औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ इस सच के तहफ्फुज के लिए सबसे लड़ी हूँ

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विशद कुमार

साझा संवाद द्वारा ऑनलाइन वेबिनार पर “स्त्री – कल, आज और कल” विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया. इस परिचर्चा में उद्यमी, शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता सय्यद शिबली मंज़ूर, दिल्ली विश्वविद्यालय की हिंदी साहित्य की प्रोफेसर नीतिशा खालखो एवं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. रंजीत कुमार महली उपस्थित थे.
इस मौके पर सय्यद शिबली मंज़ूर ने कहा कि किताबें में महिलाओं के प्रति उच्च विचार और कथन पढ़ने और सुनने में अच्छा लगता है परंतु अभी तक उनको पुरूष प्रधान समाज में  बराबरी का स्थान नहीं मिला है. औरत को हम केवल घर गृहस्थी बसाने और बच्चों का पालन पोषण की ज़िम्मेदारी थोप दी है और सामाजिक एवं धार्मिक बंदिशों में जकड़ कर रख दिया वहीं महिलाओं में पुरूष के मुकाबले वो अधिक मेहनती, निष्ठावान और सहिष्णु होती हैं. इसका उदाहरण काम काजी महिलाएं या किसान परिवार की महिलाएं है जो बच्चों के देखभाल के अलावा, काम पे जाना फिर काम से लौट के आने पर खाना पकाना और अन्य काम करती है. आज अगर हम अपने घर की औरतों को पुरुष के बराबर काम करने का मौका दें तो निश्चित तौर पर देश में सामाजिक  आर्थिक बदलाव देखने को मिलेगा.

इस परिचर्चा में “आदिवासी समाज मे महिलाओं की स्थिति , विशेष संदर्भ  शिक्षा  व स्वास्थ्य” पर अपनी बातें रखते हुए दौलतराम महाविद्यालय की प्रोफेसर नीतिशा खालखो ने अपने बातों को रखते हुए कहा कि मौजूद समय में शिक्षा और स्वास्थ्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है, परंतु प्राचीन काल में ये सुविधाएं सामाजिक उत्तरदायित्व था. प्राचीन काल में धुमकुड़िया/धोटुल आदि शैक्षिक संस्थाएं आदिवासियों समूह के पास रही है.
धुमकुड़िया (उराँव समाज में पाए जाने वाली शिक्षण केन्द्र रहा जिसमें जोंख एड़पा यानी पुरुष धुमकुड़िया एवं पेलो एड़पा यानी स्त्री धुमकुड़िया नामक दो अलग अलग कमरे थे.  यह प्रायः अखाड़ा के समीप बनाया जाता था और हर एक बच्चा को जब तक कि उसका विवाह नहीं हो जाता उसे वहां रहकर जीवन यापन के विभिन्न कार्यकलापों  को सिखाया जाता था. शादी उपरांत इसकी सदस्यता स्वतः ही स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समाप्त हो जाती थी.
प्राचीन काल में तथाकथित सभ्य समाज की  शिक्षण प्रणाली में स्त्रियों की भागीदारी शून्य थी और आज भी दयनीय. साथ ही पढ़ने-लिखने का अधिकार उच्च जाती और ख़ास कुल को ही था .
प्रोफेसर खालको स्वास्थ्य सुविधा परअपनी बात रखते हुए कहा कि अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र आदि से पहले लोग अपने आस-पास की वनस्पति एवं जैविक पौधों से अपने बीमारियों का उपचार किया करते थे. बहुत समय ऐसा भी हुआ है की बीमारियों के कारण अनेक मौतें हुई हैं जिस प्रकार आज करो ना काल में विज्ञान, मेडिकल साइंस सब ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं वैसे ही जो सत्य पुरजोर तरीके से स्थापित होती है कि प्रकृति को हराया नहीं जा सकता है प्रकृति हमेशा सहिष्णुता और हुलार मांगती है. हमें प्रकृति के साथ अपनापन एवं ध्यान देना होगा, उनको नष्ट या प्रदूषित करने से रोकना होगा. स्वच्छ जल, खेती एवं वातावरण से हम अनेक बीमारियों को दूर कर सकते हैं. जनजाति छात्रों खासकर छात्राओं के के लिए केंद्र सरकार का अनेक कल्याणकारी योजनाएं हैं. जिसमें एकलव्य मॉडल रेसिडेंशियल स्कूल, नवोदय विद्यालय एवं बालिका होस्टल में लड़कियों का यौन शोषण की अनेक घटनाएं एवं मौते हुई है. कई नाबालिग लड़की गर्वती भी पाई गई है. वार्डन की कमी और बेहतर रख रखाव के कारण ऐसी घटनाएं होती हैं. अनुसूचित जनजाति मंत्रालय द्वारा प्रत्येक छात्रों पर 800 रुपए का मासिक अनुदान देती है जबकि ये राशि बहुत ही कम. सरकार को चाहिए कि शिक्षा और स्वास्थ्य की ओर अधिक ध्यान देनी चाहिए और बजट में अनुदान राशि और बढ़ाना चाहिए.
अंत में प्रोफेसर खालको ने कहा कि पुरुषों को स्त्री के प्रति अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए और साथ ही अधिक सहिष्णु होनी की जरूरत है.
इस परिचर्चा में मौजूद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहायक प्रोफेसर डॉ. रंजीत कुमार महली ने  “लिंगभेद आधारित संस्कृति : महिला शोषण का आधार” पर अपनी बात रखी.
मनुष्य के अलावे अन्य प्राणियों में भी नर और मादा (स्त्री-पुरुष ) होते हैं, परंतु उनके बीच लिंगभेद  नहीं है. प्राकृतिक और जैविक भेद के अलावे उनमें कोई बाहरी और बनावटी भेद नहीं है। लिंग के आधार पर न तो मादा को किसी अधिकार से वंचित किया गया है और न ही इस आधार पर उनके कोई विशेष दायित्व और कर्म निर्धारित किए गए हैं. शोषण-उत्पीड़न और अन्याय का तो सवाल ही नहीं उठता; जबकि वे मनुष्य की तरह सभ्य और विवेकशील नहीं माने जाते है. ये सारी दुष्प्रवृत्तियाँ तो तथाकथित विवेकशील और सभ्य माने जाने वाली मानव जाति में पाई जाती हैं.
पुरुषवादी समाज में इन दुष्प्रवृतियों को ही ‘संस्कृति’ के नाम से आलोकित किया गया है. अन्य जीवों की तरह ही मनुष्य में भी स्त्री-पुरुष के बीच महज़ शारीरिक, जैविक, लैंगिक और प्राकृतिक भेद है. इनके आधार पर न तो किसी की योग्यता और कुशलता निर्धारित होती है और न ही इसके आधार पर कोई ताक़तवर व कमजोर. दुर्भाग्य से चालाक पुरुष वर्ग ने इन्हीं भेदों के आधार पर संस्कृति का विन्यास किया है. अपने नापाक इरादों के तहत उसने इसी भेद को बढ़ाने का कुत्सित प्रयास किया है और सफलता भी अर्जित की है।
संस्कृति के नाम पर पुरुष को ‘स्वामी’ और स्त्री को ‘अबला ‘ का दर्जा दिया गया है। इसी आधार पर उनके कर्तव्य और दायित्व निर्धारित किए गए हैं. कई मानवीय सुविधाओं और अधिकारों से महिलाओं को वंचित किया गया है. शोषण-उत्पीड़न तो मानो  स्त्रियों को सहन करने के लिए ही बनी है. रिश्तों के हिसाब से जुल्म तय हैं और पाबंदी भी. मानो घर की चारदीवारी और पुरुषों के हाथ में उनका भाग्य है. और ये सब हुआ है संस्कृति के नाम पर. शायद मवेशियों में उत्पीड़न-शोषण के न होने के पीछे कृत्रिम कानून तथा संस्कृति का न होना है; और मानव समुदाय के बीच मानव निर्मित कानून और संस्कृति ही महिला उत्पीड़न का आधार. स्वभाविक है जब कोई ‘कुछ’ बनाएगा तो वह स्वहित को ही प्राथमिकता देगा।

स्त्री बनाने के प्रयास को ही संस्कृति का नाम दे दिया गया है. कैसे – बच्चा जब जन्म लेता है, तब लिंग के आधार पर उनके परिधान, आचार-विचार, व्यवहार व अनुशासन तय कर दिए जाते हैं- जैसे कि बेटी है तो फ्रॉक, सूट पहनेगी; चोटी बांधेगी; बाली पहनेगी ; विवाह के बाद सिंदूर लगाएगी, मंगलसूत्र धारण करेगी ; लड़के वाले को दहेज देगी; साड़ी पहनेगी; पति की लम्बी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत करेगी इत्यादि।

यहाँ फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो का जिक्र  अत्यावश्यक है. बच्चे के जन्मते ही उसके रोने संबंधी सवालों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था : “मनुष्य स्वतन्त्र जन्म जरूर लेता है, परंतु समाज में खुद को हर जगह जकड़े हुए पाता है. नवजात शिशु को माँ के गर्भ से बाहर आते ही इस बात की अनुभूति हो जाती है कि उसकी आजादी समाज के द्वारा छीन ली जाएगी. रूसो की मानें तो आजादी खोने के गम या पश्चताप में ही बच्चा रोता है। यह वैज्ञानिक सच्चाई भले न हो; दार्शनिक उड़ान ही सही, पर धर्म, संस्कृति और समाज के नाम पर पुरुष वर्ग और धर्म के ठेकेदारों की करतूतों का पर्दाफाश तो करता ही है. उदारणार्थ, बच्चा जन्म लेता है तो वह सिर्फ और सिर्फ इंसान होता है, मगर तथाकथित धर्म के ठेकेदार उस नन्हें को बाँट कर हिन्दू या मुसलमान बना देते हैं.
भारत की कुछ प्रथाओं पर गौर करें – देवदासी प्रथा, जोगनिया प्रथा, सती प्रथा, विधवा विवाह वर्जना आदि. पुरुष वर्ग की इस चाल की ओर मौजूदा दौर की विश्व प्रसिद्ध नारीवादी लेखिका ग्लोरिया स्टायनेमस और रुचिरा गुप्ता ने इसारा किया है. उनकी किताब ‘वज़ूद औरत की’ पठनीय है. इस किताब में उन्होंने बताया है कि स्त्री देह पर कब्जा के जरिए ही लैंगिक, जातीय और वर्गीय हिंसा अपनी जड़ें जमाती हैं. महिलाएँ कहीं सुरक्षित नहीं दिखतीं. तभी तो तस्लीमा नसरीन कहती हैं कि ‘महिलाओं का कोई देश नहीं होता।’सच में अगर देश का मतलब सुरक्षा और सम्मान है, तब तो सचमुच महिलाओ का कोई देश नहीं होता क्योंकि महिलाएँ हर जगह असुरक्षित और सम्मान से वर्जित रहीं हैं. (‘औरत के हक में’ और ‘औरतों का कोई देश नहीं होता’ किताब से ) असल में दिक्कत यह है कि तस्लीमा को धर्मविरोधी/इस्लामविरोधी ठहरा दिया जाता है. वह किसी धर्म की विरोधी नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर पुरुषवादी तंत्र की विरोधी हैं. दकियानूस समाज में दिक्कत यह है कि तर्क को तर्क से काटने के बजाय भीड़ की आक्रामकता से प्रगतिशील सोच/विचार को दबाया जाता है. तस्लीमा के साथ भी यही हुआ.
मौजूदा नवउदारवादी/ वैश्वीकरण का दौर स्त्रियों के पक्ष में दिखाई पड़ता है जो कि एक भ्रम है. वास्तव में, इस दौर में ‘आर्थिक आत्मनिर्भरता’ और ‘फैशन’ की आड़ में पूँजीवाद के लिबास में स्त्रियों को ‘बाजार की वस्तु’ व ‘भोग बनाने’ की पुरुषवादी सोच की एक चालाकी है. इसमें शोषण और भोग का दायरा अपेक्षाकृत व्यापक है. शोषण का दायरा अब घर-परिवार से बाहर निकलकर ऑफिस और बाजार तक बढ़ गया है. आखिर आर्थिक आत्मनिर्भरता और फैशन की संस्कृति भी तो पुरुषजनित हैं – इसमें महिलाओं का कोई हाथ तो नहीं है, यह विषम परिस्थिति है. इस नई संस्कृति का मक़सद परपंरागत शोषण की संस्कृति से महिलाओं का ध्यान हटाना है. सम्प्रति समय स्त्रियों को कुछ देता हुआ प्रतीत जरूर होता है, परंतु वास्तविकता ऐसी नहीं है.आर्थिक आत्मनिर्भरता और फैशन एक छलावा ही है.
महिला शोषण लिंगभेद संस्कृति की आड़ में किया जाता रहा है. समाज की अधिकांश संस्कृति, प्रथाएं, मान्यताएँ और परम्पराएं महिला विरोधी हैं जो कि पुरुष निर्मित हैं.
लिंगभेद खत्म करने के कुछ प्रयास होनी चाहिए :
#वर्ष 2017 में स्त्री-पुरुष भेद खत्म करने के वास्ते संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव लाया गया था जिसके तहत पुरुष और स्त्री के नाम के आगे Mr./Mrs/Miss लगाने के बजाय Xi लगाने पर सहमति बननी थी.
# इस वर्ष अगस्त में भारत की शीर्ष न्यायपालिका द्वारा सम्पति अधिकार पर दिया गया निर्णय.
महिलाओं को क्या करना चाहिए :
#संस्कृति के अंधानुकरण से बचना चाहिए.
#महिला विरोधी और लिंगभेद पर आधारित संस्कृति की शिनाख्त कर, उनके खिलाफ सविनय अवज्ञा का अभियान छेड़ना चाहिए.

अंत में फ़रहत जाहिद की पंक्तियाँ  :
औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ
इस सच के तहफ्फुज के लिए सबसे लड़ी हूँ.
स्त्रियों को अपने हक़ के लिए अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी.
उन्होंने पुरषों से अपील करते हुए कहा कि लड़के के चाह रखने वाली अपनी माँ बहन की संकुचित मानसिकता को बदले. भ्रूम हत्या, डायन के नाम पर उत्पीड़न और हत्या, दहेजप्रथा एवं अन्य सामाजिक बुराइयों को खत्म करें. बेटे के समान बेटी को प्यार, आज़ादी और शिक्षा प्रदान करें. पुरषवादी मानसिकता को खत्म करें, संस्कृति और धर्म के नाम पर स्त्रियों का शोषण बंद करें. ऐसे करने वालों का सामाजिक बहिष्कार करें.
इस कार्यक्रम का संचालन ईश्वरी राणा ने किया और धन्यवाद ज्ञापन पुरषोत्तम विश्वनाथ ने किया. इस परिचर्चा में मुख्य रूप से अनुज लुगुन, मणि माला, अरविंद अंजुम, मंथन बेबाक, शिबली फ़ातमी, अबुल आरिफ़, दीपक रंजीत, अजित तिर्की डेमका सोय, इश्तेयाक जौहर, लक्ष्मी पूर्ति, बबली कुमारी आदि लोग उपस्थित थे.
कार्यक्रम की जानकारी साझा संवाद केे संयोजक इस्तेयाक अहमद जौहर ने दी।

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