
भक्ति कवयित्रियाँ साहस के साथ पितृसत्ता का प्रतिरोध रचती हैं: सुभाष राय
शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित हुए सुभाष राय
काशीः "भक्ति कवयित्रियाँ साहस के साथ पितृसत्ता का प्रतिरोध रचती हैं," ये बातें शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित मुख्य अतिथि श्री सुभाष राय ने अपने व्याख्यान में कहीं। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत की स्त्री कवयित्रियाँ शिव और विष्णु की उपासक थीं। उस युग में स्त्रियों और शूद्रों को मंदिर जाने की मनाही थी। इस दमन के खिलाफ जब कोई उनके साथ नहीं आया, तब उन्होंने स्वयं ईश्वर को ढूँढने के लिए गीत गाये।
श्री राय ने कहा कि दक्षिण की इन संत कवयित्रियों में दीनता नहीं है। अक्का महादेवी कहती हैं, "तुम मुझसे प्रेम करते हो और मेरे पास नहीं आना चाहते, तो मैं तिलक लगाकर आऊँगी और लड़ मरूँगी।" वहीं अंडाल कहती हैं, "तुम मेरे पास क्यों नहीं आते? प्रेम नहीं करते तो आकर कहो।" यह अधिकार जताने वाली बात है, जो उत्तर भारत के साहित्य में प्रायः नहीं दिखती; यह विचारणीय विषय है। वे एक विराट अनुपस्थिति को आवाज लगा रही थीं। वे हृदय में ज्योति जलाती हैं, जो बुद्ध की 'अप्प दीपो भव' की अवधारणा की तरह है। दोनों को जीवन में अत्यंत यातना भोगनी पड़ी।
बसवेश्वर ने अक्का की सहायता से अनेक सामाजिक कार्य किए। उन्होंने शूद्रों और स्त्रियों को कई धार्मिक अधिकार दिए, जिससे शूद्र और स्त्रियाँ बसवेश्वर के आंदोलन से जुड़ गए। अक्का के साथ 60 स्त्रियाँ 'अनुभव मंडप' में रचनाएँ कर रही थीं, जिनमें 13 शूद्र थीं। अनुभव मंडप का नियम था कि बिना श्रम/काम किए भोजन किसी को नहीं मिलेगा और कमाई का संचय स्वयं के लिए नहीं होगा, बल्कि उसे दूसरों में बाँटना होगा। डॉ. एम. एम. कलबुर्गी ने इसे उत्पादन और वितरण का सिद्धांत कहा है, यानी आवश्यकतानुसार उपयोग के बाद शेष संपत्ति को समाज में बाँट देना।
श्री सुभाष राय ने अपने व्याख्यान में आगे कहा कि प्राचीन भारत में प्रतिभाशाली स्त्रियों के विचारों और साहस की कथाओं को दबा दिया गया। अंडाल के गीत तमिलनाडु में प्रतिबंधित हैं, केवल उनके विवाह गीतों को मान्यता मिलती है। इसका विवेचन करते हुए उन्होंने नांगली और कन्नगी के उदाहरण दिए। अक्का ने पति और स्वाधीनता के विकल्प में स्वाधीनता को चुना। इन स्त्रियों से स्वतंत्रता, स्वाधीनता और साहस की प्रेरणा मिलती है। अंडाल जब अपनी सखियों से मिलती हैं, तो उनकी वार्ताओं का मर्म होता है कि जब हम प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहना सीख लेंगे, तो प्रकृति सबको खुशहाल रखेगी। कृष्ण जीवन का उच्चतम लक्ष्य हैं; कृष्ण के व्यक्तित्व के महान गुणों को अपने भीतर समाहित करना ही उनसे सच्चा प्रेम और समर्पण है। इन स्त्रियों ने पितृसत्ता का अत्यंत साहस के साथ प्रतिरोध किया है।
सुभाष राय 'महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र', काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) एवं 'कबीर विवेक परिवार' द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यान में बोल रहे थे। यह कार्यक्रम "अंडाल और अक्का महादेवी: भक्ति का लोकवृत्त और स्त्री जीवन" विषय पर आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का आरंभ अतिथियों द्वारा महामना पंडित मदन मोहन मालवीय और प्रो. शुकदेव सिंह के चित्र पर पुष्पांजलि, दीप प्रज्वलन और बीएचयू कुलगीत गायन से हुआ।
कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य 'महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र' की डॉ. मीनाक्षी झा ने प्रस्तुत किया, जबकि 'कबीर विवेक परिवार' का परिचय और विषय की रूपरेखा हिंदी विभाग के प्रो. मनोज कुमार सिंह ने रखी।
महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र के समन्वयक प्रो. आशीष त्रिपाठी ने मुख्य अतिथि श्री सुभाष राय की दो प्रमुख पुस्तकों पर चर्चा करते हुए बताया कि 'पितृसत्ता और स्त्री रचना' को देखने का नजरिया श्री सुभाष राय जी की पुस्तकों का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने बताया कि इस सम्मान की चयन समिति (निर्णायक मंडल) में प्रो. काशीनाथ सिंह और श्री अशोक वाजपेयी शामिल थे।
कार्यक्रम के अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि भक्ति साहित्य ने परंपरा और सांस्कृतिक एकता को अक्षुण्ण बनाए रखा। भक्ति साहित्य के अध्ययन से हमें पता चलता है कि देश की सांस्कृतिक एकता का निर्माण कविताओं के माध्यम से हुआ है। उन्होंने कहा कि केवल वैज्ञानिक बुद्धि से कविता को ठीक-ठीक समझ पाना बहुत मुश्किल है। यहाँ तक कि आधुनिक कवि रवींद्रनाथ टैगोर की कविता को यदि केवल समाजशास्त्र, तर्क और वैज्ञानिकता से समझने का प्रयास किया जाए, तो उसका बहुलांश छूट जाता है; प्राचीन कविता तो इन सबसे ऊपर है। अलवार और नयनार संतों की कविताएँ यह सिद्ध करती हैं कि उत्तर और दक्षिण भारत अलग या परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि गहरे रूप से संबद्ध हैं। अंडाल के मन में वृंदावन है; उनके लिए गंगा और गोदावरी में कोई भेद नहीं है। यद्यपि उनकी रचनाएँ कम उपलब्ध हैं, किंतु उनके व्यक्तित्व की गाथाएँ अपार हैं, जो उनकी प्रामाणिकता को दर्शाती हैं। इन्होंने अपनी जाति, कुल और गोत्र की संकीर्ण सीमाओं का पूर्णतः अतिक्रमण कर दिया था।
कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रज्ञा पारमिता ने किया तथा सफल संचालन हिंदी विभाग की डॉ. किंगसन पटेल द्वारा किया गया।
इस अवसर पर सभागार में श्री बोधिसत्व (मुंबई), आभा बोधिसत्व (मुंबई), डॉ. सूर्यनारायण (प्रयागराज), श्रीमती भगवती सिंह, प्रो. सदानंद शाही, प्रो. वशिष्ठ अनूप, प्रो. श्रद्धा सिंह, डॉ. शशिकला त्रिपाठी, डॉ. प्रकाश उदय, डॉ. मुक्ता, डॉ. शशिकला पांडे, प्रो. के. एम. पांडे, प्रो. सुमन जैन, डॉ. घनश्याम, प्रो. नीरज खरे, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. अर्चना शर्मा, प्रो. अर्पिता चटर्जी, प्रो. विवेक सिंह, डॉ. प्रभात मिश्र, डॉ. प्रियंका सोनकर, प्रो. रविशंकर सोनकर, डॉ. सत्य प्रकाश सिंह, डॉ. प्रीति त्रिपाठी, डॉ. सत्य प्रकाश पाल के साथ ही अनेक शोधार्थी और सैकड़ों छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
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