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जिंदगी के ग़मों की कहानी को अच्छे से प्रदर्शित और कहने का नाम है फोटोग्राफी : व्योमेश शुक्ल

काशीः विश्व फोटोग्राफी दिवस पर व्यवहारिक कला विभाग में फोटोग्राफी प्रदर्शनी एवं विशेष व्याख्यान का आयोजन वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्रवाल और फोटोग्राफर मनीष खत्री ने विद्यार्थियों को फोटोग्राफी की नई तकनीकों, AI और बनारस की दृश्य संस्कृति से कराया परिचित
वाराणसी, 20 अगस्त 2026।
जिंदगी के ग़मों की कहानी को अच्छे ढंग से प्रदर्शित करने और कहने का नाम ही फोटोग्राफी है। एक अच्छा चित्र केवल दृश्य को नहीं दिखाता, बल्कि उसके पीछे छिपी पूरी कहानी, संवेदना और जीवन के अंतरद्वंद्व को भी सामने लाता है।” यह विचार शहर के प्रख्यात साहित्यकार एवं नागरिक पहचान सभा के प्रधान मंत्री श्री व्योमेश शुक्ल ने विश्व फोटोग्राफी दिवस के अवसर पर व्यवहारिक कला विभाग, दृश्य कला संकाय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित फोटोग्राफी प्रतियोगिता एवं प्रदर्शनी के दौरान व्यक्त किए।
विश्व फोटोग्राफी दिवस के उपलक्ष्य में विभाग द्वारा 18 से 21 अगस्त 2026 तक फोटोग्राफी प्रतियोगिता एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। इसी क्रम में गुरुवार को आयोजित विशेष सत्र में श्री व्योमेश शुक्ल ने प्रदर्शित छायाचित्रों का साहित्यिक दृष्टि से विश्लेषण करते हुए विद्यार्थियों के साथ संवाद किया।
उन्होंने विशेष रूप से बनारस से जुड़े छायाचित्रों की सराहना करते हुए कहा कि इन चित्रों में केवल बनारस का बाहरी स्वरूप नहीं दिखाई देता, बल्कि उसके भीतर मौजूद साहित्यिक अंतर्द्वंद्व, जीवन की विविधता, संवेदना, संघर्ष, आस्था और मानवीय अनुभवों को भी देखा जा सकता है। उन्होंने प्रत्येक चित्र को साहित्य के नजरिए से पढ़ने का प्रयास किया और विद्यार्थियों को समझाया कि एक छायाचित्र भी किसी कहानी, कविता अथवा साहित्यिक रचना की तरह अपने भीतर अनेक अर्थों और संभावनाओं को समेटे रहता है।
उन्होंने कहा कि साहित्य और चित्र एक-दूसरे के पूरक हैं और बनारस इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। बनारस स्वयं एक खुला हुआ चित्र और खुला हुआ साहित्य है, जहाँ हर प्रकार की रचनात्मकता को आमंत्रण मिलता है। यहाँ की गलियाँ, घाट, मंदिर, लोग, जीवन-शैली, उत्सव, मृत्यु, संगीत, आध्यात्मिकता और रोजमर्रा का जीवन—सब कुछ निरंतर अपनी कहानी कहता रहता है। बनारस को देखने वाला हर व्यक्ति अपने अनुभव और दृष्टि के अनुसार एक अलग बनारस खोज सकता है।
फोटोग्राफी की बदलती तकनीक और क्रिएटिविटी पर अमिताभ अग्रवाल का विशेष व्याख्यान
दोपहर लगभग ढाई बजे आयोजित दूसरे सत्र में शहर के वरिष्ठ पत्रकार एवं वरिष्ठ फोटोग्राफर श्री अमिताभ अग्रवाल ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए फोटोग्राफी के बदलते स्वरूप और आधुनिक तकनीकों पर विस्तृत चर्चा की।
उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि आज फोटोग्राफी केवल कैमरे से तस्वीर खींचने तक सीमित नहीं रह गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मिररलेस कैमरा, डिजिटल प्रोसेसिंग और आधुनिक फोटोग्राफी सॉफ्टवेयर ने इसके स्वरूप और संभावनाओं को काफी व्यापक बनाया है। इसके बावजूद फोटोग्राफी की मूल भाषा और उसकी व्याकरण आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
श्री अग्रवाल ने विद्यार्थियों को लाइव डेमॉन्स्ट्रेशन के माध्यम से फ्रेम, कम्पोजिशन, प्रकाश, दृष्टिकोण, क्षण, मूवमेंट और विजुअल बैलेंस जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को समझाया। उन्होंने प्रदर्शनी में चयनित छायाचित्रों को देखकर विद्यार्थियों को बताया कि किसी विशेष चित्र में कौन-सा तत्व उसकी प्रभावशीलता बढ़ा रहा है और किन छोटे-छोटे बदलावों से वही चित्र और अधिक प्रभावशाली हो सकता था।
उन्होंने चयनित विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि जिन विद्यार्थियों का काम इस बार चयनित नहीं हो पाया है, उन्हें निराश होने की आवश्यकता नहीं है। फोटोग्राफी निरंतर अभ्यास, अवलोकन और प्रयोग की कला है। उन्होंने विद्यार्थियों को रचनात्मकता के नए आयाम तलाशने तथा आने वाली प्रतियोगिताओं के लिए और बेहतर तैयारी करने के लिए प्रेरित किया।
बनारस की गलियों और घाटों को कैमरे की नजर से समझाया मनीष खत्री ने
तीसरे सत्र में विभाग के पूर्व विद्यार्थी एवं वरिष्ठ फोटोग्राफर श्री मनीष खत्री ने विद्यार्थियों को विशेष रूप से ‘बनारस को कैमरे की नजर से देखने के विभिन्न आयामों से परिचित कराया।
उन्होंने बनारस की गलियों, घाटों, बाजारों, लोगों की भाव-भंगिमाओं, स्थानीय जीवन, काम करने के तौर-तरीकों, बाहर से आने वाले पर्यटकों की प्रतिक्रियाओं तथा शहर की रोजमर्रा की गतिविधियों को फोटोग्राफी के माध्यम से दर्ज करने की तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने बताया कि किसी स्थान की फोटोग्राफी केवल उसके प्रसिद्ध स्थानों की तस्वीरें लेने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। वास्तविक फोटोग्राफर उस स्थान के मूड, मूवमेंट, मानवीय व्यवहार, प्रकाश, समय और वातावरण को पहचानता है। उन्होंने अलग-अलग परिस्थितियों में कैमरे, मोबाइल, लेंस तथा डिजिटल तकनीकों के उपयोग के साथ-साथ AI और फोटोग्राफी आधारित सॉफ्टवेयर के जिम्मेदार एवं रचनात्मक उपयोग की संभावनाओं पर भी विद्यार्थियों से चर्चा की।
“फोटोग्राफर की तीसरी आँख है उसकी दृष्टि” — प्रो. मनीष अरोड़ा
कार्यक्रम के दौरान विभागाध्यक्ष प्रो. मनीष अरोड़ा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए फोटोग्राफी को भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि से जोड़ते हुए कहा कि प्रत्येक फोटोग्राफर को अपनी फोटोग्राफिक दृष्टि की तुलना बाबा भोलेनाथ की तीसरी आँख से करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब कोई फोटोग्राफर किसी दृश्य, वस्तु या मूवमेंट को कैमरे या मोबाइल से क्लिक करने के लिए देखता है, तो वह केवल कैमरा नहीं देख रहा होता, बल्कि उसकी अपनी दृष्टि, अनुभव और संवेदना उस क्षण को चुन रही होती है। उन्होंने इसी रचनात्मक दृष्टि को फोटोग्राफर की “तीसरी आँख” की संज्ञा दी।
उन्होंने कहा कि कैमरे का लेंस, प्रकाश, ऑब्जेक्ट और सही क्षण जब एक साथ आते हैं, तब एक साधारण दृश्य भी असाधारण छवि में बदल सकता है। इस तीसरी आँख की भाषा, उसकी व्याकरण, उसके एलिमेंट्स, प्रिंसिपल्स और विजुअल सिद्धांतों को समझना ही गहराई से फोटोग्राफी को समझना है।
प्रो. अरोड़ा ने कहा कि व्यवहारिक कला विभाग पिछले कई वर्षों से विद्यार्थियों को फोटोग्राफी की इसी गहन दृष्टि और अध्ययन से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। विभाग का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल तकनीकी रूप से सक्षम बनाना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा संवेदनशील और रचनात्मक दृष्टिकोण देना है, जिसके माध्यम से वे समाज, संस्कृति, मनुष्य और अपने समय को एक नए दृश्य विमर्श के रूप में अभिव्यक्त कर सकें।
सौ से अधिक विद्यार्थियों ने लिया विशेष व्याख्यानों का लाभ
विश्व फोटोग्राफी दिवस के अवसर पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में विभाग के सौ से अधिक छात्र-छात्राओं ने भाग लिया और तीनों विशेषज्ञों के व्याख्यान एवं संवाद सत्रों का लाभ उठाया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने अपने फोटोग्राफ दिखाए, विशेषज्ञों से प्रश्न पूछे तथा फोटोग्राफी की तकनीकी और रचनात्मक संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की।
कार्यक्रम के संयोजक श्री कृष्णा सिंह ने आयोजन के विभिन्न चरणों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. आशीष कुमार गुप्ता एवं असिस्टेंट प्रोफेसर सुश्री सृष्टि प्रजापति ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने सभी आमंत्रित अतिथियों, विशेषज्ञों, विद्यार्थियों और आयोजन से जुड़े सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे संवाद विद्यार्थियों को कक्षा से बाहर निकलकर कला के वास्तविक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों को समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
विश्व फोटोग्राफी दिवस के अवसर पर आयोजित यह प्रदर्शनी एवं व्याख्यान श्रृंखला विद्यार्थियों के लिए तकनीक, साहित्य, संस्कृति और रचनात्मकता के अद्भुत संगम के रूप में सामने आई। कार्यक्रम ने यह संदेश भी दिया कि फोटोग्राफी केवल तस्वीर खींचने की तकनीक नहीं, बल्कि समय, समाज और जीवन को देखने तथा उसकी अनकही कहानी को दृश्य भाषा में कहने की कला है।
