जुड़े होने का अहसास भी। जैसे जैतून के जड़ें जमीन से जुड़ी हैं वैसे ही हमारा अस्तित्व हमारी जमीन से, अपनी धरती से, अपने लोगों से जुड़ा रहे।

फ़िलिस्तीन की कला पर, जो ध्वंस से उपजी कला है, बहुत कुछ लिखा जाना चाहिए। हालांकि फ़िलिस्तीन पर बातों का कोई अंत नहीं क्योंकि उनके दुःखों का अंत नहीं। लेकिन अपनी कविता से अपनी बात खत्म कर रहा हूँ। इस उम्मीद के साथ कि हर बुरे दौर का अंत होना चाहिए।

जड़ें,

सिर्फ दरख़्त की नहीं होती,

आदमी की भी होती है।

चाहे

कोई धकियाये,

डराये, रौंद भी दे,

कर दे निर्वासित,

जड़ें,

कहीं नहीं जातीं,

वहीं धंसी रह जाती हैं।

कितने भी मुश्किल

हालात हों,

जड़ें,

उम्मीद नहीं खोतीं,

इंतज़ार करती रहती हैं।

लौट आने का।

- पंकज निगम

टिप्पणियाँ (Comments)

एक टिप्पणी जोड़ें

कमेंट करने के लिए लॉगिन करें