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काशी और क्योटो के बीच फँसा बनारस

बनारस इन दिनों बड़ी परेशानी में है। उसकी हालत उस बूढ़े पिता जैसी हो गई है जिसके बच्चे उसे आधुनिक बनाने पर तुले हों। कोई उसकी दाढ़ी ट्रिम करना चाहता है, कोई उसके कुर्ते की जगह सूट पहनाना चाहता है, और कोई समझा रहा है कि अगर दुनिया में सम्मान चाहिए तो थोड़ा "ग्लोबल" बनना पड़ेगा।
बनारस बेचारा सोच रहा है कि आखिर उसमें कमी क्या थी। हजारों साल से लोग यहाँ आ रहे थे, बिना किसी स्मार्ट सिटी मिशन के। घाटों पर सूर्योदय भी होता था, आरती भी होती थी और जीवन-मृत्यु का कारोबार भी चलता था। लेकिन अचानक उसे बताया गया कि वह पिछड़ा है। अब उसे आधुनिक बनना होगा। फिर किसी ने सलाह दी कि क्योटो जैसा बनो।
क्योटो का नाम सुनते ही बनारस चौंक गया। उसने पूछा, "भाई, यह क्योटो कौन है?" जवाब मिला, "जापान का शहर है। उसने अपनी परंपरा बचाकर आधुनिकता को गले लगाया है।"
बनारस ने राहत की साँस ली। उसे लगा कि शायद उससे उसकी गलियाँ, घाट और गंगा नहीं छीनी जाएँगी। लेकिन जल्द ही उसे समझ में आ गया कि विकास की भाषा में 'संरक्षण' का अर्थ अक्सर वही होता है जो राजनीति में 'त्याग' का होता है—दूसरों से अपेक्षित।
अब बनारस के घाट पहले से ज्यादा चमकते हैं, लेकिन उन पर बैठने वाले बूढ़े नाविक कम होते जा रहे हैं। गलियाँ अभी भी हैं, पर उन्हें देखकर कई लोग अफसोस जताते हैं कि इन्हें थोड़ा और चौड़ा क्यों नहीं कर दिया गया। श्रद्धालु अभी भी आते हैं, मगर उनके साथ सेल्फी स्टिक और ड्रोन भी आते हैं। मोक्ष की खोज और इंस्टाग्राम रील, दोनों एक ही फ्रेम में दिखाई देते हैं।
सबसे दिलचस्प दृश्य तब होता है जब कोई विशेषज्ञ बनारस को समझाने आता है। वह एयर-कंडीशंड सभागार में खड़े होकर बताता है कि बनारस की आत्मा को बचाना कितना ज़रूरी है। उसके प्रस्तुतीकरण में बनारस के इतने नक्शे, चार्ट और मॉडल होते हैं कि स्वयं बनारस को भी संदेह होने लगता है कि वह वास्तव में कहाँ स्थित है।
बनारस की असली त्रासदी यह नहीं है कि वह काशी से दूर जा रहा है या क्योटो के करीब पहुँच रहा है। उसकी त्रासदी यह है कि हर कोई उसके लिए सपना देख रहा है, सिवाय उसके अपने। कोई उसे धार्मिक राजधानी बनाना चाहता है, कोई पर्यटन राजधानी, कोई सांस्कृतिक ब्रांड और कोई वैश्विक विरासत नगर। बेचारे बनारस को आज तक यह तय करने का मौका ही नहीं मिला कि वह खुद क्या बनना चाहता है।
शायद इसी कारण वह आज काशी और क्योटो के बीच फँसा हुआ है। एक हाथ उसे अतीत की ओर खींच रहा है, दूसरा भविष्य की ओर। और बीच में खड़ा बनारस मुस्कुरा रहा है। उसे मालूम है कि योजनाएँ, परियोजनाएँ और नारे आते-जाते रहेंगे। अंत में वही बचेगा जो सदियों से बचता आया है—उसकी जिद, उसकी अव्यवस्था, उसका हास्य और उसकी अद्भुत क्षमता कि वह हर बदलाव को अपने ढंग से पचा ले।
आखिर बनारस है। उसे जीतना आसान नहीं, उसे समझना उससे भी कठिन है।
राजेश कुमार ओझा, वाराणसी
