बेहतर होगा समाधान को केंद्र में रखकर सकर्मक विमर्श की ओर बढ़ें

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संपादकीय टिप्पणीः भारतीय समाज में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की नजर से वस्तुस्थिति को देखने की कोशिश सराहनीय है पर क्रांति के विज्ञान की जमीन पर खड़े होकर देखें तो इतना काफी नहीं है। टिप्पणीकार भी संभवतः इससे सहमत हो कि मजदूर क्रांति के बिना दलित-प्रश्न हल होने वाला नहीं है। और क्रांति दुनिया का सबसे व्यावहारिक काम है सिर्फ भावना या पोलिटिकली करेक्ट होने से बात बनने वाली नहीं। संपत्तिवान तबकों यहाँ तक कि शासक वर्ग के एक हिस्से को भी अपने पाले में लाना होगा तो दाँव-पेंच अपनाने की भी जरूरत पड़ेगी ही। दूसरी बात, पूँजी की मार से अगड़ी जातियों की स्त्रियाँ भी महफूज नहीं हैं, तो ऑब्सेस्ड होकर समस्या को पेश करना काफी नहीं है, बेहतर होगा समाधान को केंद्र में रखकर सकर्मक विमर्श की ओर बढ़ें। 
अर्चना गौतम 
पंजाब अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा विकसित कहा जाता है और इसको झाड़ के पेड़ पर चढ़ाकर ये भी बताया जाता है कि ये पूरे देश का पेट भरता है !! अब इस क्लेम में कितनी सच्चाई है क्या पता, लेकिन ये तो तय है कि इसकी जो भी रौनक है उसमें दलितों का हिस्सा हथिया कर , और उनके शोषण का पूरा योगदान है !!
दलित औरतों पर आर्टिकल सर्च किया तो उसमें दो ऐसे आर्टिकल सामने आए जिसमें बताया गया है कि पंजाब में दलितों की कितनी बदहाल स्थिति है और उसमें भी दलित स्त्रियों की हालत और भी खराब है। लगभग 79% दलित स्त्रियां बेहद कम रकम पर मजदूरी करती हैं और उसमें से 52% से ज्यादा पूरी अनपढ़ हैं और बाकी जो हैं उनमें से ग्रेजुएशन करने वाली न के बराबर हैं। ये सब स्थिति तब है जब दलितों की आबादी पंजाब में 1/3 यानी 33% से ज्यादा है। ये भी पता चला कि 96% दलित महिला मजदूर ऋण तले दबी हुई हैं और 33% ज्यादा मजदूर दलित पुरुष नशे का शिकार है।
जबकि यहां दिल्ली में डेरा डाले और सभी खाद्यान्य पदार्थों से लैस लंगर लगाए तथाकथित पंजाब के किसान अपने को सबसे बदहाल और शोषित दिखा रहे हैं। जबकि दलित स्त्रियों के शोषण में इनका बड़ा हाथ होता है। दिल्ली आई एक किसान महिला कहती है कि अब जब तक कानून वापस नहीं हो जाता नहीं जाऊंगी, कोई चिंता नहीं, अब बच्चों का एड्मिसन भी यहीं करवा लिया है।
एक ही रौनक वाले पंजाब में दो दो समुदायों की अलग अलग सामाजिक और आर्थिक स्थिति, शोषण को अपने आप बयां करती है !!

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