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शब्दों से रेखाओं तक : डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला की दो कृतियों का लोकार्पण

जयपुरः प्रख्यात चित्रकार, लेखिका एवं कवयित्री डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला की सृजन यात्रा को समेटती दो महत्वपूर्ण पुस्तकों मौन की आकृतियाँ और भारतीय चित्रकला : एक विहंगम दृष्टि का शनिवार को प्रौढ़ शिक्षण सभागार, जयपुर में आयोजित गरिमामय समारोह में लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर डॉ. शुक्ला की कविताओं पर आधारित रेखाचित्रों की प्रदर्शनी ने शब्द और रंग-रेखाओं के अद्भुत संगम से साहित्य एवं कला प्रेमियों का ध्यान खींचा।
समारोह की अध्यक्षता ललित कला संकाय, बनस्थली विद्यापीठ के पूर्व डीन एवं राजस्थान ललित कला अकादमी के अध्यक्ष प्रो. भवानी शंकर शर्मा ने की। उन्होंने दोनों पुस्तकों को डॉ. शुक्ला की दीर्घ रचनात्मक साधना का महत्वपूर्ण विस्तार बताते हुए कहा कि आज ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता है, जो कला को विशेषज्ञों तक सीमित न रखकर विद्यार्थियों, कलाकारों और सामान्य पाठकों तक पहुंचाएं। उन्होंने भारतीय चित्रकला : एक विहंगम दृष्टि में भारतीय चित्रकला की मूल चेतना को सहजता से समेटने तथा मौन की आकृतियाँ में संवेदनाओं को शब्द और रेखाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करने की मुक्तकंठ से सराहना की।
पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग, राजस्थान सरकार के अधीक्षक नीरज कुमार त्रिपाठी ने भारतीय चित्रकला : एक विहंगम दृष्टि को भारतीय कला-परंपरा को समग्रता में समझने की सार्थक कृति बताया। समीक्षक श्रीमती उमा शर्मा, पूर्व व्याख्याता, चित्रकला, ने कहा कि मौन की आकृतियाँ में कविता और रेखा का संवाद मानवीय संवेदनाओं को भीतर तक स्पर्श करता है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. सूरज सिंह नेगी, विशिष्ट सहायक, सहकारिता एवं नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री, राजस्थान सरकार, ने कहा कि उत्कृष्ट और कालजयी सृजन के मूल में संवेदनशील दृष्टि होती है। डॉ. शुक्ला की रचनात्मकता उनकी अनवरत साधना, दीर्घ चिंतन और निरंतर अभ्यास की निष्पत्ति है।
डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला ने कहा कि भारतीय चित्रकला : एक विहंगम दृष्टि में भारतीय चित्रकला की दीर्घ यात्रा और सांस्कृतिक चेतना को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया गया है, जबकि मौन की आकृतियाँ उन अनुभूतियों को कविता और रेखाओं में अभिव्यक्त करती है, जिन्हें शब्दों में पूरी तरह बांध पाना कठिन है।
आयोजन का प्रभावशाली और काव्यात्मक संचालन डॉ . कंचना सक्सेना पूर्व प्राचार्य एवं प्रो.राजकीय महाविद्यालय राजस्थान ने किया।
प्रौढ़ शिक्षण समिति, जयपुर के आयोजन में संपन्न यह समारोह साहित्य, चित्रकला और मानवीय संवेदनाओं के जीवंत संगम के रूप में यादगार रहा।
