मेहनतकश जनता की मुक्ति का संघर्ष तेज करो!!

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आज़ादी! बराबरी!! मुक्ति!!!
मेहनतकश जनता की मुक्ति का संघर्ष तेज करो!
जनसभा
तिथि एवं समय- 1 अक्टूबर 2022, सुबह 10 बजे
स्थान- रामजानकी मंदिर परिसर, प्राइमरी विद्यालय,
सैदूपुर, चन्दौली
साम्राज्यवाद, पूंजीवाद व सामंतवाद को ध्वस्त करो!
मनुवादी जातिव्यवस्था को ध्वस्त करो!!
मेहनतकशों का राज कायम करने के लिए संगठित हो जाओ!!!
एक आत्मनिर्भर व आज़ाद, नवजनवादी-समाजवादी भारत का निर्माण करो!!!
प्यारे मेहनतकश साथियों,
आज हमारे देश की मेहनतकश जनता बहुत ही असहनीय जिंदगी जी रही है। इस देश के 5 से 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की लगभग 90% संपत्ति है। आज देश की हालत यह है कि खुद सरकार कह रही है कि देश के 80 करोड़ लोग सरकारी राशन पर जिंदा हैं। किसी तरह 8-10 तक पढ़कर गरीबों के बच्चे पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं। थोड़े-बहुत पैसे की वजह से मेहनतकश गरीब लोग मर जा रहे हैं लेकिन अपना इलाज नहीं करा पा रहे हैं। अंग्रेजों के हमारे देश से गए 75 साल बीत चुके हैं। अभी इसी 15 अगस्त को आरएसएस-भाजपा की सरकार ने पूरे देश में ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ बड़े धूमधाम से मनाया। घर-घर तिरंगा भी फहराया गया। लेकिन कभी आपने यह सोचा कि देश का पाई-पाई बेच देने को तैयार यह सरकार इतने भव्य तरीके से किसकी आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रही है? क्या सचमुच इस देश की मेहनतकश जनता आज़ाद है? क्या भेड़िये और बकरियाँ दोनों एक साथ आज़ाद हो सकते हैं? उत्तर होगा नहीं। हमारी आज़ादी और मुक्ति की लड़ाई तो अभी बाकी है।
हमारे ग्रामीण भारत की लगभग आधी आबादी भूमिहीन है। जो करती तो किसानी है लेकिन उसके पास घूर फेकने भर भी जमीन नहीं है। अपनी जमीन न होने की वजह से दूसरे के खेतों में इसे रोपनी, सोहनी, कटनी, बुवाई आदि करके गुजारा करना पड़ता है। लेकिन इस हाड़तोड़ मेहनत के एवज में उसको जो मजदूरी मिलती है उससे उसका गुजारा हो पाना सम्भव नहीं है। तमाम मेहनतकश लोग घर बनाने भर जगह भी न होने की वजह से गड़ही-पोखरी की जमीन पर बसे हुए हैं। जहां से बेदखल करने के लिए उन्हें आये दिन नोटिस दी जा रही है और कुछ गाँवों से तो उन्हें गड़ही-पोखरी की जमीन से बिना कहीं और जमीन दिए हटाया भी जा चुका है। मुसाखाड़ और नौगढ़ के वन क्षेत्र में लोगों को अवैध बताकर वन भूमि छोड़ने के लिए नोटिस दी जा रही है। भविष्य में यह जमीन कंपनियों को दी जाने की योजना बन चुकी है। जिसकी खबरें अखबारों में भी आने लगी हैं। इसी भूमिहीन व गरीब आबादी को योगी आदित्यनाथ की सरकार “एन्टी भू माफिया एक्ट” के तहत भू माफिया कह रही है। गाँवों में भी बहुत जल्द ही इन गरीबों के घरों और जमीन पर बुलडोजर चलने वाला है।
हमारे देश की विडंबना है कि जो असली किसान है वो भूमिहीन है, अपने को मजदूर कहता है और ग्रामीण इलाकों में जो परजीवी बड़े भूस्वामी हैं जो कभी खेतों में अपना श्रम नहीं लगाते वो ढ़ेर सारी जमीन के मालिक बने बैठे हैं। यह परजीवी बड़ा भूस्वामी वर्ग आज शिक्षा माफिया, भू माफिया, बस मालिक, ट्रक मालिक, प्रॉपर्टी डीलर, सूदख़ोर, बिजनेश मैन, शेयर होल्डर, मेयर, मंत्री इत्यादि बना हुआ है। इसकी कमाई के सैकड़ों श्रोत हैं। यह परजीवी वर्ग हमारे देश के मेहनतकश भूमिहीन किसानों का हक हड़प कर बैठा है और उसकी तबाही का कारण बना हुआ है। यह परजीवी वर्ग न केवल भूमिहीन व मेहनतकश किसानों का आर्थिक शोषण करता है बल्कि तरह-तरह का सामाजिक उत्पीड़न भी करता है। गरीबों को सूदखोरी की जाल में फसाकर उनका खून चूस लेता है।
अपने पास खुद की जमीन न होने या बहुत कम जमीन होने के कारण और इस क्षेत्र में उद्दोग धंधे न होने की वजह से,चन्दौली पूर्वांचल और बिहार के मेहनतकश लोग रोजगार की तलाश में देश के कोने-कोने में जाते हैं। जो लॉकडाउन के दौरान सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर भूखे-प्यासे, मरते-जीते हुए बड़ी मुश्किल से अपने गांव वापस पहुंचे थे। भाजपा की सरकार ने इनको बेरहमी से भूखों मरने के लिए छोड़ दिया था। घर लौटने तक का कोई इंतजाम नहीं किया था। आज बड़े- बड़े शहरों में 12-12 घंटे खटने के बाद भी उनको 400-500 से ज्यादा मजदूरी नहीं मिलती है। लम्बे संघर्षों के बाद हासिल हुए 8 घण्टे के कार्यदिवस के कानून को भी इस सरकार ने खत्म करके 12 घण्टे का कर दिया। जिसके लिए मजदूर को अब कोई ओवरटाइम नहीं मिलेगा। लेकिन कोई जोरदार संघर्ष खड़ा नहीं हो पाया। दरसल भाजपा की सरकार जनता के लिए नहीं बल्कि अमेरिकी साम्राज्यवाद और देशी-विदेशी पूंजीपतियों के लिए काम कर रही है। आज हमारे देश में सैकड़ों विदेशी कंपनियां लगी हुई हैं। जो देश को आर्थिक तौर पर गुलाम बनाते जा रही हैं। ये विदेशी दैत्याकार कंपनियां अडानी-अम्बानी जैसे देशी दलाल पूंजीपतियों के साथ मिलकर देश के सभी बड़े उद्योगों पर अपना कब्जा जमा चुकी हैं। नेल कटर से लेकर मोबाइल तक, साबुन से लेकर कपड़े-जूते तक यही विदेशी कंपनियां बनाती हैं और हमारे देश का सारा पैसा लूटकर विदेशों में ले जाती हैं। इन्हीं कंपनियों के फायदे के लिए 8 घंटे के श्रम कानून को खत्म करके मोदी ने 12 घंटे का श्रम कानून बना दिया।
चन्दौली व हमारे देश में ऐसे मेहनतकश किसानों की भी अच्छी खासी संख्या है जिनके पास अपनी खेती है। लेकिन इनकी भी जिंदगी कोई बहुत बेहतर नहीं है। यह ऐसा किसान वर्ग है जिसे अपने बच्चों की पढ़ाई और बेटियों की शादी के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है, कभी-कभी तो अपनी जमीन भी बेचनी पड़ती है। क्योंकि खाद-बीज-कीटनाशक सब देशी-विदेशी लुटेरी कंपनियों के हाथ में होने की वजह से इतने महंगे हैं कि खेती से वो बहुत कम बचत कर पाता है। खेती से जो लाभ इन किसानों को मिलना चाहिए वो ये लूटेरी कंपनियां हड़प ले जाती हैं। यह मेहनतकश किसान भी आज कर्ज के जाल में फंसा हुआ है।
इन सारी समस्याओं और चुनौतियों के बीच सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि हमारे देश का मेहनतकश वर्ग आज सबसे ज्यादा बिखरा हुआ है। वो जाति के नाम पर बंटा हुआ है, धर्म के नाम पर बंटा हुआ है। आपस में लड़ाया जा रहा है। अपनी-अपनी जातियों के धूर्त व दलाल पूंजीवादी नेताओं और पूंजीवादी पार्टियों का पिछलग्गू बना हुआ है। पिछले 70 सालों में तमाम पार्टियों की सरकारें आयीं और गयीं लेकिन मेहनतकश जनता की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया। चाहे किसी की भी सरकार रही हो सबने इन्हीं देशी-विदेशी पूंजीपतियों और बड़े भूस्वामियों के फायदे के लिए काम किया है। क्योंकि सब इन्हीं के पैसों और रहमोकरम पर पलते हैं। इसका मतलब साफ है कि वोट देकर मात्र सरकार बदलने से कुछ खास बदलाव होने वाला नहीं है। जब तक यह शोषक-उत्पीड़क व्यवस्था रहेगी ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि ये राजनीतिक पार्टियां समय-समय पर कुछ भीख के टुकड़े जनता के सामने फेंक दिया करेंगी। लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दलाली करने वाली आरएसएस-भाजपा की इस मनुवादी सरकार ने तो निर्लज्जता की सारी हदें पार कर दिया है। सारी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा जमा लिया है और अब वोट देने या न देने से ये सत्ता छोड़ने के मूड में नहीं हैं। इनको अब जनता का डर नहीं रह गया है। मोदी जी घूम-घूम के यह कह रहे हैं कि मुफ्त में राशन देने से देश तबाह हो जाएगा। जाहिर है 2024 के बाद राशन बंद होगा या फिर उसमें भारी कटौती होगी। मेहनतकश जनता पर अभी और जबरदस्त मार पड़ने वाली है।
आज़ादी के 75 साल बाद भी जातिगत भेदभाव, ऊंच-नीच और गरीबों की आर्थिक गुलामी बदस्तूर जारी है। यह देशी, विदेशी पूंजीपति और सामंती शक्तियां ही हैं जो ऊंच-नीच की जातिवादी सोच को जनता के बीच बनाये रखना चाहती हैं ताकि इनके शोषण व शासन के खिलाफ कोई बड़ी गोलबंदी न हो सके। लोग आपस में ऊंच-नीच और जाति-धर्म के नाम पर बंटे रहें। सिर्फ मेहनतकशों की राजसत्ता ही इन तमाम तरह के भेदभावों और शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति दिला सकती है। हक और आज़ादी लड़ के हासिल की जाती है। मेहनतकशों की राजसत्ता भी लड़ के ही बनेगी। वोट पर निर्भर रहने की मानसिकता ने लोगों को कायर और दब्बू बना दिया है। आज जरूरत जातिवाद व धर्मवाद का विरोध करते हुए अपने हक़-अधिकार के लिए खुद को एकजुट व संगठित करने की है। बाढ़ आने वाली है, अगर हमने बांध नहीं बनाया तो डूब जाएंगे।
मेहनतकश मुक्ति मोर्चा सभी भूमिहीन, गरीब व मेहनतकश किसानों, दिहाड़ी मजदूरों, पशुपालकों, ठेले-सगड़ी वालों, दुकानदारों, छात्रों-नौजवानों, महिलाओं, शिक्षकों आदि से यह अपील करता है कि अपनी मुक्ति की लड़ाई को तेज करने के लिए भारी से भारी संख्या में 1 अक्टूबर को सैदूपुर में होने वाली जनसभा में शामिल हों।
हमारी माँगें-
1- गड़ही-पोखरी और वन भूमि से बेदखली बंद करो। ग्राम समाज(GS) की जमीन, नादिवास की जमीन, सिंचाई विभाग व वन विभाग में आने वाली खेती की जमीन को भूमिहीन व गरीब किसानों को स्थायी तौर पर पट्टा करो।
2- भूमि हदबंदी कानून(सीलिंग एक्ट) को धरातल पर लागू करो। सीलिंग एक्ट के तहत जमीन रखने की सीमा को आज की परिस्थितियों के मुताबिक कम करो। सीलिंग एक्ट की सीमा से अधिक जमीन पर काबिज बड़े व परजीवी भूस्वामियों से जमीन को जब्त कर भूमिहीन व गरीब किसानों को स्थायी तौर पर आवंटित करो।
3- महंगाई व बेरोजगारी पर लगाम लगाओ। स्थानीय स्तर पर बेरोजगार युवाओं को सम्मानजनक काम की गारंटी करो। ग्रामीण स्तर पर कम से कम 600 रुपये दैनिक मजदूरी वाले काम की गारंटी करो।
4- सरकारी संस्थाओं के माध्यम से अधिया-पटवन-कूत पर खेती करने वाले भूमिहीन-गरीब किसानों और छोटे-मझोले मेहनकश किसानों को सस्ते से सस्ते दर पर खाद, बीज, कीटनाशक और खेती के उपकरण उपलब्ध कराओ। उनकी उपज का उचित व लाभकारी मूल्य प्रदान करो। सरकारी क्रय केंद्रों पर इन किसानों की फसल का खरीद सुनिश्चित करो।
5- सभी गरीबों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण राशन और जीवन यापन के सभी जरूरी सामानों की व्यवस्था करो ताकि उनको बाजार पर निर्भर न रहना पड़े।
6- मजदूर विरोधी नए श्रम कानूनों(चार लेबर कोड) को रद्द करो। नए श्रम कानूनों के तहत कार्य दिवस को 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घण्टे कर देने के फैसले को वापस लो। शहर और गांव दोनों जगह न्यूनतम कार्य दिवस 6 घंटे करो।
7- सभी विदेशी कर्जों को रद्द करो। मेहनतकश जनता के घरेलू कर्जों को चुकता करो। हर तरह की सूदखोरी पर रोक लगाओ। मेहनतकश जनता को सरकारी बैंकों से सस्ते से सस्ते दर पर कर्ज उपलब्ध कराओ।
8- प्राइवेट स्कूलों और कॉलेजों को बंद करो और पूरे देश में सभी छात्र-छात्राओं के लिए शरू से आखिर तक एक तरह की और मुफ्त सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गारंटी करो।
9- प्राइवेट अस्पतालों को बंद करो। सरकारी अस्पतालों में मेहनतकश जनता का मुफ्त में दवा, इलाज, जांच, ऑपरेशन इत्यादि की व्यवस्था करो।
10- उद्दोग धंधों और सार्वजनिक संस्थाओं के निजीकरण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाओ। विदेशी पूंजी निवेश पर प्रतिबंध लगाओ। विदेशी पूँजी और उद्दोग व देशी दलाल पूंजीपतियों की पूंजी और उद्योग को जब्त कर उनका राष्ट्रीयकरण करो। बैंकों द्वारा उन्हें दिये गए कर्ज को वापस लो।
11- जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न व जाति व्यवस्था को खत्म करो। उत्पीड़ित जातियों का सभी जगहों पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण के व्यवस्था की गारंटी करो।
मेहनतकशों की एकता ज़िंदाबाद!
इंक़लाब ज़िंदाबाद!!
मेहनतकश मुक्ति मोर्चा(MMM), चन्दौली, उ.प्र.

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