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जब डीएम के सीयूजी नंबर पर भी सूचना देने के बाद बिजली विभाग के जेई की ऐंठ बदस्तूर कायम रही

कामता प्रसाद
वाराणसीः 19 अक्टूबर सोमवार को नवमी के दिन मेरे घर कन्यापूजन था लेकिन लाइट सुबह से ही नहीं थी। अब जैसा कि होता है लाइट आती-जाती रहती है, जब तक इनवर्टर साथ देता रहता है घर वाले लोड नहीं लेते लेकिन जब इनवर्टर भी बैठ जाता है तो फिर असली समस्या शुरू होती है। कल दोपहर को ही मैंने पॉवर हाउस पर वल्लभाचार्य पांडेय को सूचित कर दिया था माने कंप्लने दर्ज करवा दी थी। वल्लभाचार्य पांडेय ही फोन उठाने और कंप्लेन दर्ज करने का काम करते हैं।
बार-बार फोन किए जाने पर श्री पांडेय बताते रहे कि एक ही लाइनमैन है जिसका नाम करिया है, उसे वाट्सऐप ग्रुप में सूचना दी जा चुकी है, जाकर बना देगा। आखिर में उन्होंने कहा कि अगर फोन नहीं लग रहा है तो करिया जाते वक्त बना देगा। लेकिन शाम छह बजे के आसपास करिया का फोन बंद पाया गया। श्री पांडेय से मैंने आगे का उपाय पूछा तो उन्होंने जेई-एसडीओ का नंबर दिया।
श्री पांडेय का अगर करिया से संपर्क नहीं हो पा रहा था और उन्हें यह भी पता था कि उस दिन एक ही लाइनमैन है तो उन्हें इसकी सूचना जेई को देकर किसी और फीडर से लाइनमैन की व्यवस्था करवानी चाहिए थी।
खैर, शाम ६.०० बजे जेई को फोन किया। फोन पहली बार में उठा नहीं, दूसरी बार उठने पर जेई श्री पाल ने कहा कि किसी को भेजते हैं, दूसरी बार फोन उठने पर उन्होंने कहा कि सिंगल कंज्यूमर के लिए वह फीडर नहीं बंद करा सकते। फिर मैंने एसडीओ को फोन किया और लास्ट में डीएम के सीयूजी नंबर और आवास पर लेकिन लाइनमैन नहीं आया तो नहीं आया और जेई की ऐंठ जस की तस कायम रही।
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जेई ने नपुंसक क्रोध की अभिव्यक्ति वाले मेरे उद्गार रिकार्ड कर रखे हैं और एसडीओ थाने पर तहरीर दिए जाने संबंधी बात भी कर रहा था। थाने को चाहिए कि इस टिप्पणी को मेरी ओर से दर्ज कराई जाने वाली तहरीर समझे और जनता के ऐसे रिश्वतखोर, अक्षम-नाकारा कारकूनों के विरुद्ध संगत धाराओं में विधिक कार्रवाई करे।
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मौजूदा जेई रिश्वतखोर है या नहीं, मुझे नहीं पता लेकिन ६-७ साल पहले जब मेरा घर बन रहा था तो बिना सुगमीकरण शुल्क दिए मीटर नहीं लगा था तो निगमनात्मक तर्क तो यही कहता है कि जेई का रिश्वतखोर होना नियम है, और ईमानदार होना अपवाद।
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मेरे दामाद जी ने एसडीओ से जो बात की उसकी रिकार्डिंग मेरे पास भी है। हमारा संविधान सभी धर्मावलंबियों को और किसी भी धर्म को न मानने वालों को एक समान अधिकार देता है लेकिन व्यवहार में देखा गया है कि धार्मिक लोगों की दादागिरी आम है। धर्म से जुड़ी तमाम जहालतों से मेरा दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि मैं भारत की प्रथम कम्युनिस्ट पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्राथमिक सदस्य हूँ। दिन में ही सूचना दे दिए जाने के बावजूद मेरी लाइन ठीक नहीं करवाई गई और शाम को पंडाल की बिजली नहीं काटे जाने का लंगड़ा बहाना दिया जा रहा था।
मेरे अति क्रोधित होने का एक और तात्कालिक कारण था। मेरा मनोरंजन शराब पीकर या किसी तरह से व्यसन की शरण में जाकर नहीं होता। किसी कल्पित परमशक्ति के आगे आर्तनात करना भी मेरे स्वभाव में नहीं है। मैं कंप्यूटर साइंस की बुनियादी बातें सीख रहा हूँ। उन्नत स्तर की कंप्यूटर भाषाओं का अभ्यास कर रहा हूँ और सॉलिडिटी नामक एक नई भाषा सीखने का मन भी बना चुका हूँ।
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क्रांति करना दुनिया का सबसे व्यावहारिक काम है तो मैं अपने बारे में कैसे कह दूं कि निपट बकलोल हूँ और दुनियादारी बिल्कुल नहीं आती। किसी सरकारी बंदे के घूसघोर होने पर मुझे अचरज नहीं होता क्योंकि पूँजीवादी दुनिया में उत्पादन मानव समाज की जरूरत के लिए नहीं अपितु बाजार हेतु मुनाफे के लिए संगठित किया जाता है और इस क्रम में होती है श्रम की लूट। तो श्रम की लूट जब तक कानूनी और “नैतिक-पवित्र“ मानी जाती रहेगी। घूस देना और लेना भी चलन में बना रहेगा तो अगर जेई लोग घूस खाते हैं और घूस का कुछ हिस्सा एसडीओ को भी देते हैं तो ऐसा होना ही चाहिए। यही तो दुनियादारी है।
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बाजार में चाय की टपरियों पर लोग योगी-मोदी को कोसते हुए मिल जाएंगे कि नौकरियों की वैकेंसी नहीं निकल रही लड़के ओवरएज हो रहे हैं। अब आप ही बताइए कि ट्रेन में जब कोई मजबूर मजदूर बिना टिकट यात्रा करता है तो टीटी उसकी खाल उधेड़ देता है कि नहीं? अब बेइज्जत होना किसको अच्छा लगता है, अगर बेचारे के पास पैसे होते ही तो टिकट लेकर यात्रा नहीं करता। सरकारी बैंकों में जाइए, वहाँ बैठा क्लर्क आपके स्वाभिमान के साथ ३७७ करने को आतुर बैठा होता है। ————————यही वजह है कि आम जनता सरकारी कारिंदों से इतनी नफरत करती है जो कि ससुरे खुद को साहब कहलाना पसंद करते हैं।
रट्टा मारकर बड़ी मुश्किल से नौकरी पाने वालों का अमानवीकरण तो फॉर्म भरने और धक्के खाने की प्रक्रिया में ही गया होता है। रही-सही कसर क्रम-परंपरा यानि कि हायरआर्की की व्यवस्था में हर दिन होता ही रहता है, जहाँ पर हर बड़ा साहब छोटे साहब के साथ धतकरम करता रहता है। और छोटा साहब अपनी सारी खीझ बाबू टाइप के लोगों पर उतारते हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था में साइंस-लॉजिक और युक्तिसंगतता को तो अभाव है ही, हमें ठीक से मनुष्य होना भी नहीं आया है। डेमोक्रेसी की बात हम जरूर करते हैं लेकिन हम खुद डेमोक्रेट नहीं हैं। ——————-I am government servant का राग अलापने वालों की नौकरी अगर किसी कारण से चली जाए तो ये नाना के यहाँ बकरी चराते ही नजर आएंगे, फिर से अपनी दम पर उठ खड़े होने की ताब इनमें नहीं होती। कामता प्रसाद तो फिर भी ५७ की उम्र में गणित और विज्ञान भी फिर से पढ़ रहे हैं, यह होता है एक कम्युनिस्ट का अनुशासन और दृढ़संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति कि मौत को एक घरी टाल दे।
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मेरे घर के बाईं तरफ बांस की कोठ है, बांस अक्सर ही तार पर आकर लटकता रहता है। आधे से ज्यादा बांस मेरे घर पर झुके हुए है। कई बार बिजली कटने का यह भी एक कारण होता है। मैं कोठ के ७२ मालिकों को यह तो नहीं कह सकता कि भइया इसे कटवा दो, क्योंकि कोई न कोई लड़ाई करने पर उतारू हो ही जाएगा। तो बिजली विभाग और बड़ागांव थाना दोनों से ही गुजारिश है कि इस ओर भी ध्यान दिया जाए।
