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तिवारी के पुरवा के गदहिया के एमए पास होने और छोटी-मँझोली पूँजी की सक्रियता के बीच संबंध

उच्च कोटि के प्रातः स्मरणीय सरयूपारीय ब्राह्मण श्री कामता प्रसाद तिवारी जी की कलम से
वर्ष 1986 में मैंने हाईस्कूल की परीक्षा दी थी और लटक गया था। रेखागणित में 50 में से 03 अंक मिले थे जो कि मेरी खून-पसीने की कमाई थी। 9-10 में रेखागणित पढ़ाने का काम जिस सूअर के जने ने किया था, उसका नाम था लालजी तिवारी। लालजी का सारा फोकस इंटरमीडियट के बच्चों पर रहता था, घोर ट्यूशन-प्रेमी थी। 9-10 के बच्चों को उसने क्लास में कभी कुछ पढ़ाया ही नहीं, माने क्लास ही नहीं ली। जो उससे ट्यूशन पढ़े, वही पास हुए। वहीं अंकगणित में मुझे 50 में से 28 अंक और फिजिक्स में 40 में से 37 अंक मिले थे। जाहिर है पढ़ाई के लिहाज से मैं ब्राइट स्टूडेंट था। खैर, अगली साल रो-गाकर हाईस्कूल पास हो गया लेकिन दोनों ही साल यूपी का रिजल्ट 30 परसेंट के आसपास ही रहा।
जब वोट की राजनीति में बढ़त पाने के लिए सपा ने यूपी बोर्ड की शिक्षा का नाश पीटा
मुलायम राज में दसवीं-बारहवीं पास होने वाले-लैपटॉप पाने वाले बच्चों ने अहीर भगवान का खूब गुण गाया होगा लेकिन योगी बाबा को क्या कहा जाए कि उन्होंने कल्याण सिंह के जमाने जैसी सख्ती क्यों नहीं करनी चाही और शैक्षणिक स्तर को रसातल तक नीचे जाने दिया।
इसके कारण हमारी अर्थव्यवस्था में छिपे हैं। केंद्र-प्रदेश की सरकार पूँजीपतियों को ज्यादा से ज्यादा सब्सिडी देने के लिए प्रतिबद्ध है। जनता को हरसंभव तरीके से लूटा जा रहा है। परोक्ष उगाही और करारोपण समझने वाली बात होगी। स्वास्थ्य-शिक्षा पर खर्च करने के लिए सरकार के पास बजट ही नहीं है। छोटा सा देश है फिनलैंड , जहाँ के बनाए हुए कंप्यूटर साइंस के कोर्स से इन दिनों मैं पढ़ाई कर रहा हूँ। वहाँ पर शिक्षा मुफ्त और एक समान है। निजी पूँजी के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।
क्या चुनावी पार्टियाँ कभी इसे अपने एजेंडे में, अपने घोषणापत्र में इस बात को शामिल कर पाएंगी कि स्वास्थ्य-शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूँजी की बिल्कुल भी घुसपैठ नहीं होने दी जाएगी, उतने ही डॉक्टरों-शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा, जितने की जरूरत होगी। संसद में जाने को आतुर कथित कम्युनिस्टों को भी यह बात हजम नहीं होगी।
जनता है कि अंग्रेजी के नाम पर पगलाई हुई है। खाने को नहीं है दाने, अम्मा चली भुनाने। कुकुरमुत्तों की तरह उग आए स्कूलों में 5-5 हजार रुपये में लोग पढ़ा रहे हैं। बड़े सरकारी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने के लिए दो-दो साल की कोचिंग करनी पड़ती है, क्यों? क्योंकि शिक्षकों को वैज्ञानिक ढंग से पढ़ाने की ट्रेनिंग ही नहीं दी गई होती है।
स्कूल संचालक प्रायः किसी न किसी चुनावी दल के खासमखास होते हैं। जब हाईस्कूल का रिजल्ट बढ़िया होगा, तभी तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूँजी निवेश को बढ़ावा दिया जा सकेगा। तभी तो डिग्री लेवल पर ज्यादा से ज्यादा बच्चे मिल पाएंगे और हर 5-7 किमी पर एक डिग्री कॉलेज खुल पाएगा।
हाई स्कूल में बच्चे ने अगर गणित-विज्ञान ठीक से नहीं पढ़ा तो 12 पास करने के उपरांत अगर वह निजी कॉलेज में कंप्यूटर साइंस पढ़ने जाता है तो क्या घंटा पढ़ेगा। वह किसी तरह से अपना दिन काटेगा और शारीरिक श्रम से हमारे गदहिया की तरह दूरी बनाए रखेगा। अंत में वह धरती-समाज पर बोझ ही साबित होगा।
इस बात को लेकर आंदोलन छेड़े जाने की जरूरत है कि शिक्षा मातृभाषा में दी जाए और निजी पूँजी की घुसपैठ को पूरा तरह खत्म किया जाए। आवासीय विद्यालय खोले जाएं, जहाँ कम से कम दसवीं तक सभी बच्चों को रखा जाए। ———————— लेकिन इस सबके लिए एकमात्र उपाय खूनी कम्युनिस्ट क्रांति का आह्वान करना है, समझाने मात्र से कोई अपनी हरमजदगी भला क्यों छोड़ेगा।
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हमारे रमेश पांडेय गणित में कमजोर थे और १०वीं पास नहीं कर पाए जबकि उनकी भाषाई क्षमता बेजोड़ है, बाबू केबी सिंह की दादी ने भोलेबाबा को धमकी दी थी कि शिवलिंग उखाड़ फेंकेगी लेकिन यह धमकी भी बअसर रही और उनका नाती आजकल प्रधानी कर रहा है, माने राजनीति में है पर दसवीं पास न कर सका। आज जैसे हालात होते तो ८० बीघा काश्तकार का नाती पीएचडी धारक होता। —————— जय हो
