कविता- आत्महत्या के विरुद्ध

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सूरज अपनी रोशनी समेट रहा था,

चांद आसमान को फाड़ कर बाहर निकल रहा था

आसमान पहले से भी ज्यादा गहराता जा रहा था

धुंध बेबजह घरो से निकल कर भाग रही थी

कुत्ते आज भौंकने की जगह दहाड़ रहे थे

वो दफ़्तर से निकला आदमी

नींद की गोली की जगह

चूहें मारने की दवा

यह कह कर ख़रीद रहा था

कि पत्नी आजकल

चूहों से ज्यादा परेशान रहती है!

 

औरत दिमाग और जुबान पर ताला लगाकर

हाथों को काम पर गिरवी रख चुकी थी!

 

बच्चे पता नहीं क्यों आज

कॉपी के सबसे आखिरी पन्ने पर

पापा को मम्मी को पीटते हुए का

चित्र बना रहे थे?

 

बच्चें सुबह स्कूल जाने की बजाय रो रहे थे,

घर के बाहर सफ़ेद रंग का शामियाना तन चुका था

वह दफ्तर वाला आदमी कह रहा था

मैं रात को जल्दी सो गया था

और वो महीने के आखिरी

का कैलेंडर बदल रही थीं!

और डॉक्टर की रिपोर्ट बोल रही थीं कि

नींद की गोली की जगह

चूहें मारने की दवाई खाई हैं

इस औरत ने!

 

लेक़िन वो तो,

आत्महत्या के विरुद्ध थीं?

 

कविता- वो उतना ही पढ़ना जानती थी?

 

वो उतना ही पढ़ना जानती थी?

जितना अपना नाम लिख सके

स्कूल उसको मजदूरो के काम

करने की जगह लगती थी!

जहां वे माचिस की डिब्बियों

की तरह बनाते थे कमरे,

तीलियों से उतनी ही बड़ी खिड़कियां

जितनी जहां से कोई

जरुरत से ज्यादा साँस न ले सके!

पता नहीं क्यों?

एक खाली जगह और छोड़ी गयी थी!

जिसका कोई उद्देश्य नहीं,

इसलिए उसका उपयोग

हम अंदर बहार जाने

के लिए कर लेते है,

वो माचिस की डिब्बियों के

ऊपर और डिब्बिया नहीं बनाते

क्योंकि उन्हें लगता था

कही वे सूरज तक न पहुँच जाये?

इसी लिए नहीं बनाते उन डिब्बियो

के सहारे सीढ़ियां,

लेकिन नज़र से बचने के लिए

छोटा टीका ही काफी होता है?

फिर भी,

दीवारों पर पोता जाता था

काला आयत

जिस पर अलग-अलग बौने

लकड़ी को काटने की जगह

समय को काटने के लिए

सफेदी पोतते थे

और उतना ही पढ़ाते रहे

जितना वो अपना नाम लिख सके?

 

कविता- कलाइयों पर ज़ोर देकर ?

 

लोग

इतने सारे लोग

जैसे लगा हो

लोगो का बाजार

जहां ख़रीदे और बेचे

जाते है लोग

कुछ बेबस,

कुछ लाचार

लेकिन सब है

हिंसक,

 

जो चीखना चाहते है

ज़ोर से, लेकिन

भींच लेते है अपनी

मुट्ठियां कलाइयों पर ज़ोर देकर

ताकि कोई

देख न सके

बस मेहसूस कर सके

हिंसा को

जो चल रही है

लोगो की

लोगो के बीच, में

लोगो से?

 

एक हिंसा तय है

लोगो के बीच

जो खत्म कर रही है

किसी तंत्र को

जो इन्ही हिंसक लोगो

ने बनाया था

हिंसा,

रोकने के लिए?

 

लेकिन सब ने,

सीख लिया है

कलाइयों पर ज़ोर देकर

मुट्ठियां भीचना,

इन्होने भी सीख लिया

सभ्य लोगो की तरह

कड़वा बोलना,

गन्दा देखना और

असभ्य सुनना!

 

यह समझते है

खुद को सभ्य

कलाइयों पर घड़ी,

गले में टाई,

पैरों में मोज़े,

और

हाथ में जहरीली

तलवार रखने से

 

मैं भी रोज़ जाता हूँ

लोगो के बाजार,

तुम भी जाया करो

ऐसा ही सभ्य बनाने

ताकि तुम भी

भींच सको अपनी मुट्ठी

कलाइयों पर ज़ोर देकर?

कविता- मानव सभ्यताएं

 

उसकी आँखे खुली थी या बंद

ये कह पाना मुश्किल सा ही था

क्योकि उसकी आँखो के बाहर

बड़ी बड़ी तख्तियां लटक रही थी

जिस पर लिखा था मानव सभ्यताएं

उसकी नाक के नथुने इतने बड़े थे

की पूरी पृथ्वी समां जाये

उसका मुँह ऐसा था

जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सभ्यताओं

को यही से निगला गया हो

आप उसकी गर्दन को लम्बा कहेंगे

तो आपको नर्क भेजा जायेगा

और छोटा कहेंगे तो भी

आप उसके कंधे देख चढ़

कर कुलांचे भरना चाहेंगे

पर वो जगह

मानव सभ्यता के अनुकूल नहीं

आप उसकी छाती देखकर

खेत बनाना चाहेंगे

पर वहाँ पर्वतों के अलावा कुछ नहीं,

 

आप उसके पेट पर बनी

नाभि को देखकर नाभि को

ब्रह्माण्ड का केंद्र मान लेंगे

आप उसकी कमर देखकर

उसके चारो ओर

पक्की सड़क बनाना चाहेंगे

उसकी जाँघे आपको

सभी नदियों का

उदगम स्थल लगेगी

उसकी पिंडलिया आपको

हवा से बाते करती झरनों सी लगेगी

उसके पैर आपको गाँधी की

अहिंसा से भी ज्यादा

मुलायम महसूस होंगे

जिसके नीचे दफ़न है

न जाने कितनी सारी

मरी और सड़ी मानव सभ्यताएं!

 

कविता- वो बच्चा ?

 

लिए हाथ में हैं खड़ा

कटोरा हर चौराहे पर

वो बच्चा !

छूता हर लावारिस चीज को

ताकि खाने को मिल जाए

कुछ कच्चा-पक्का !

तपते बदन के

कूल्हो पर चढ़ा रखा

हैं, फटा पुराना कच्छा !

छूता पैर सभी के ताकि

कोई दे, दे एक आध

आठ आने का सिक्का!

अगर उसकी ये हालत

ना होती तो क्या वह भी ?

होता देश का हिस्सा !

अटल,

अभिमानी,

और सच्चा !

अगर कभी कोई

दे देता उसको

फूटी कौडी का सिक्का,

छीन लिया जाता

हैं, उससे उसकी

मेहनत का वो सिक्का !

फिर अगले दिन ना

जाने मिल जाए कहाँ

लिए हाथ में खड़ा,

कटोरा किसी और

चौराहे पर

वो बच्चा ?

 

कविता- काली औरतें

 

काली औरतें

जब बात करती है

तो आसमान भी

काला हो जाता है

बहुत तेज चमकने

वाला सूरज छोटे छोटे

टुकड़ों में टूट कर

बिखर जाता है!

 

काली औरतें

सोचती है नये नये

मनसूबे और काट

देती है अपने ही

तर्कों से!

 

काली औरतें

बाते करती है

अपने गोरे प्रेमियो

की जो च-रस की

जगह श्रृंगार रस का

सेवन उचित समझते है!

 

काली औरतौं

के लिए आभूषण

कोई सुन्दरता नहीं

वो मन और तन

का संवाद है!

 

काली औरतें

लगाती है काज़ल,नाख़ूनी

और महावर

अपने गोरे प्रेमियो के

पसंद की क्योकि?

काली औरतौं

की मासंल भुजाएँ

और सुडौ़ल पिड़लियाँ

खूब भाती हैं उनके

गोरे प्रेमियों को!

 

काली औरतें

झुकाये नज़रे

लेट जाती है

समर्पण में अपने

गोरे प्रेमियों के लिए

वो लिपटकर

काली औरतौं

के सपाट पेट पर

बने गहरे कुए से

पानी पी लेता है!

और क्यों कहता है

निर्दयी नरनाशी

काली औरतें?

 

कविता- मतदान

 

चुनाव आते है

नौकरशाही से लबरेज़

वो डी. एम. हर बार आता है

और

जरुरी सूचना बता कर चला जाता है

मतदान देना आपका अधिकार है

इस बार अधिक से अधिक मतदान करे

और इस उत्सव में शामिल हो

पर मतदान के बाद उस डी. एम.

को अपने प्रमोशन की चिंता सताती है

वो भूल जाता है और

कभी बताने नहीं आता

कि मतदान से अधिक जरुरी है

बच्चो को स्कूल भेजना!

 

कविता- मॉब लिंचिंग में मारी गयी पहली औरत

वो तो बस यू ही खड़ी थी

वो न हिन्दू थी न मुसलमान

और न ही किसी और समाज से

वो तो बस एक औरत थी

जो खड़ी थी

वो न तो कुछ चुरा कर भाग रही थी

और न ही कुछ छिपा कर

वो तो बस अपने सपनों को

जगा कर भाग रही थी

वो न तो अपने पसंद के

मर्द के साथ भाग रही थी

न ही उसके पास कोई गौ माँस था

या उसके जैसा कुछ और

उसके जिस्म पर भी

आम बोल चाल वाली

औरतो की तरह ही कपड़े थे

न तो वो सबरीमाला में

घुसने की कोशिश कर रही थी

न ही बुर्क़ा पहनने से इंकार

वो तो बस यू ही खड़ी थी

फिर भी भीड़ ने

मॉब लिंचिंग में उसे मार दिया

 

एक भीड़ का झुण्ड

रैला बना आ रहा था

जिसमे टोपी और चोटी

वाले दोनों थे

और चीख कर बोल रहे थे

ऐसा नहीं होने देंगे

वहाँ कई सारे लोग

खड़े होकर देख रहे थे

कुछ ने अपनी आत्माएं

अपनी जेब में रख ली

तो कुछ ने अपनी आत्माएं

सुनार को गिरवी रख दी

 

प्रशासन ने पूछा

तुम अपनी आत्मा के साथ

खुले मे घूम रहे थे

साहब मेरी आत्मा

तो मेरी जेब में ही थी

पर भीड़ ने बताया

उस वक़्त तुम्हारी आत्मा

तुम्हारी जेब से झाँक रही थी

क्या तुम?

उस औरत को जानते थे

नहीं साहब

तुमने किसी को कुछ बोलते

देखा या सुना

नहीं साहब

बस महसूस किया

पर पता नहीं क्यों साहब

जब उस औरत को याद करता हूँ

तो वो कभी माँ जैसी दिखती है

तो कभी पत्नी जैसी

कभी बहन तो कभी बेटी जैसी

पर मैं उसे नहीं जानता

वो तो बस यू ही खड़ी थी

 

वो महसूस करा रहे थे

ऐसा नहीं होने देंगे

ऐसा नहीं होने देंगे

और मैं उस भीड़ के झुण्ड

में शामिल हो गया

अच्छा ठीक है

हम लोकतंत्र में रहते है

सख्त कार्यवाही होगी

उस खड़ी औरत के खिलाफ

क्या कोई बता सकता है

क्या वो किसी कानून या हिंसा

के ख़िलाफ खड़ी थी

नहीं साहब

पता नहीं

ठीक है तो रिपोर्ट में लिखो

वो औरत खड़ी थी

अपने पसंद के मुसलमान मर्द

के इंतज़ार में गौ मांस लिए

और भाग जाना चाहती थी

निकाह करने के लिए

किसी अदृश्य शक्ति ने

आकर उसे मार दिया

 

नहीं साहब

ऐसा नहीं था

वो भीड़ थी

सभी के चेहरों पर मुखोटे थे

सभी के मुखौटो से खून टपक रह था

और बोल रहे थे

ऐसा नहीं होने देंगे

क्या किसी ने उनके हाथों में

तेज धारदार हथियार देखा

नहीं साहब

लेकिन सभी की जुबान

किसी तेज धारदार हथियार से कम न थी

और वो बोल रहे थे

ऐसा नहीं होने देंगे

 

नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं था

तुम्हारी आत्मा तो

उस वक़्त तुम्हारी जेब में थी

साहब आदमी तो बहुत मर गए

कही ऐसा तो नहीं साहब

वो मॉब लिंचिंग में मारी गयी

पहली औरत हो!

कविता- रंडी

 

ईश्वर ने तुम्हे

प्रकृति की नज़र से

बचाने के लिए

दिया ठोड़ी पर काले

तिल का डिठौना,

और दो काली आँखें

तुम्हारे प्रेमी ने

समाज की नज़र से

तुम्हे बचाने के लिए

दी काली गाली-

रंडी थी साली

 

रंडी चौराहे पर लगी

कोई साफ़ सुथरी मूरत नहीं

और न ही

किसी कोठे पर लेटी

तुम्हारे फारिक होने के इंतज़ार में,

 

रंडी कोई भी हो सकती है

रंडी तुम्हारी माँ भी हो सकती है

तुम्हारे बाप की गाली में

तुम्हारी बहन भी रंडी हो सकती है

प्रेमी के साथ बिस्तर में होने के बाद

जैसे तुम्हारी प्रेमिका हो गयी थी

तुम्हारे साथ के बाद

रंडी तुम्हारी पत्नी भी हो सकती है

एक दिन खाने में नमक ज्यादा होने पर

रंडी तुम्हारी बेटी भी हो सकती है?

जैसे सारी रंडिया होती आयी है।

 

कविता- पागल लड़की

 

तुम चीजों को

ढूंढ़ने के लिए रोशनी का

इस्तेमाल करती हो

और वो गाँव की पागल लड़की

चिट्ठी का

वो लिपती है

नीले आसमान को

और बिछा लेती है

धूप को जमीन पर

 

वो अक्सर चाँद को सजा देती है

रात भर जागने की

वो बनावटी मुस्कान लिए,

नाचती है

जब धानुक बजा रहे होते है मृदंग

 

वो निकालती है कुतिया का दूध

इतनी शांति से की बुद्ध ना जग जाएं

और पिला देती है

नींद में सोई मछलियों को

उसने पिंजरे में कैद कर रखे है

कई शेर जो चूहों से डरते हैं

 

वो समझती है

नदी को किसी वैश्या के आंसू

इसलिए वह बिना बालों के धुले

अपनी बकरी को डालती है

मांस के टुकड़े

और मेरी कविता सुनाती है

जिसमें मैंने औरत की देह से

उसके हाथ काट कर

अलग नहीं किये थे!

 

 

कविता- कोख

 

मुझे उगने दो

उस कोख में

जहाँ लाल की

इच्छा करते है!

 

मुझ जैसी के

हो जाने पर

उस कोख को

गाली देते है!

 

मुझे दोने में

प्यार परोसना

उतने में ही

जी लूंगी माँ!

 

एक बार आने

दो मुझको

मैं तेरा मान

बढ़ाऊगी!

 

जीने की उम्मीद

नहीं फिर भी

कुछ कर के

दिखलाऊंगी!

 

बढ़ चल कर

दिखलाऊंगी

उस पथ पर

जिस पर लाल

चलने से डरते है!

 

मुझे उगने दो

उस कोख में

जहाँ लाल की

इच्छा करते है!

 

 

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