
--- ऐसे बिछड़े भी नहीं हैं कि करार आ जाए
कोई भी शहर कितना ही बड़ा क्यूं ना हो उसके भीतर रहने के लिए आपके पास एक वज़ह होनी चाहिए। (मसलन -आपका घर, व्यवसाय, नौकरी,पढाई)
अगर आपके पास कोई मुकम्मल वज़ह नहीं है तो बड़ा शहर अपना दिल छोटा करके आपको निकाल फेंकता है।
अकारण रहते हुए आप जहां भी जाते हैं शहर की दो बड़ी- बड़ी आंखें आपका पीछा करती रहतीं हैं। अगर आप तनकर खड़े हो गए तो शहर सवाल करता है, रहनें की वजह पूछता है। आप खुद को निर्दोष होकर भी मुजरिम समझने लगते है। आप भले ही उस शहर से बेशुमार प्यार करते हों लेकिन उसकी पनाह में रहने के लिए प्यार नहीं किसी और वज़ह की दरकार होती है।
हर शहर,हर व्यक्ति के साथ एक जैसा होता भी नहीं, किसी को इतना कुछ देता है कि रखने के लिए जगह कम हो जाती है,किसी कि इतना कुछ लूट लेता है कि फिर बसने की गुंजाइश ही नहीं रहती।
जिस शहर में आपने अपना बचपन,जवानी,अच्छे बुरे दिन बिताए हों उस शहर से "विदा" होना कितना मुश्किल होता है।
'विदा'के वाद तो लोग सम्हल ही जाते होंगे शायद। सबसे कठिन होता है 'विदा'से ठीक पहले का समय!
'विदा' से ठीक एक दिन पहले विदा होने वाला नाप लेना चाहता है पूरा शहर---अपनी स्कूल, कालेज, आफिस, कुछ मुहल्ले, कुछ गलियां, कुछ रास्ते, कुछ सड़कें भींच लेना चाहता है अपनी मुट्ठी में,एक बार फिर से जीना चाहता है वही पुरानी जिंदगी।या खुदाया कोई तो बहाना हो इस शहर में रूकने का ,ठहर जाने का। काश! यह शहर दिल बड़ा करके रोंक ले।
कितने ऐसे लोग हैं जिनसे बहुत कुछ कहना था, बहुत कुछ सुनना था, कितनों को माफ करना था,मांगनी थी कितनों से ही माफ़ी। कितनों की शुक्रिया अदा नहीं हो पाई।
जानें वाला भींच लेना चाहता है शहर और वक्त को अपनी मुट्ठी में
शहर रेत की मानिंद झरता रहता है।
जानें वाला एक आखिरी बार शहर को देखता है कंठ से रूलाई फूटती है,और एक सवाल भी कि ___ऐ शहर ! मेरे जानें के बाद क्या तुम्हारे भीतर भी खाली होगी दो तलवे भर जमीन,कम होगी एक हंसी, एक कंठ भर रूलाई,दो स्नेहिल आंखें ...........
शालू शुक्ला
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