युवाओं पर अपने देश की संपदा,धन, संस्कृति और सभ्यता को बचाये रखने की जिम्मेदारी

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दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामलाल महाविद्यालय (सांध्य) में राष्ट्रीय सेवा योजना एवं आई,क्यू, ए,सी के संयुक्त तत्त्वावधान में “हिंदी साहित्य में राष्ट्रीयता के स्वर और युवा मन” विषय पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया।इस आयोजन के मुख्य वक्ता हिंदी विभाग,दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो.अनिल राय थे।
कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर हेमंत कुकरेती के सान्निध्य में कार्यक्रम आगे बढ़ा।कार्यक्रम के आरंभ में आई,क्यू, ए,सी के समन्वयक डाॅ. प्रमोद कुमार द्विवेदी ने मुख्य वक्ता के साथ आयोजन में उपस्थित सभी लोगों का स्वागत करते हुए कहा कि यह विषय बहुत व्यापक है,जिससे आज के समय में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।विषय का प्रस्ताव कॉलेज के हिंदी विभाग के वरिष्ठ अध्यापक प्रो.अनिल राय ने रखते हुए कहा कि हमें राष्टीयता को जानने से पहले राज्य,राष्ट्र और राष्ट्रवाद को समझना जरूरी है।उन्होंने वैदिक कालीन समय से लेकर आधुनिककाल में व्याप्त राष्ट्रीयता के स्वर को अनेक साहित्यकारों के माध्यम से स्पष्ट किया।
मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय,हिंदी विभाग के प्रो.अनिल राय ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद में अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि राष्ट्रीयता का स्वर हमें आदिकालीन समय से मिलता है,लेकिन इस समय की राष्ट्रीयता को संकुचित राष्ट्रीयता के रूप में लक्षित किया जा सकता है।राष्ट्रीयता के नये स्वर का सूत्रपात भक्ति आंदोलन से दिखाई देने लगता है।जिसका असर भूषण जैसे रीतिकालीन कवियों पर भी पड़ा।आधुनिककाल में राष्ट्रीयता के महत्व को भारतेंदु युग से देखा जा सकता है।इस युग के लेखकों का समूचा साहित्यिक परिदृश्य देश के गौरव के महत्व को रेखांकित करते हुए रचा गया है।मुख्य वक्ता अनिल राय नालंदा,तक्षशिला और सारनाथ जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा- प्रतिष्ठानों के नष्ट होने को लेकर चिंता ज़ाहिर करते हुए आगे कहते हैं कि युवाओं पर अपने देश की संपदा,धन,संस्कृति और सभ्यता को बचाये रखने की जिम्मेदारी है।किसी भी राष्ट्र का निर्माण वहाँ की सोच,संस्कृति और कर्म के समन्वय से होता है।इस व्याख्यान में  उन्होंने आदिकाल, भक्तिकाल,रीतिकाल और आधुनिककाल में भारतेंदु युग,द्विवेदी युग,छायावाद आदि के आलोक में राष्ट्रीयता के समूचे परिदृश्य को सबके सामने रखा। सरदार पूर्ण सिंह,प्रसाद,पंत,महादेवी वर्मा, निराला,दिनकर,सुभद्रा कुमारी चौहान,प्रेमचंद,प्रदीप नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ आदि के साहित्यिक योगदान के माध्यम से हिंदी साहित्य में राष्ट्रीयता स्वर को प्रमुखता से व्यंजित किया।अंत में युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं की भूमिका से ही किसी भी देश का विकास जुड़ा है।न्याय,समता,समानता,एकता,अनुशासन और कर्म की भावना से युवाओं को प्रेरणा लेते हुए राष्ट्र के निर्माण में महती भूमिका निभानी चाहिए।
राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई के कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अमित सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन देने के साथ इस विषय के महत्व पर बोलते हुए  हिंदी साहित्य के सभी कालों को उद्धरित करके, हिंदी साहित्य में राष्ट्रीयता के स्वर को प्रसारित करने वाले कारणों को रेखांकित किया।उन्होंने सूर्यमल्ल-वीरसतसई और अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने वाले संत कवि गंगादास के माध्यम से वीरता के भाव को राष्ट्रीयता से स्वर से जोड़ते हुए अनेक उदाहरणों को सामने रखा।
कार्यक्रम का संचालन डाॅ. सारिका त्यागी ने किया।इस आयोजन में दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों से आये अध्यापकों और शोधार्थियों के साथ श्यामलाल कॉलेज (सांध्य) के अनेक विभागों के शिक्षक,कर्मचारी और बड़ी संख्या में छात्रों की गरिमामय उपस्थिति रही।

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