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एक वर्ष में एक साहीवाल गाय से पाँच बछियों का जन्म: बीएचयू ने भ्रूण प्रत्यारोपण में हासिल की महत्वपूर्ण उपलब्धि

बरकछा, मिर्जापुर: उन्नत प्रजनन जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान संकाय, कृषि विज्ञान संस्थान, राजीव गांधी दक्षिणी परिसर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बरकछा ने एक ही साहीवाल गाय से मल्टीपल ओव्यूलेशन एंड एम्ब्रियो ट्रांसफर (MOET) तकनीक के माध्यम से एक वर्ष के भीतर पाँच स्वस्थ साहीवाल बछियों का उत्पादन किया है। यह उपलब्धि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना एम्ब्रियो ट्रांसफर परियोजना के अंतर्गत हासिल की गई। शुद्ध नस्ल की साहीवाल गाय संख्या 53, जिसका अधिकतम दुग्ध उत्पादन 11.5 किलोग्राम प्रतिदिन रहा है, को भ्रूण दाता के रूप में चुना गया। इस गाय में लगभग 4,800 किलोग्राम मानक दुग्ध उत्पादन वाली माँ से प्राप्त साहीवाल सांड के सेक्स-सॉर्टेड सीमेन का उपयोग कर कृत्रिम गर्भाधान किया गया। दाता गाय से 15 प्रत्यारोपण योग्य भ्रूण प्राप्त किए गए तथा इन्हें सरोगेट गायों में प्रत्यारोपित किया गया। इनमें से पाँच गायें गर्भवती हुईं और बाद में पाँच स्वस्थ बछियों को जन्म दिया। सभी पाँच बछियाँ वर्तमान में स्वस्थ हैं। यह उपलब्धि दर्शाती है कि MOET तकनीक के माध्यम से श्रेष्ठ मादा पशु की आनुवंशिक क्षमता को कम समय में तेजी से बढ़ाया जा सकता है। पारंपरिक कृत्रिम गर्भाधान द्वारा एक ही गाय से पाँच बछियाँ प्राप्त करने के लिए कई क्रमिक गर्भधारण आवश्यक होते हैं, जिसमें लगभग 6-6.5 वर्ष लग सकते हैं। इसके विपरीत, भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक द्वारा एक गाय से प्राप्त कई भ्रूणों को अलग-अलग पशुओं में प्रत्यारोपित किया जा सकता है, जिससे कम समय में अधिक संतति प्राप्त करना संभव होता है। भ्रूण प्रत्यारोपण की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि जन्म लेने वाली बछियाँ आनुवंशिक रूप से दाता गाय और भ्रूण निर्माण में प्रयुक्त सांड की संतान होती हैं, जबकि सरोगेट गाय केवल गर्भधारण एवं भ्रूण के विकास के लिए मातृ भूमिका निभाती है। इस प्रकार, श्रेष्ठ साहीवाल गाय को बार-बार गर्भधारण कराए बिना उसकी मूल्यवान आनुवंशिक क्षमता का तेजी से प्रसार किया जा सकता है। सेक्स-सॉर्टेड सीमेन के उपयोग ने इस कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी बनाया, जिससे सभी पाँच संततियाँ मादा प्राप्त हुईं। ये मादा बछियाँ भविष्य में मूल्यवान डेयरी आनुवंशिक संसाधन के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इस परियोजना का क्रियान्वयन प्रधान अन्वेषक डॉ. मनीष कुमार के निर्देशन में किया जा रहा है, जिसमें सह-प्रधान अन्वेषक डॉ. कौस्तुभ किशोर सारफ एवं डॉ. अजीत सिंह का महत्वपूर्ण योगदान है। इस पहल के अंतर्गत देशी गोवंश के संरक्षण एवं आनुवंशिक उन्नयन की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए प्रो. वी. के. मिश्रा, निदेशक, कृषि विज्ञान संस्थान, प्रो. (डॉ.) अमित राज गुप्ता, अधिष्ठाता, पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान संकाय, तथा प्रो. बी. एम. एन. कुमार, प्रभारी अधिकारी, राजीव गांधी दक्षिणी परिसर ने परियोजना दल के प्रयासों की प्रशंसा की। कार्यक्रम के अगले चरण के रूप में, पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान संकाय की टीम द्वारा ओवम पिक-अप-इन विट्रो फर्टिलाइजेशन-एम्ब्रियो ट्रांसफर (OPU-IVF-ET) अर्थात् अंडाणु संग्रहण, शरीर के बाहर निषेचन तथा भ्रूण स्थानांतरण तकनीक को अपनाने की योजना बनाई जा रही है। इस उन्नत प्रजनन तकनीक को विशेष रूप से विंध्य क्षेत्र के पशुपालकों तक विस्तारित करने का भी प्रस्ताव है, ताकि गंगातीरी सहित अन्य देशी गोवंशीय नस्लों के तीव्र आनुवंशिक उन्नयन को प्रोत्साहित किया जा सके तथा दुग्ध उत्पादकता में वृद्धि के माध्यम से पशुपालकों की आय एवं आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाया जा सके।
