udvelit-janta
आकृति चौधरी की रासुका रद्द, बुर्जुआ सत्ता की नैय्या खा रही हिचकोलें, मैदानी माओवादी भी अब सत्ता के निशाने पर

प्रयागराजः व्यक्ति की आजादी और नागरिक स्वतंत्रता के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का आकृति चौधरी मामले में आया फैसला उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत रद्द कर दी। अदालत ने राज्य की ओर से प्रस्तुत कहानी को प्रथम दृष्टया ‘गढ़ी हुई’ बताते हुए पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। इसी नोएडा मजदूर आंदोलन के मामले में पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सत्यम वर्मा पर भी रासुका लगाया गया था। ऐसे में आकृति की हिरासत को लेकर अदालत की कड़ी टिप्पणियां सत्यम वर्मा की हिरासत की वैधता पर भी स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती हैं।
हाईकोर्ट ने आकृति के मामले में सरकार से बार-बार पूछा कि आखिर वह ठोस वीडियो साक्ष्य कहां है, जिसमें उन्हें मजदूरों को पत्थरबाजी या आगजनी के लिए उकसाते हुए दिखाया गया हो। अदालत ने यह भी सवाल किया कि आरोपपत्र दाखिल हो जाने के बाद किन गवाहों ने विशेष रूप से आकृति की भूमिका बताई है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब सरकार किसी व्यक्ति की सामान्य आपराधिक धाराओं के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे असाधारण कानून के तहत महीनों तक हिरासत में रखती है, तो उसके लिए प्रमाण का स्तर और प्रशासनिक प्रक्रिया भी असाधारण रूप से मजबूत होनी चाहिए। आकृति के मामले में अदालत को राज्य की ओर से प्रस्तुत सामग्री पर ही गंभीर संदेह दिखाई दिया।
सत्यम वर्मा का मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
सत्यम वर्मा को श्रमिक हिंसा के मामले में एक केस में जमानत मिल चुकी है। उस मामले में अदालत के सामने पुलिस द्वारा पेश किए गए व्हाट्सऐप ग्रुप और बैंक लेनदेन संबंधी साक्ष्य पर्याप्त ठोस नहीं पाए गए। हालांकि दूसरे मामलों में जमानत नहीं मिलने के कारण वे जेल से बाहर नहीं आ सके। 31 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार उनकी एक अन्य मामले में जमानत अर्जी भी खारिज हुई थी।
सत्यम वर्मा के खिलाफ पुलिस के दावों और उपलब्ध दस्तावेजों को लेकर स्वतंत्र रिपोर्टों में भी विरोधाभास सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार चार आरोपपत्रों में उनकी कथित भूमिका, घटनास्थल पर मौजूदगी और मोबाइल लोकेशन संबंधी दावों में विसंगतियां बताई गई हैं।
ऐसी स्थिति में सरकार से यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि क्या किसी नागरिक को लंबे समय तक रासुका में निरुद्ध रखने के लिए वही ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण सत्यम वर्मा के मामले में मौजूद हैं, जिनका दावा पुलिस ने किया था?
सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए
आकृति चौधरी के मामले में हाईकोर्ट का फैसला केवल एक व्यक्ति की रिहाई का आदेश नहीं है। यह प्रशासन को यह याद दिलाने वाला फैसला है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून प्रशासनिक सुविधा का हथियार नहीं हो सकता और नागरिक स्वतंत्रता को केवल आरोपों या अस्पष्ट सामग्री के आधार पर कुचला नहीं जा सकता।
यदि किसी अधिकारी ने बिना पर्याप्त आधार के किसी नागरिक को असाधारण कानून के तहत महीनों तक जेल में रखा है, तो केवल हिरासत रद्द कर देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। ऐसे मामलों में यह भी तय होना चाहिए कि निर्णय लेने में किस स्तर पर गलती हुई, उसके लिए जिम्मेदारी किसकी थी और भविष्य में ऐसी कार्रवाई को कैसे रोका जाएगा।
आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश इसी जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब निगाहें सत्यम वर्मा की रासुका हिरासत और उनसे जुड़े अन्य मामलों पर हैं।
एक ही आंदोलन, समान कानून और समान प्रशासनिक कार्रवाई के दायरे में आए लोगों के मामलों में यदि अदालत को एक मामले में सरकार की कहानी पर गंभीर सवाल दिखाई देते हैं, तो दूसरे मामले में भी उन आरोपों और साक्ष्यों की स्वतंत्र न्यायिक जांच होना नागरिक स्वतंत्रता की दृष्टि से बेहद जरूरी है।
