आज़ादी के बाद के भारत का आइना है परसाई का लेखन

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— विनीत तिवारी
हरिशंकर परसाई को आमतौर पर हिंदीभाषी लोग एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में जानते हैं लेकिन वे सिर्फ व्यंग्यकार ही नहीं एक बड़े लेखक और दार्शनिक भी थे। अपने आसपास के समाज और देश-दुनिया में घट रहीं सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं पर उनकी पैनी नज़र हुआ करती थी और वे सहज सामान्य भाषा में व्यंग्यात्मक अंदाज़ में अपनी टिप्पणी इन घटनाओं पर किया करते थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि जैसे आज़ादी के पहले के भारतीय समाज को जानने के लिए प्रेमचंद को पढ़ना ज़रूरी है, वैसे ही आज़ादी के बाद हिंदी समाज को और उसकी चेतना के बदलते स्तर को जानने के लिए परसाई को पढ़ना नितांत आवश्यक है।
उनका जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्यप्रदेश के जमानी के होशंगाबाद में हुआ था। लेकिन उन्होंने अपनी ज़िंदगी का अधिकांश भाग जबलपुर में ही काटा। जबलपुर में ही वे अपने ज़माने के हिंदी के यशस्वी कवि मुक्तिबोध के संपर्क में भी आये और साथ ही जबलपुर में आर्डिनेंस और व्हीकल्स फैक्टरियों में काम करने वाले श्रमिकों के संघर्षों में भी भागीदार हुए। उस वक़्त ‘देशबंधु’ और ‘नईदुनिया’ समूचे हिंदी क्षेत्र के बड़े अखबार माने जाते थे और इनकी पठनीयता भी काफी थी। इन अखबारों में परसाई जी के अनेक वर्षों तक कभी दैनिक तो कभी साप्ताहिक स्तम्भ छपते रहे। इन स्तम्भों में दुनिया के तमाम विषयों पर उनका लेखन साधारण-सहज भाषा में होता था। यह लेखन एक तरह से युवाओं और बुजुर्गों, महिलाओं और पुरुषों को एक नयी प्रगतिशील दृष्टि देता था और बनी – बनाई रूढ़िगत सोच पर प्रहार करता था, चाहे वह धर्म हो, सामाजिक रीति-रिवाज़ हों या जाति व्यवस्था हो। अंतरराष्ट्रीय राजनीति से लेकर देश और मोहल्ले की राजनीति और सामान्य मनुष्यों के ब्यवहार और उसके छद्म को उनका लेखन तार-तार कर देता है।
प्रेमचंद अपने आपको कलम का मज़दूर कहते थे। वे जब तक लिख नहीं लेते थे रोज़ तब तक उनके पेट का इंतज़ाम नहीं होता था। परसाई ने भी प्रतिबद्ध लेखन को ही अपने जीवन यापन का जरिया बनाया। लेकिन प्रेमचंद और परसाई, दोनों ने ही लेखन से पैसे कमाने के फेर में अपनी वैचारिक ईमानदारी को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया। उनके निशाने पर भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता और गाँधी – नेहरू तक की नीतियाँ भी रहीं। कोंग्रेस हो या उस वक़्त का जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, चाहे गाँधी हों या नेहरू, इंदिरा गाँधी हों या मोरारजी देसाई या जयप्रकाश, किसी भी धर्म के धर्मग्रन्थ हों या धर्मगुरू, परसाई ने किसी को भी नहीं बख्शा। विचारधारा के स्तर पर उन्होंने अपना बौद्धिक स्त्रोत मार्क्सवाद और वैज्ञानिक समाजवाद को बनाया। इन औजारों की वजह से वे अपने वर्तमान, अतीत और आगामी समय का विश्लेषण कर सके। आज बहुत सारे लोग परसाई के लेखन को तो स्वीकार करते हैं लेकिन परसाई की तरह उनके वैचारिक और जीवन मूल्यों को अलग रखकर देखते हैं। जबकि यदि परसाई के लेखन से राजनीतिक और वैचारिक समझ निकाल दी जाये तो परसाई के लेखन को बेजान कर देने जैसा होगा। या कहिये कि किसी दार्शनिक निबंध को चुटकुले में बदलने जैसा होगा।
परसाई के लेखन की एक खासियत तो यही है कि वह ज्ञान और विज्ञान की, या सही और गलत की बात करने के लिए साधारण बातचीत की भाषा चुनते हैं। वे कहीं से मोटे – मोटे उद्धरण या भारी-भरकम शब्दों का पहाड़ नहीं खड़ा करते और लोगों की चेतना पर जमी हुई जंग की मोटी परत को अपनी साधारण भाषा के व्यंग्य के डंडे से झाड़ देते हैं। परसाई के व्यंग्य पढ़कर पाठक तिलमिलाता भी है लेकिन उनके तर्क के आगे निरुत्तर होकर आख़िर वह मान भी जाता है। तो एक तरह से परसाई के व्यंग्य की कड़वी गोली खाकर ऐसे पाठकों का बुखार ठीक हो जाता है जिनके दिमागों पर आडम्बर और अंध श्रद्धा का पर्दा पड़ा रहता है।
कुछ बार ऐसा भी हुआ है जब परसाई के ऐसे लेखन से लोगों का विवेक जागृत होता देख कुछ संगठनों को लगा कि ऐसे तो हमारी दूकान ही बंद हो जाएगी जो जाति और धर्म के आधार पर संगठन चला रहे थे। उनमें से कुछ ने एकाध बार परसाई जी पर हमला भी किया लेकिन परसाई जिस प्रगतिशील परंपरा के लेखक थे, वहाँ लेखन भय से जीतकर ही किया जाता है। आज जब वरवर राव, सुधा भरद्वाज, आनंद तेलतुम्डे, गौतम नवलखा, शोमा सेन हैनी बाबू, जी. एन. साईंबाबा आदि लेखक – बुद्धिजीवी झूठे मामलों में फ़ँसाकर जेल में बंद किये गए हैं, वहाँ ऐसे दौर को देखकर लगता है कि परसाई का लेखन यक़ीनन उन्हें भी अब तक जेल पहुँचा चुका होता या उनकी जान पर ही बन आती।
परसाई अपने लेखन को क्षण का लेखन मानते थे। उनका मानना था कि जो अपने समय के प्रति सचेत नहीं है, उस पर ख़ामोश है तो ऐसे शाश्वत लेखन से मुझे कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए उन्होंने अपने आसपास मौजूद हर सामाजिक-राजनीतिक मसले पर टिप्पणियां कीं। प्रेम पर और प्रेम के प्रदर्शन और उसकी निस्सारता पर उनके कुछ व्यंग्य लेख तो अद्भुत हैं। अपने समकालीनों पर उनके लिखे संस्मरण भी बहुत दिलचस्प हैं।
अनेक लोग उन्हें व्यंग्यकार मानते हैं जबकि वे खुद को ऐसा नहीं मानते थे। उनका मानना था और जो सही भी है कि व्यंग्य एक भाव है जो कविता में भी हो सकता है, कहानी में और निबंध या पत्रों में भी। वो अलग से कोई विधा नहीं है। कुछ लोग व्यंग्य को हास्य-व्यंग्य समझते हैं। परसाई इसे भी सही नहीं मानते थे। उनका मानना था कि अगर कोई सड़क पर फिसल कर गिर जाये तो लोग उसे देखकर हंसने लगते हैं। यह हास्य है। लेकिन अगर किसी को गिरने वाले पर हंसते लोगों को देखकर गिरे हुए को उठाने का ख्याल आये तो ये व्यंग्य है। वे कहते थे कि व्यंग्य करुणा से पैदा होता है इसलिए व्यंग्य को ज़िम्मेदार होना चाहिए।
उनके लेखन का दायरा बहुत बड़ा रहा। उनका रचा गया विपुल लेखन परसाई रचनावली में इकट्ठा किया गया है। परसाई ने हिंदी साहित्य के लेखकों की कम से कम तीन-चार पीढ़ियों पर अपना असर छोड़ा है चाहे वह कोई भी विधा हो। परसाई की याद करते हुए राग-दरबारी के श्रीलाल शुक्ल और शरद जोशी की याद बेशक की जानी चाहिए लेकिन इन सभी की अपनी-अपनी विशिष्टता थी। परसाई का लेखन बहुत बड़ी रेंज में था और उनके पाठकों का दायरा भी बहुत बड़ा था। प्रगतिशील लेखन के उस्ताद लोग आज भी नए आने वालों को परसाई पढ़ने की सलाह देते हैं। यह एक तरह से लेखन की दुनिया में शामिल होने से पहले बाहर की धूल-मिटटी झाड़ने-पोंछने जैसा है। परसाई को थोड़े-थोड़े अंतराल पर उन्हें भी पढ़ना चाहिए जो पक चुके हैं ताकि परसाई का लेखन उन्हें उनके कोने में छिपे आत्म से साक्षात्कार करवा दे और बताये कि नारे और मुहावरे तो तुमने रट लिए, और जीवन में काम उलटे कर रहे हो? प्रगतिशील और आधुनिक बनते हो और दहेज़ ले रहे हो? जाति में और धार्मिक आडम्बरों में यक़ीन कर रहे हो?
यहाँ तक कि परसाई देश और राष्ट्र की भक्ति के नाम पर खड़े गए तूमार को भी अपने लेखन में पूरी तार्किकता के साथ ढहा देते हैं।
परसाई का लेखन समय के साथ जीवन में आ जाने वाले ऐसे विकारों को ऐसे ही निकाल देता है जैसे डंडे से मारने पर कम्बल से धूल झटक जाती है।

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