
नवोदित शायर मो. शाहिद अख्तर की एक निराली नज्म को जाए पढ़ा
एक अधूरी नज़्म
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उसे कहना
उसे मैंने ही लिखा था
कि जब लम्हे बर्फ हो जाएं
तो पिघला नहीं करते
कि परिंदे डर कर उड़ जाएं
तो फिर लौटा नहीं करते
कि यक़ीं एक बार उठ जाए तो
वापस नहीं आता
कि हवाओं का कोई गर्म झोंका
कभी बारिश नहीं लाता
उसे कहना
उसे मैंने ही लिखा था
कि शीशा टूट जाए तो
कभी फिर जुड़ नहीं पाता
कि पाओं में चुभी किरचियां
निकल जाती हैं, घाव भर जाता है
मगर दिल में चुभी किरचियां
निकला नहीं करतीं
नासूर बन जाती हैं
उसे कहना
उसे मैंने ही लिखा था
कि वक़्त नाज़ुक है,
और राह मुश्किल
हर क़दम पर इक इम्तिहां है
कि आदमी, समाज, मुल्क
गर रास्ते से भटक जाए
वापस मुड़ नहीं पाता
उसे कहना
उसे मैंने ही लिखा था
कि नफ़रत की चाशनी में पग कर
जब लोग संगदिल हो जाएं
कि हम और तुम की तकरार
जब साझी दीवारें गिराने लगे
खुशहाली मुंह मोड़ लेती है
और शांति श्मशान घाटों में सोती है
उसे कहना
कि वोह बेमानी अधूरी नज़्म
मैंने ही लिखी थी
उसे कहना
कि अंधेरे डगर के राही
मुकम्मल नज़्म नहीं लिखते
उसे कहना
कि नफ़रतों के इस मौसम में
यह अधूरी नज़्म काफ़ी है
उसे कहना
कि इस शहर ए खमोशां में
हर लफ़्ज़ पुर-मानी है
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