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जन-विरोधी नेशन-स्टेट की विधि-प्रवर्तन एजेंसियाँ और स्टेट के चौथे खंभे की हकीकत

उच्च कोटि के प्रातः स्मरणीय सरयूपारीय ब्राह्मण परम श्रद्धेय श्री कामता प्रसाद तिवारी की कलम से
पूँजीवाद अति-उतपादन और बेरोजगारी के दोहरे संकट से जूझ रहा है। अभी कुछ ही महीने हुए जब हजारों-हजार मजदूर अपने वेतन में वृद्धि को लेकर सड़क पर थे और हमारे मुख्यमंत्री बेहद मरियल स्वर में अत्यंत मामूली वेतन-वृद्धि की घोषणा कर रहे थे। उनकी घोषणा से कोई भी सरल-हृदय व्यक्ति कनविंस नहीं था लेकिन उन्हें इसकी तनिक भी परवाह नहीं रही होगी क्योंकि वह तो हिंदू-मुस्लिम के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए राजनीति करने के अभ्यस्त रहे हैं और उन्हें अपने इस कार्ड पर अभी भी पूरा भरोसा होगा ही।
मैं यह भूमिका क्यों बाँध रहा हूँ? वह यह दर्शाने के लिए कि भारतीय राष्ट्र-राज्य बीमार हो चला है और अपनी ही विद्रोही संतानों के साथ प्रति-बर्बर सुलूक करने पर आमादा है। बताते चलें कि नक्सली दूसरे ग्रह से आए हुए लोग नहीं हैं, वे इसी देश के दबे-कुचले लोगों की भलाई के लिए संघर्षरत लोग हैं। सरकार और उसकी संपूर्ण मशीनरी चाहती है कि लोग हमेशा अपने मुंह पर ताला लगाए रहें, भले ही उनकी न्यूनतम जरूरतों तक पहुँच बाधित हो रही हो। सब कुछ पूँजीपतियों के हवाले कर देने के पागलपन के वशीभूत होकर सरकार में बैठे लोग स्टेट मशीनरी का जमकर दुरुपयोग कर रहे हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि जहाँ मध्य-काल में प्रशासनिक अमला ही शासक वर्ग हुआ करता था वहीं इसके उलट आधुनिक युग में नौकरशाही पूँजीपति वर्ग की चेरी बनकर रह गई है। पूँजीपतियों के हितों की रखवाली करने के लिए समस्त विधि-प्रवर्तन एजेंसियों को काम पर लगा दिया जाता है। और अभी कुछ दिन पहले ही मैं किसी पुलिसिए की ही रील देख रहा था, जिसमें कहा गया था कि थानेदार बनने के लिए दरोगा कोई भी धतकरम-कुकरम करने के लिए तैयार बैठा रहता है। सोचने वाली बात यह है कि उनका एसपी कैसा होता होगा?
जो पुलिसिया नैतिक संकोच तजकर सप्लायर का काम करके थानेदार बनता है, उससे किसी भलमनसी की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है? हाफ-एनकाउंटर का चलन खूब बढ़ा है और मीडिया के जाहिलों में इतनी तमीज ही नहीं होती कि पुलिसिया प्रेस नोट से इतर चार लाइन भी लिख सकें। और तो और इन दिनों मुंह में माइक ठूंस देने को ही पत्रकारिता का पर्याय बना दिया गया है।
मैं इतनी रामकहानी क्यों लिख रहा हूँ, वह इसलिए कि बृजेश गंझू को नरभक्षी साबित करने के लिए बुर्जुआ स्टेट के चौथे खंभे यानि कि मीडिया का किस तरह से सुनियोजित सहारा लिया गया है। स्टोरी प्लांट करने का यही पैटर्न आमतौर पर देखने में आता है। ————————
पुलिस द्वारा गढ़ी गई कहानी को किस तरह से अखबार वाले छापते हैं, उसकी एक बानगी
उत्तर प्रदेश ATS के अनुसार बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता पर कुल 45 आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, आपराधिक साजिश, रंगदारी, आगजनी, संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, सरकारी कर्मचारियों पर हमला, अवैध हथियार और विस्फोटक रखने तथा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज मामले शामिल थे।
ATS के अनुसार वह प्रतिबंधित नक्सली संगठन तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति समिति (TSPC) का कमांडर/सुप्रीमो था और लंबे समय से हिंसक उग्रवादी गतिविधियों में सक्रिय था। एजेंसी का कहना है कि वह पहले CPI (Maoist) से जुड़ा था और बाद में TSPC से संबद्ध हो गया।
ATS के मुताबिक सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से उसकी गतिविधियों पर नजर रख रही थीं। वह करीब दो दशकों से सुरक्षा एजेंसियों की गिरफ्त से बचता रहा और कथित तौर पर अलग-अलग पहचान और स्थान बदलकर रहता था। ATS के अनुसार उसके खिलाफ NIA में भी मामले दर्ज थे और 2018 के एक मामले में NIA उसे तलाश रही थी।
पुलिस के अनुसार उसके ऊपर कुल 30 लाख रुपये का इनाम घोषित था—झारखंड पुलिस की ओर से 25 लाख रुपये और NIA की ओर से 5 लाख रुपये।
20 सितंबर 2026 को वाराणसी के रामनगर क्षेत्र में हुई मुठभेड़ के संबंध में ATS का कहना है कि बृजेश गंझू और उसका एक सहयोगी मोटरसाइकिल से जा रहे थे। ATS टीम ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, जिसके बाद दोनों ने कथित तौर पर पुलिस टीम पर गोलीबारी शुरू कर दी। पुलिस के अनुसार जवाबी कार्रवाई में गोली लगने से बृजेश गंझू घायल हुआ और अस्पताल ले जाने पर चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
मुठभेड़ के बाद ATS ने उसके पास से दो पिस्तौल, एक कार्बाइन, बड़ी मात्रा में कारतूस और एक लाख रुपये नकद बरामद होने का दावा किया। ATS के अनुसार मुठभेड़ के दौरान ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे डिप्टी एसपी विपिन कुमार राय और हेड कांस्टेबल नितेंद्र कृष्ण भी गोली लगने से प्रभावित हुए, हालांकि बुलेटप्रूफ जैकेट के कारण उन्हें गंभीर चोट नहीं आई।
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अभी मैंने इंटरनेट पर काफी खोजबीन की तो पता चला कि बृजेश पहले माओवादियों के साथ थे, फिर उनसे अलग होकर तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी नामक संगठन बनाकर काम करने लगे। यहाँ मुद्दे की बात बस इतनी है कि जिस आदमी को गिरफ्तार करके कोर्ट में केस चलाया जा सकता था, उसकी हत्या क्यों की गई?
