इस चुनाव में क्या करें? मनुवादी फासीवाद पर चोट करें! जनसंघर्ष की राह चुनें!

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चुनाव पर BCM का पर्चा पढ़ें

इस चुनाव में क्या करें?
मनुवादी फासीवाद पर चोट करें! जनसंघर्ष की राह चुनें!

यदि आप इस पर्चे को पढ़ रहे हैं, तो आप पढ़ाई कर रहे विद्यार्थी हो सकते हैं, अपनी मेहनत मजूरी से अपना घर चलाने वाले हो सकते हैं या कोई और आम नागरिक जो मेहनत कर के एक ऐसे जीवन की कामना करते है जिसमें आपके परिवार को रोटी कपड़ा मकान के साथ साथ बेहतर शिक्षा एवं स्वास्थ्य उपलब्ध हो और आप एक सम्मानजनक जीवन जी सकें।
हम आपसे चुनाव में बड़े बड़े नेताओं की आपसी बहसों पर बात करने नहीं, अपितु आपकी इन्हीं छोटी बड़ी समस्यायों पर बात करना चाहते हैं। हर पांच साल में जनता चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों को चुनती है जो आगे की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक नीतियां तय करते हैं। आपको कॉलेज में क्या पढ़ाया जा रहा है, आपके पास काम है या नहीं, अगर है तो कितनी आमदनी है, सब्ज़ी–गैस का क्या दाम है, ये सब चुनाव से ही तय होता है। इसलिए चुनाव से आखिर क्या प्रभाव पड़ता है और इससे कितना बदलाव होता है, इसपर जानना समझना बहुत ज़रूरी है।

तो आइए देखते हैं कि पिछले पांच सालों में क्या बदलाव हुए हैं?

1. रोज़गार की स्थिति:
यूपी और पूरे देश में नौजवानों के बीच सबसे बड़ी समस्या रोज़गार की ही है। प्रदेश में भर्ती निकलना और फिर धांधली, पेपर लीक, परीक्षा परिणाम के बाद कोर्ट में मामला लटक जाना आम सा हो गया है। उदाहरण के लिए- यूपीपीएससी जेई और एई 2013 की भर्ती 7 साल बाद अभी 2020 में पूरी हुई है। 69000 शिक्षक भर्ती में और आरक्षण प्रक्रिया में धांधली देखने को मिली है। ऐसी स्थिति ज्यादातर भर्तियों की है। एक तो भर्ती ज़रूरत से बहुत कम निकलती है और निकलती भी है तो उसकी पूरी प्रक्रिया में सालों लग जाते है या वो कभी पूरी ही नही होती है।
और अब तो सरकारों की कॉरपोरेट हितकारी आर्थिक नीतियों के चलते नौकरी की रही सही उम्मीद भी गायब हो गई है। इन पांच वर्षों में रेलवे, बीमा, बैंक, खदानें, बीएसएनएल, यहां तक कि अब शिक्षण संस्थानों को भी बेचा जा रहा है। जो संस्थान थोड़ा बहुत सरकारी नियंत्रण में थे, उसे भी ठेकेदारों के हवाले किया जा रहा है।
हर साल लाखों नौजवान एक अदद नौकरी के लिए अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण उम्र व समय को छोटे से बन्द कमरे में पढ़ने में लगा देते हैं। कई छात्र–छात्राएं भयंकर अवसाद में चले जाते हैं और अंततः आत्महत्या तक कर लेते हैं। हाल में आरआरबी एनटीपीसी परीक्षा में हुई धांधली के कारण छात्र–छात्राओं ने बड़ा विरोध-प्रदर्शन किया था। जिसके बाद इलाहाबाद में पुलिस द्वारा उनके कमरों में घुस–घुस कर लाठी व बंदूक की बटों से मारा–पीटा गया, उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दी गयी।

2. शिक्षा के हालात:
जहां सभी सार्वजनिक स्थल खुल गए थे, कोरोना का बहाना देकर लगभग 2 सालों से सभी शिक्षण संस्थानों को बंद रखा गया। सभी छात्र– छात्राओं पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। सरकारी आंकड़े बताते है कि देश भर में केवल 8 प्रतिशत बच्चे ही ऑनलाइन शिक्षा हासिल कर पाते हैं। छोटे बच्चे तो जितना सीखे थे, सब भूल गए हैं। ऑनलाइन माध्यम से ठीक से पढ़ाई नहीं हो पाती जिसके कारण कॉलेज के बच्चों को डिग्रियां तो मिल गई लेकिन उनको वो ज्ञान व अनुभव ही हासिल नहीं हुआ। 2020 में राष्ट्रीय नई शिक्षा नीति लाई गई जिसमें शिक्षा का पूरी तरह से निजीकरण व डिजिटलिकरण करने की बात कही गयी है। यानी कि धीरे धीरे शिक्षा को बाज़ार के हवाले कर देना है। अभी ही इस देश और प्रदेश की “डबल इंजन वाली सरकार” के ड्राइवर प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल शिक्षा को ही शैक्षिक विकल्प के तौर पर बताया है। उनकी मंशा साफ़ है कि इन शिक्षण संस्थानों के द्वारा मोबाइल, डाटा व ऑनलाइन मार्केट में लगी देशी– विदेशी कंपनियों को भारी पैमाने पर फ़ायदा पहुंचाना। जिसका प्रभाव यह होगा कि गरीब–मध्यम वर्ग की व्यापक आबादी के बच्चें शिक्षा से वंचित हो जाएंगे।

3 महंगाई: मनुष्य को जीवन जीने के लिए जिन चीजों की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, उन सारी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। दाल, सब्ज़ी, गैस सिलेंडर, पेट्रोल, दवाएं जैसी बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें इतनी ज़्यादा महंगी हो गई है कि गरीबों की कौन कहे, मध्यवर्ग तक भी इस महंगाई के मार से त्रस्त है। इस महंगाई की जिम्मेदार भी देश और प्रदेश की सरकारें ही है।

4. विकास या विनाश:
रेहड़ी-पटरी, ठेला-खोमचा लगाने वाले लोगों को अतिक्रमण के नाम पर उजाड़ा जा रहा है। गंगा नदी में सालों से अपनी नाव चलाकर अपना जीवन गुजर-बसर करने वालों को भी भगाने के बार–बार प्रयास किये जा रहे और उनके जगह पर धन्नासेठों के बड़े–बड़े क्रूज चलाने की योजना है। इससे यही साबित होता है कि ‘स्मार्ट सिटी’ में गरीबों के लिए कोई जगह नही है। दरअसल विकास के मोदी–योगी मॉडल की मंशा और नीतियां यह है कि धनिया–मिर्च से लेकर हर छोटी बड़ी चीज़ कॉरपोरेट के कब्ज़े में हो जाय।

5. महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों व आदिवासियों पर बढ़ते हमले:
पिछले पांच सालों में इन सभी तबकों पर हुए क्रूर हमलों की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है । भीड़ द्वारा मुस्लिमों की हत्याएं व फर्जी मुकदमों के केसों में उन्हें फंसाया जा रहा है, उनको उत्पीड़ित करने के लिए CAA–NRC कानून लाया गया, लव जिहाद के नाम पर मुस्लिम युवकों का उत्पीड़न किया जा रहा है। साथ ही दलितों एवं महिलाओं पर हमले बढ़े है जैसे हाथरस, बुलंदशहर, इलाहाबाद के पास गोहरी की घटनाएं जिनमें दलित महिलाओं के साथ बर्बर बलात्कार कर के उनकी हत्या कर दी गई। इन सभी मामलों में खुद सरकार आरोपियों के पक्ष में खड़ी है और उनका संरक्षण करती है। इसी तरह आदिवासियों के जल–जंगल–ज़मीन को लूटने के लिए उनके ऊपर क्रूर दमन में तेज़ी आई है ।

6. कोरोना काल व लॉकडाउन में जनता की स्थिति:
जनता की स्थिति पहले से ही दुर्दशा में थी, लॉकडाउन के बाद सरकार की नीतियों की वजह से उनकी स्थिति असहनीय हो गयी। दूर शहरों में काम कर रहे मजदूरों के पास खाने तक को कुछ ना बचा था। लॉक डाउन लगने के कारण उन्हें मज़बूरी में अपने गांव के लिए पैदल निकलना पड़ा । हज़ारों को संख्या में लोग मारे गए। वे कोरोना महामारी की वजह से नही मरे बल्कि भूख से मरे थे। हॉस्पिटल व डॉक्टर की भारी कमी की वजह से कोरोना महामारी के साथ साथ अन्य बीमारियों से भी लोग मारे गए।
लॉक डाउन का फ़ायदा उठा कर मजदूरों का हाड़ मांस तक चूस लेने के लिए सरकार मजदूर कानूनों में संशोधन लाई जिससे कि उनकी न्यूनतम मज़दूरी व काम के घंटों की सीमा खत्म कर दी गई। बहुत सारे लोगों को अपने रोज़ी–रोज़गार से हाथ धोना पड़ा। वहीं, किसानों की बरबादी के लिए लाए गए तीन कृषि कानूनों का साल भर से किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया जिसमें 700 से ज़्यादा किसान शहीद हो गए। इस ज़ालिम सरकार ने लखीमपुर में किसान आंदोलनकारियों के समूह को चींटियों की तरह रौंद दिया और हत्यारे भाजपा के गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी और उनका बेटा खुले घूम रहे हैं।

दोस्तों इससे हम देख सकते है कि भाजपा सरकार के पिछले पांच साल जनता के विकास के लिए नहीं बल्कि विनाशकारी साबित हुए है। एक तरफ अपनी दमनकारी नीतियों से जनता का पैसा चूस लिया गया तो दूसरी तरफ़ जनता को आपस में बांटने के लिए सरकार ने आम लोगों में सांप्रदायिकता का ज़हर घोल, उन्हें आपस में लड़वाया। और तो और सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, स्टूडेंट्स सहित किसी भी विरोध की आवाज़ को निर्ममता पूर्वक दबाया। बेशक इस मनुवादी फासीवादी भाजपा को जवाब देना ज़रूरी है लेकिन क्या किसी और पार्टी के आने से ये सब रुक जायेगा?
क्या चुनाव से देश के हालात बदल सकते है?

हमारे देश को चलाने वाले नेताओं को देखेंगे तो चुनावी पार्टियों में शामिल ज्यादातर नेताओं पर गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं। इन सभी पार्टियों के पास जनता की लूट का हजारों करोड़ रुपए है जिसका हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते है! कहने के लिए तो हम वोट डालते हैं और अपने नेता का चुनाव करते हैं पर असल में इस व्यवस्था में सिर्फ धनबल और बाहुबल से चुनाव होते हैं और जीते जाते हैं। हमारे देश के 88% सांसद करोड़पति हैं। जैसा कि प्रेमचंद ने लिखा है– “जिसे हम लोकतंत्र कहते है, वह बड़े -बड़े व्यापारियों और पूँजीपति का राज्य है, और कुछ नहीं, चुनाव में वही बाजी ले जाता है जिसके पास रुपये है, रूपये के जोर से उसके लिए सभी सुविधाएं तैयार हो जाती है। ”

आज तथाकथित आज़ादी के 75 साल बाद भी देश अभूतपूर्व गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, गैरबराबरी व तंगहाली के कगार पर खड़ा है। आज देश की स्थिति यह है कि 73% संपत्ति के मालिक महज 1% लोग बन बैठे हैं।
हम देख सकते है कि चाहे कांग्रेस हो, सपा हो, बसपा हो या भाजपा, कोई भी सरकार भूखमरी, बेरोज़गारी, गरीबी आदि समस्यायों को हल नहीं कर पाई है, सत्ता में काबिज़ होने पर सबने अपने निजी हित के लिए ही काम किया है। देश को चलाने के लिए जो भी आर्थिक–राजनैतिक नीतियां बन कर तय होती हैं, वे जनता के हित के लिए नहीं बल्कि सामंतों एवं बड़े देशी–विदेशी पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए ही बनती हैं।

लेकिन यदि हम यह कह रहे कि इस चुनावी व्यवस्था से जनता के हालात नहीं बदलेंगे, तो आखिर कैसे बदलेंगे?

इस चुनाव में हमें मनुवादी फासीवादी भाजपा सरकार पर हर तरह से चोट करनी होगी, जो कि जनता की बढ़ती बदहाली की ज़िम्मेदार है, लेकिन साथ ही हमें यह बात समझनी होगी कि किसी भी पार्टी के आ जाने से जनता की स्थिति में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आने वाला है।
अपने हालात बदलने के लिए हमें खुद ही अपने हक़-अधिकार की लड़ाई लड़नी होगी l जनता की एकता दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होती है जिसके सामने बड़े–बड़े निजामों को भी झुकना पड़ा है।
मौजूदा व्यवस्था आम जनता के लूट व शोषण से ही अपना भरण–पोषण कर रही है। हमें आगे आना होगा और इस व्यवस्था को पलट कर एक ऐसा समाज बनाना होगा जहां सब कोई बराबर हो, सबकी मूलभूत जरूरतें पूरी हो सकें और हर इंसान एक गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।
इसलिए आज ज़रूरत है छात्र-छात्राओं, नौजवानों, महिलाओं, बुद्धिजीवियों व तमाम मेहनतकश मज़दूर-किसानों को संगठित होने की और अपने अलग-अलग संघर्षों को एक कर ऐसा समाज स्थापित करने की जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण ना कर सके।

इंकलाब जिंदाबाद!
भगतसिंह छात्र मोर्चा

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