पुरुषों को बर्बर ही बने रहना है या फिर समाजवाद के लिए लड़ना है

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सवाल औरतों के घरेलू श्रम की कीमत लगाने का नहीं बल्कि उसे खत्म करने का है!
तमिलनाडु के चुनाव में इस बार औरतों के वोट को अपनी तरफ खींचने के लिए उनके घरेलू श्रम की बोली लगनी शुरू हो गयी। लेकिन इसके बहाने ही सही, औरतों के घरेलू श्रम के महत्व पर बहस भी शुरू हो गयी है। हाल में आयी फ़िल्म ‘द ग्रेट इंडियन किचेन’ ने भी इस बहस को आगे बढ़ाया है।
तथाकथित मुख्यधारा के अर्थशास्त्र में औरतों के घरेलू श्रम को अनुत्पादक श्रम कहा गया है। लेकिन सच बात यह है कि दुनिया के सारे उत्पादक माने जाने वाले श्रम इसी अनुत्पादक श्रम पर ही टिके हुए है। औरतों की रसोई अगर न चले तो कितने मजदूर या दूसरे कर्मचारी अपना ‘उत्पादक’ काम कर पाएंगे? बच्चों की 24 घण्टे की देखभाल यदि औरतें न करें तो तथाकथित उत्पादक श्रम का पूरा नेटवर्क ही अस्त व्यस्त हो जाएगा। रजनी देसाई ने ‘आस्पेक्ट’ पुस्तिका में इस पर विस्तार से लिखा है।
दरअसल एक साजिश के तहत ही घरेलू श्रम को अनुत्पादक श्रम की कैटेगरी में डाला गया है, ताकी पूंजीपति या राज्य को इस श्रम की मजदूरी न देनी पड़े। जबकि औरतों का घरेलू श्रम मजदूरों या अन्य कर्मचारियों के फैक्ट्री या ऑफिस में किये जाने वाले श्रम से अनिवार्य रूप से जुड़ा है, या उसी का विस्तार है। पूंजीपति मजदूरों के ‘उत्पादक श्रम’ से तो अपना ‘सरप्लस’ निचोड़ता ही है, लेकिन औरतों के इस तथाकथित अनुत्पादक घरेलू श्रम को तो पूरा का पूरा ही निगल जाता है। यानी घरेलू श्रम करने वाली औरतें एक तरह से ‘बंधुआ मजदूर’ ही होती हैं। वह एक दूसरे तरह से भी ‘बंधुआ मजदूर’ होती है। उसके काम के घंटे तय नहीं होते। उन्हें रात में भी गहरी नींद से उठाकर किचेन में भेजा जा सकता है। मजदूर या कर्मचारी अपने काम के घण्टे के खत्म होने के बाद आराम महसूस कर सकता है, लेकिन औरतों के लिए काम और आराम के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं होती। उनका घरेलू श्रम 24 घण्टे गिरवी रहता है।
अभी यहां बच्चा जनने की प्रक्रिया में किये जाने वाले श्रम की बात नहीं की जा रही, जो घरेलू श्रम का ही हिस्सा है। बच्चे के जन्म के लिए भले ही पुरुष भी जिम्मेदार हो लेकिन ‘लेबर पेन’ तो औरतों को ही सहना पड़ता है। इस ‘लेबर पेन’ की कीमत कौन लगा सकता है, जिस पर पूरी मानवता का अस्तित्व ही टिका हुआ है।
औरतों के ‘बंधुआ मजदूर’ होने से भी ज्यादा भयावह घरेलू श्रम की वह प्रकृति है जो औरतों के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डालती है। और उन्हें दोयम दर्जे का एकाकी नागरिक बना डालती है। घरेलू श्रम का उबाऊ, थकाऊ और एकाकी रूप (अन्य ‘उत्पादक’ श्रम की तरह यह श्रम सामूहिक नहीं होता) महिलाओं को दिमागी रूप से थका डालता है और उनके ‘विजन’ को संकुचित कर देता है। इन सबके साथ जब मनुवादी पितृसत्ता की संस्कृति औरतों के दिमाग पर एक पहाड़ की तरह बोझ बन कर बैठ जाती है तो वो अपने को पहचान तक नहीं पाती। और कई बार तो इस गुलामी का आनंद भी लेने लगती हैं।
इसके कारण सार्वजनिक जीवन मे उनकी पहलकदमी बाधित हो जाती है और फलतः हर जगह हमें पुरुष ही पुरुष नज़र आने लगते हैं और ऐसा लगने लगता है कि यह पुरुषों की ही दुनिया है।
लेकिन औरतों ने एक खास तरह से इसका बदला भी लिया है। औरतों की स्थिति जितनी खराब होती गयी, उसी अनुपात में पुरुष भी सभ्य से बर्बर होता गया है।
लेकिन एक समय था, जब यही ‘घरेलू श्रम’ समाज की धुरी था। तब उत्पादक और अनुत्पादक श्रम का बंटवारा नही था। तब यह श्रम एकाकी नही था। महिलाओं का समूह इसे एक कम्यून की शक्ल में अंजाम देता था। तब यह श्रम उबाऊ और थकाऊ नहीं था, क्योंकि विज्ञान-कला-संस्कृति-भाषा इसी श्रम की धुरी के इर्द-गिर्द पनप रहे थे। अनेक शोधों में अब यह स्थापित हो चुका है कि इतिहास की पहली वैज्ञानिक-डॉक्टर-कलाकार-इंजीनियर औरतें ही थी। पत्थर के औजारों के इस्तेमाल से बहुत पहले औरतें लकड़ी के शानदार औजारों का इस्तेमाल कर रही थी। लेकिन लकड़ी का होने के नाते आज उनके ‘फासिल्स’ नहीं मिलते, जैसे कि पत्थरों के औजारों के मिलते हैं। अब तक का सबसे महत्वपूर्ण अविष्कार, खेती का अविष्कार औरतों ने ही किया है। बच्चा जनने की जिस प्रक्रिया के कारण वे आज दोयम दर्जे की मानी जाती हैं, ठीक उसी प्रक्रिया के कारण सुदूर इतिहास में सबसे पहले कम्यून जीवन-शैली औरतों ने ही शुरू किया।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि पुरुषों को बर्बरता से सभ्यता की ओर खींच कर लाने का श्रेय औरतों को ही है। ‘एवलीन रीड'(Evelyn Reed), ‘रोबर्ट ब्रीफात’ (Robert Briffault) जैसे अनेकों शोधकर्ताओं ने अपनी पुस्तकों में इसे विस्तार से बताया है। मातृत्व की इसी विशेषता के कारण ‘रोबर्ट ब्रीफात’ और आगे जाकर कहते हैं कि पुरुष जानवर (male animals) प्रायः ज्यादा मूर्ख (Stupid) होते हैं।
यह समय इतिहास में ‘मातृसत्ता’ के रूप में जाना जाता है। जिसका समय दो चार दशकों का नहीं, बल्कि लाखों सालों का था। जबकि पितृसत्ता का वर्तमान रूप तो महज कुछ हजार साल का है।
औरतों के सामने एक बार फिर से पुरुषों को सभ्य बनाने का कार्यभार आ खड़ा हुआ है। इस बार आसानी यह है कि खुद पुरुषों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा औरतों के इस प्रोजेक्ट में वालंटियर करने को तैयार है। लेकिन दूसरी तरफ कठिन चुनौती यह है कि सभ्य बनाने की इस लड़ाई के मार्ग में इस बार एक बर्बर पूंजीवादी-सामंती सत्ता उसके सामने है। यही सत्ता पुरुषों की बर्बरता का स्रोत भी है। इसलिए लड़ाई आसान भी है और कठिन भी।
लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि यह लड़ाई पुरुषों को शुरू नहीं करनी है। यह शुरू हो चुकी है। हमे बस यह तय करना है कि पुरुषों को बर्बर ही बने रहना है या मानवता को सभ्य बनाने की इस लड़ाई में औरतों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना है….
#मनीष आज़ाद

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