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कांग्रेसियों ने भी जल-जंगल-जमीन और आदिवासियों का पीटा था नाश — तेलुगु कवि वरवर राव की कलम से

नवजीवन संस्कृति के लिए
‘ऑपरेशन ग्रीनहण्ट’ का मतलब है केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा जनता पर सीधा हमला। साम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण की यह सामरिक अभिव्यक्ति है। सर्वप्रथम निजीकरण, उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के विश्वबैंक प्रणीत ‘विकास’ के नमूने के अंश के बतौर पूर्वी भारत से लेकर मध्य भारत तक तमाम आदिवासीबहुल वन-प्रान्तों में बड़ी खनिज दोहन परियोजनाओं, खानों की खुदाई, कारखानों-उद्योगों के निर्माण, विशाल नदी-बाँध परियोजनाओं, सड़क एवं रेल मार्गों का निर्माण, बहुराष्ट्रीय तथा देसी बड़े उद्योग घरानों को इस समूचे इलाके को सौंपने के लिए किये गये ‘समझौते’ पर एकाधिक फैसला किया गया। इसके अमल में आदिवासियों से, आम जनता से आए मुखर प्रतिरोध को कुचलने के लिए 2009 में ‘ऑपरेशन ग्रीनहण्ट’ शासकों का मनपसन्द जरिया बना। इसके तहत एक लाख पचास हजार अर्धसैनिक बलों को मध्य भारत में उतारा गया। गाँव के गाँव आग के सुपुर्द कर दिये गये। दूरदराज के देहातों से आदिवासियों को खदेड़कर देश में ही उन्हें शरणार्थी बना डाला गया। महिलाओं से बलात्कार कर और माओवादियों को मुठभेड़ में मार गिराने के नाम पर माओवादियों के साथ-साथ सैकड़ों आदिवासियों का कत्लेआम चलाकर एक नादिरशाही दरिन्दगी अमल में लायी गयी।
इतने भयंकर विनाश का सामना करते हुए 2004 से ही दण्डकारण्य के बस्तर में, झारखण्ड के सारण्डा में जनतन सरकार वजूद में हैं। 2011 के माह में चलाये गये 'ऑपरेशन...
हाका' आदि के नाम से 'ऑपरेशन ग्रीनहण्ट' जब अपने दूसरे चरण में दाखिल हो चुका तो जनसंग्राम से उसका मुकाबला करते हुए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने भी इंकलाबी जनतन सरकार की अवस्था में प्रवेश कर लिया है।
जनतन सरकार का मतलब क्या है?
श्रम और सहयोग के तरीके से स्वावलम्बन/आत्मनिर्भरता की बुनियाद पर जनता की जरूरतों को पूरा करने में बुर्जुआ चुनाव में हिस्सा न लेते हुए तथा बुर्जुआ सरकार को कर न देकर, जनता अपने जनवाद पर अमल कर रही है। कुल मिलाकर कुछ हद तक सहयोगिता के तौर-तरीकों का भले ही अमल हो रहा हो, मुख्यतः सहकारी तरीके का अमल हो रहा है। इसी वजह से जमीन का वितरण करना पड़ रहा है। जनतन सरकार समूचे दण्डकारण्य में उत्पादन को सहयोगिता और साम्यवादी उत्पादन की दिशा में ले जाने की ओर प्रयासरत है।
यह जनतन सरकार नव-जनवादी क्रान्ति की अवस्था में पहला रूप है। इसी वजह से सबकुछ तत्काल सहयोग के आधार पर सामूहिकता आधारित बना डालना अभी मुमकिन नहीं। जनता के रुझान को उस दिशा में मोड़कर विकसित करना, जो ढाँचा उनके अनुरूप नहीं उसे थोपना, या सुझाना उचित न होगा।
फिलहाल, ऐसे टोलों-गाँवों में जहाँ 500 से 800 की आबादी है, एक जनतन सरकार कमेटी स्थापित हो रही है। लगभग ग्राम पंचायत के समान। ये गाँव-टोले के लिए सरकार हैं। इस कमेटी के तहत न्याय विभाग, कृषि विभाग, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, वन विभाग, सहकारिता विभाग, संस्कृति विभाग... आदि दफ्तर होते हैं। ये सभी स्थानीय उपादानों/संसाधनों, मानव श्रम और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बुनियाद पर काम कर रहे हैं।
उदाहरण के लिए, बीजों का चुनाव, वितरण, खाद आदि के मामले मुख्यतः जनतन सरकार का कृषि विभाग सम्हालता है।
यहाँ देशी/स्थानीय किस्म के बीज ही इस्तेमाल हो रहे हैं। करीब तीस से चालीस किस्म के बीज इस्तेमाल हो रहे हैं। धान, ज्वार, कोदों, कुटकी, तिल, सामा, तैदा आदि उगाये जा रहे हैं।
माड़ अंचल अधिकतर पहाड़ी इलाका है। यहाँ ज्यादातर कोदों, सामा, गहका, उड़द आदि की फसलें ली जाती हैं। यहाँ के वातावरण और यहाँ की जमीन में ये फसलें समुचित, मुफीद और फलदायी हैं। कृषि विभाग के जिम्मेदार कर्मी यहाँ पैदा हुई फसलों में से बीज का चुनाव कर सबमें बाँटने की जिम्मेदारी निभाते हैं। जनतन सरकार की अगुआई में लोगों ने सहयोगिता के सूत्रों के तहत तालाबों-तलैयों का निर्माण किया है। जब तक ये काम चले, जनतन सरकार ने अनाज जुटाकर काम पर आए लोगों के भोजन का इन्तजाम किया। सरकार हर तालाब के लिए जरूरत के मुताबिक कुछ निधि मुहैया कराती है। पार्टी भी कुछ निधि जनतन सरकार को उपलब्ध कराती है। इस तरह के विकास के काम के लिए तब कुल राशि में से कहाँ कितना जुटाना है, सम्बन्धित कमेटी फैसला करती है। तालाब के निर्माण, खेती के औजारों, स्वास्थ्य आदि के लिए जरूरत भर निधि इसी कोष से बाँटी जाती है। यह एक तरीका हुआ। बड़े तालाबों, जलाशयों के निर्माण में काफी ज्यादा कार्यदिवस खर्च होते हैं। महीनों काम करना पड़ता है। ऐसे मौकों पर जनतन सरकार कुछ वेतन का भुगतान भी करती है। हाँ, यह ‘वेतन’ जरूर बहुत ही कम होता है, पर इसके पीछे सहयोग की भावना और सहकारी श्रम ही प्रधान है।
आने वाले दिनों में खेतीबाड़ी की जरूरतों के मद्देनजर बड़े निर्माणों को भी शुरू किया जाएगा। पाँच या दस हजार एकड़ जमीन की सिंचाई में सक्षम बाँधों का निर्माण हाथ में लेना होगा। कुछ बड़े बाँध आदि को वक्त आने पर जब इनका परिणाम नजर आने लगा तब पूरी शिद्दत के और उत्साह से हिस्सेदारी निभा रहे हैं।
बाहर सहयोग दिखलाई नहीं पड़ता। पड़ोसी का गला रेतना, बीवी का मंगलसूत्र तक छीन लेना, जन्म देने वाले माँ-बाप तक की हत्या, जीते-जी बड़े-बूढ़ों को गाड़कर 'बोझ' मुक्त होना, सम्पत्ति हड़पना, यही हर तरफ नजर आता है। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है। खास कर शोषण नहीं है। आन्दोलन शुरू होने से पहले महिलाओं की काफी दिक्कतें थीं। तकलीफें थीं। जबरन ब्याह आम था। लड़कियों को बलशाली/रुतबेदार लोग दूसरी बीवी, तीसरी बीवी के तौर पर उठा ले जाते। अब ये सब खत्म हो गये हैं। अगर कहीं ऐसी घटना हो जाती है, तो जनतन सरकार को तुरन्त खबर लग जाती है जो दखल देकर, समस्या के दोनों पक्षों को समझाकर फैसला/हल सुझाती है। (देखें चिन्तलनार-बासगुड़ा जल्लादी ताण्डव, क्रान्तिकारी जनतन सरकार की पृष्ठभूमि : पाणि, विरसम् प्रकाशन पृष्ठ 39–49)
सामन्ती-पूँजीवादी शोषण और साम्राज्यवादी विध्वंस का विरोध करते हुए जो लोग जनता की स्वावलम्बिता की आकांक्षा की कद्र करते हैं, जो भारत की सार्वभौमिकता का सम्मान करते हैं, ऐसे देशभक्तों और जनवादियों में से हर एक को इन प्रयोगों के बारे में जानना चाहिए।
भौतिक हिंसा जितनी आसानी से समझ में आती है, व्यवस्था में अन्तर्निहित हिंसकता को समझ पाना उतना आसान नहीं है। जिस स्तर पर मुठभेड़ों, बारूदी सुरंग विस्फोटों, मुखबिरों के सफाये और पुलिस कैम्पों पर हमलों की रिपोर्टिंग होती है, मीडिया में इस वैकल्पिक समाज व्यवस्था के निर्माण के बारे में रिपोर्टिंग नहीं होती। जब युद्ध चल रहा हो तब उस युद्ध का प्रतिरोध कर रही जनता के जनयुद्ध के दौरान साथ-साथ सृजनशील उत्पादनकर्म और निर्माणकार्य में जनता की भागीदारी को रेखांकित करने वाली दृष्टि, रोजमर्रा के इन कामों को महत्व देने वाला नजरिया, सिर्फ उन्हीं के लिए मुमकिन है जो पक्षधर हैं। किसी परिवर्तन की झाल में, वह भी जब किस तरह का कष्ट सहन करना जा रहा है, कैसे विकसित हो रहा है, इन बातों को समझने के लिए जनवादी दृष्टि का होना ही काफी नहीं, एक ऐतिहासिक भौतिकवादी नजरिये का होना भी बहुत जरूरी है।जिस तरह नक्सलबारी की उथलपुथल वाला दौर, जिस तरह वियतनाम की जनता मान गयी थी, तमाम जनहितैषी आज जनतन सरकार की अपना मान कर इनकी रक्षा करें, इनका बचाव करें, इसी समझ आकांक्षा के चलते इन लेखों को एक जगह लाकर आप लोगों के हाथों में रखने की लालसा दूसरी किसी नीयत से संचालित नहीं है।जनता के इस जनवादी प्रयोग के बारे में, बस्तर के ले प्रत्यक्ष हमलों के विषय में, संघर्ष के इलाकों के बाहर की जनता को, जनवादी ताकतों को, देशभक्तों की जानकारी उपलब्ध कराने के नजरिये से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों में लिखे लेखों और इस विषय पर आयी किताबों के आमुख/भूमिकाओं में लिखी गयी सामग्री को एकत्र कर पुस्तक का रूप दिया है। इस तरह सम्पूर्णता में इस विषय पर पढ़ना मुमकिन होगा पर साथ ही कुछ बातों का दोहराव भी परिलक्षित होगा। इन लेखों की प्रथम प्रकाशित करने वाले 'आन्ध्र ज्योति', 'नमस्ते तेलंगाणा' जैसे दैनिकों और 'वीक्षणम्', 'अरुणातारा' सरीखी मासिक पत्रिकाओं की, विरसम् (विप्लव रचयितल संघम् का संक्षेप जो तत्कालीन आन्ध्र प्रदेश के क्रान्तिकारी लेखकों का संगठन है) तथा सलुपु प्रकाशन की कृतज्ञताएँ व्यक्त करते हुए...—वीवी (वरवर राव)हैदराबाद, 8 फरवरी
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ये क्या जगह है दोस्तो … सेतु प्रकाशन से किताब मंगवाई जा सकती है
