‘यथार्थ’ पत्रिका का संपादकीयः सरकार जमीनों का राष्ट्रीयकरण करे, गरिमायुक्त जीवन की गारंटी करने योग्य फसलों की कीमत दे

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पिछले दो-तीन दिनों के घटनाक्रम बता रहे हैं कि एसकेएम के अंदर फूट पड़ गयी है, खासकर न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की सबसे अहम मांग को सरकार से बिना मनवाए ही आंदोलन को वापस ले लेने की एसकेएम की मंशा एवं सहमति के कारण। कल जो घटनाक्रमों की गहमा-गहमी रही उससे यह स्पष्ट हो गया है कि इस मुद्दे पर सरकार नहीं एसकेएम झुकने को राजी हो गया है। जबकि एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग ही वह मांग है जिसके आकर्षण में बंधे तमाम किसानों का इस आंदोलन का भरपूर समर्थन मिला । पुराने जारी एमएसपी से अलग इस नये एमएसपी मांग से देश के सभी, गरीब से गरीब किसानों तक को या समझ में आया कि उनकी फसल भी धनी किसानों की तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बिकेगी और वे समर्थन में एकजुट हुए। हालांकि यह मांग मान लिए जाने से भी गरीब किसानों की जिंदगी में सुधार नहीं होता, लेकिन एसकेएम के इस मांग के प्रति आज के रवैये को इस परिप्रेक्ष्य में क्या माना जायेगा, क्या कहा जायेगा?? सरकार की किसी बात से यह नहीं माना जा सकता है कि वह एमएसपी पर कानून बनाने की मांग से सिद्धांत: सहमत हो चुकी है। उसने सिर्फ यह माना है कि इस मुद्दे पर बनी कमिटी में एसकेएम के प्रतिनिधि भी शामिल किये जायेंगे। इसलिये, यह स्पष्ट होना चाहिए कि एमएसपी पर कानून बनाने की मांग पर सरकार ने किसी तरह की मुंहजबानी प्रतिबद्धता या स्वीकारोक्ति तक जाहिर नहीं की है। इसका मतलब है, किसान आंदोलन का नेतृत्व, यानी एसकेएम एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग को कमिटी के हवाले कर इसे व्यवहारतः छोड़ चुका है। ऐसे में फूट पड़ना लाजिमी है और यूपी व अन्य राज्यों से आ रही प्रतिक्रियाओं के मद्देनजर कहा जा सकता है कि इसे पीठ में छुरा भोंकने के समान माना जायेगा। कल की पांच मेम्बरी कमिटी की प्रेस वार्ता से भी साफ हो चुका है कि एसकेएम सरकार के कमिटी बनाने के प्रस्ताव के पीछे की मूल भावना से सहमति में है और इसीलिए उसने सरकार से कानून बनाने की घोषणा करने की मांग पर जोर देने के बदले महज़ इस पर मामूली आपत्ति दर्ज करना मुनासिब समझा कि सरकार इस कमिटी को इस मांग के विरोधी लोगों (किसान संगठनों के प्रतिनिधियों) से नहीं भरे, या उन्हें इसमें जगह नहीं दे। कल की गर्जना आज अचानक एक दीन-हीन मिमियाहट में बदल चुकी है, जिसे पांच मेंम्बरी कमिटी के लोग बड़ी मासूमियत से “कंस्ट्रक्टिव डिसकशन” कह रहे हैं!

इसके अलावे, एसकेएम बिजली संशोधन अधिनियम को वापस लेने की मांग पर भी पीछे हट चुका है और बीच के किसी रास्ते की तलाश में है।

इसी तरह, अजय मिश्र टेनी की मंत्री पद से बर्खास्तगी और उसकी गिरफ्तारी की मांग से भी कानूनी विसंगतियों के नाम पर वह पीछे हट चुका है।

यही, नहीं कल पहली बार एसकेएम के पांच मेंम्बरी कमिटी के नेताओं के द्वारा प्रेस वार्ता में कहीं बातों (जिसमें मिमियाहट मौजूद थी) और फिर चंद घंटे बाद टीवी स्टूडियो में कही बातों (जिसमें एक बार फिर से गर्जना का प्रदर्शन था) में अंतर दिखा, खासकर युद्धवीर सिंह की बातों में।

जाहिर है, यह किसान आंदोलन में फूट के बीज सरकार रोपने में सफल होती दिख रही है। यही नहीं, हम यह भी देख रहे हैं कि एसकेएम के नेता बात-बात में यह वाक्यांश दोहराते हैं कि “सरकार ये करे, वो करे, ताकि हम भी अब घर जा सकें”, जिसका असर निस्संदेह आम किसानों के बीच “अब पैक-अप करना है” जैसे संदेश के रूप पहुंच रहा होगा।

आज सरकारी संदेश दोबारा आने के बाद आज फिर से एसकेएम और पांच मेंम्बरी कमिटी की बैठक है। शायद यह अंतिम मौका है कि एसकेएम अपनी इस होने वाली ऐतिहासिक गलती को सुधार ले, अन्यथा इसके बाद, यानी आंदोलन की वापसी के बाद यह मौका हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। आंदोलन में पीछे हटना और आगे बढ़ना लगा रहता है, लेकिन इस तरह से पीछे हटना, जब कि परिस्थितियां आंदोलन के माकूल हों, निस्संदेह इस ऐतिहासिक आंदोलन के साथ “ठीक ऐन मौके” पर अन्याय करने जैसा है।

जहां यह सत्य है कि एसकेएम नेतृत्व ने कृषि कानूनों की वापसी कराकर इसने एक महान ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, लेकिन वहीं यह भी सत्य है कि अंत में एसकेएम जिस तरह के ढुलमुलपन और जैसी रीढ़विहीनता का परिचय दे रहा है उससे इस महान जीत का महत्व भी धूमिल होगा और इस महान जीत के स्वाद को कड़वा कर बुरी तरह बिगाड़ देगा। इसके भरपूर आसार नजर आ रहे हैं।

साथियों, जैसा कि हम लगातार कहते आ रहे थे और आज भी कह रहे हैं, एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग पूंजीवादी राज्य के लिए सबसे कठिन मांग थी और है, क्योंकि यह घुमाफिराकर राज्य से सभी किसानों की सारी फसलों की खरीद गारंटी की मांग बन जाती है जो किसी भी पूंजीवादी राज्य के लिये स्वीकार करना असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन अवश्य है। हालांकि पूंजीवादी व्यवस्था के तहत इस मांग की पूर्ति के बाद भी गरीब किसानों की माली हालत में कुछ भी सुधार नहीं होता, लेकिन फिर भी पूंजीवाद के लिए इस मांग को पूरा करना वास्तव में असंभव है, भले एक युद्धनीति के तहत पीछे हटते हुए सरकार को इसे आंदोलन के अतिशय दवाब में मानना भी पड़ सकता है। लेकिन तब भी, इस मांग के माने जाने की संभावना एकमात्र सरकार व पूंजीवादी राज्य पर मंडराते मृत्यु-भय के कारण ही पैदा हो सकती है। और ठीक वही हुआ। साल भर चले आंदोलन ने पूंजीवादी राज व फासिस्ट सरकार को उस शिखर बिंदु पर पहुंचा भी दिया जहां उसे अपने अस्तित्व पर मृत्यु का संकट साफ-साफ मंडराता दिखा और उसने आत्मसमर्पण करना शुरू किया। लेकिन यहां आकर जब दुगनी ताकत से बोलने की जरूरत थी, तो एसकेएम की भाषा और बॉडी लैंग्वेज दोनों बदल गयी। यह काफी आक्रोश पैदा करने वाली बात ही है कि यहां आकर एसकेएम स्वयं अपनी निपट अक्षमता यह कहते हुए दिखा रहा है कि “हम जानते हैं कि किसी भी आंदोलन में सारी मांगें नहीं मानी जाती हैं।” कैसी मासूमियत दिखती है इस बयान में! भला इस बयान पर मोदी सरकार क्यों नहीं न्योछावर हो जायेगी!! एक ऐसे अहम और निर्णायक मोड़ पर, जबकि शक्ति संतुलन आंदोलन के पक्ष में है, यह आम सत्य, कि ‘किसी भी आंदोलन में सारी मांगें नहीं मानी जाती हैं’, बघारने से ज्यादा कोई और बुरी बात नहीं हो सकती है

ऐसी मासूम बयानबाजी इसलिये भी की जा रही है ताकि आम किसानों को मूर्ख बनाया जा सके और एसकेएम के द्वारा की जा रही यू-टर्न के समर्थन में उन्हें बरगलाया जा सके। देखना है आम किसान इस पर किस तरह से रिएक्ट करते हैं!
आम किसानों को आज खुलकर अपनी बात बोलनी चाहिए ताकि एसकेएम तमाम फसलों की ख़रीद गारंटी की मांग से पीछे न हटे।

जहां तक अगली लड़ाई की, या इसी लड़ाई के किसी दूसरे संस्करण की बात है, तो निस्संदेह और खासकर गरीब मेहनतकश किसानों को साफ-साफ यह मांग रखनी चाहिये कि सरकार जमीनों का राष्ट्रीयकरण करे, श्रम करने वाले किसानों के बीच जमीनों का पुनः वितरण करे, साधन व संसाधन मुहैया करे, उसके तमाम फसलों की खरीद गारंटी करे और गरिमायुक्त आर्थिक तथा सामाजिक तौर पर गरिमायुक्त जीवन की गारंटी करने योग्य फसलों की कीमत दे।

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