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हमारी शिक्षा-व्यवस्था सर्वसमावेशी है ‌: प्रो. हरेंद्र कुमार सिंह
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हमारी शिक्षा-व्यवस्था सर्वसमावेशी है ‌: प्रो. हरेंद्र कुमार सिंह

July 22, 2026
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चंदौली: भारतीय शिक्षण मंडल, काशी प्रांत तथा राहुल नॉलेज सिटी एजुकेशनल कैंपस, महुअर कलां, चंदौली के संयुक्त तत्त्वावधान में 'भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति' विषय पर एकदिवसीय संगोष्ठी सह परिचय-वर्ग का भव्य आयोजन संस्थान के अतिथि-गृह संगोष्ठी कक्ष में किया गया। इस अवसर पर शिक्षाविदों, विद्वानों और समाज के गण्यमान्य नागरिकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय सह-प्रचार प्रमुख एवं बी.एच.यू. के पर्यटन प्रबंध विभाग के आचार्य डॉ. अनिल कुमार सिंह ने मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय शिक्षा के उत्थान और भारतीय शिक्षण मंडल के उद्देश्यों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज फिर हमें अतीत की ओर जाकर अपनी शिक्षा-पद्धति को गुरुकुल के अनुरूप बनाना होगा।
मुख्य वक्ता भा.शि.मं. काशी प्रांत के उपाध्यक्ष, पूर्व कुलपति तथा वाणिज्य संकाय, बी.एच.यू. के अध्यक्ष एवं डीन प्रो. हरेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि हमें अपने जीवन का उद्देश्य (Objective Function) स्पष्ट रखना चाहिए। हमें यह तय करना होगा कि हम प्रतिदिन, प्रतिमाह तथा प्रतिवर्ष क्या हासिल करना चाहते हैं। हमें सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में कार्य करना चाहिए। जीवन में कभी नकारात्मकता नहीं होनी चाहिए। कबीरदास जी की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमें सदैव सकारात्मक नजरिया अपनाना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रीय उत्थान हेतु योजनाबद्ध विकास पर बल दिया। उन्होंने कहा कि 1947 में आजादी के बाद 1951 से पंचवर्षीय योजनाएंँ शुरू हुईं और आज नीति आयोग के माध्यम से देश आगे बढ़ रहा है। 'विकसित भारत' केवल कागजी योजनाओं से नहीं, बल्कि सामूहिक कार्य एवं कर्तव्य से बनेगा। उनका कहना था कि भारत की शिक्षा-व्यवस्था विश्व की सबसे मजबूत और सर्वसमावेशी व्यवस्था है।
इस अवसर पर विशिष्ट वक्ता भा.शि.मं. काशी प्रांत की महिला गतिविधि प्रमुख एवं शासकीय महिला महाविद्यालय, डी.एल.डब्ल्यू., वाराणसी के संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रो. रचना शर्मा ने अपने वक्तव्य में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता पर बल दिया। इसके लिए उन्होंने स्वभाषा में अध्ययन-अध्यापन को प्रमुखता देने का आग्रह करते हुए कहा कि हमारी भाषा को बदलकर अंग्रेजी किए जाने से हम अपनी संस्कृति से दूर हुए। 'ऋग्वेद' में वर्णित 'अश्विन सूक्त' का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत की चिकित्सा-पद्धति अत्यंत समृद्ध थी। उन्होंने कहा कि हमारी शिक्षा में पारिवारिक एवं नैतिक मूल्य समाहित होने चाहिए। हमारी शिक्षा में दार्शनिक भाव और प्रभु श्रीराम का चरित्र समाहित है। "पृथ्वी हमारी माता है और हम सब उसके पुत्र हैं" — यही हमारी शिक्षा का आधार रहा है।आगे उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में दादी-नानी की कहानियों एवं सांस्कृतिक कथाओं के माध्यम से बच्चों में संस्कार भरे जाते थे। परंपराओं से ही चरित्र और संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास संभव है।

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इस अवसर पर भारतीय शिक्षण मंडल के वाराणसी और चंदौली जिले की कार्यकारिणी की भी घोषणा की गई। वाराणसी के संयोजक श्री संजीव राय 'बिल्लू', सह-संयोजक श्रीमती छवि अग्रवाल और डॉ. शैलेंद्र कुमार सिंह तथा चंदौली के संयोजक श्री आनंद कुमार तिवारी (सोनू), सह-संयोजक डॉ. निशा सिंह, श्री नवीन कुमार एवं श्रीमती सारिका त्रिपाठी मनोनीत किए गए। संचालन डॉ. अशोक कुमार ज्योति तथा धन्यवाद ज्ञापन श्री सचिन कुमार सिंह ने किया। ध्येय श्लोक, ध्येय वाक्य एवं कल्याण मंत्र का पाठ श्री कश्यप कुमार एवं डॉ. निशा सिंह ने किया। इस संगोष्ठी में 25 से अधिक शिक्षकगण तथा शिक्षाविद् उपस्थित थे।

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