गर्मी की छुट्टी का पर्यायवाची

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प्रेम पर कविता
मैंने कभी प्रेम पर कविता नही लिखी
जब भी मैने सोचा प्रेम के बारे में
कई रिश्तों से घिर गई मैं।
मुझे मेरी माँ याद आयी
अपने गोद मे बिठा कर मुझे
उसका खाना बनाना याद आया,
बुखार में ठंडी पट्टी मेरे माथे पर रखती
वो परेशान चेहरा याद आया
ये एहसास प्रेम का ही तो है।
फिर याद आयी वो एक पुरानी तस्वीर
अपनी हमउम्र बहन के साथ की
जिसके बिना बचपन की याद
बिन चाँद तारो के आसमान सा है,
गर्मी की छुट्टी का पर्यायवाची
वही तो थी मेरे लिए,
एक दूसरे के लिए लिखी
वो अनगिनत चिट्ठियां याद आयी
ये एहसास प्रेम का ही तो है।
अगला चेहरा उस दोस्त का
जो लाती थी टिफिन में
मेरी पसंद के आलू की भुजिया
और वो एक कौर उसके हाथ का
स्वाद जो आज भी जेहन में है मेरे
ये एहसास प्रेम का ही तो है।
प्रेम की कमी तो कभी कही नही थी
घर से दूर जब निकली थी मैं
कई सारे डर, दुविधा और उम्मीद के साथ
कितने ही अनजान चेहरों से टकरायी,
विषमताओं से घिरे थे ये रिश्ते
पर मुस्कुराते चेहरे और आगे बढ़ते हाथों ने
आपस की समानता को बना कर नाभिक
मिलाया था हाथ गर्मजोसी से
असीम संभावनाओं का स्वागत करता वो एहसास
प्रेम नही तो क्या है!
इतने सारे रिश्तों के बाद भी
मेरी खुशनसीबी ही तो है
जो मैं जा मिली कुछ ऐसे लोगो से
जिन्होंने किया प्यार
न सिर्फ मुझसे,
न ही चंद और अपने जैसो से
जिनसे वापसी में मिल सके उन्हें वही लगाव।
इन लोगो ने तो चाहा प्रेम हरेक के लिए
बिना किसी शर्त, बिना किसी स्वार्थ के
इन्होंने किया प्रेम
तमाम मेहनत करने वालो से,
हर उस जीव से
जो इस धरती को और सुंदर बना रहे।
मैंने भी इन्ही से सीखा प्रेम करना
हर उस इंसान से
जो निस्वार्थ और ईमानदारी से जुटे है
बनाने एक ऐसी दुनिया
जो हर किसी के रहने लायक हो
जहाँ नफरत का नामो निशां न बचे
जहां कोई ‘आसिफ’ पीटा न जाय
पानी की एक घूंट के लिए,
जहाँ नाम के बाद सरनेम जानने में
किसी की रुचि न बचे,
जहां हर इंसान, इंसान की तरह जी पाय
इज्जत और समानता के साथ।
यही नफरत विहीन दुनिया पहुँचा देगी
प्रेम के सही मायने सब तक
और तब मुझे नही याद करने होंगे
प्रेम के इन चंद एहसासों को
ताकि मैं लिख सकू
प्रेम पर एक कविता।
– वंदना भगत
28/03/21

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