हमें ऐसी सरकार चाहिए जो हमारे प्रति जिम्मेदार और जवाबदेह हो!

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हमें ऐसी सरकार नहीं चाहिए जो हमारे ऊपर अपनी हुकूमत थोपे!

हमें ऐसी सरकार चाहिए जो हमारे प्रति जिम्मेदार और जवाबदेह हो!

 

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साथियों,

देश के पांच राज्यों में नई सरकारों के गठन के लिए चुनाव हो रहे हैं, हर नागरिक के सामने इस बात की चुनौती है कि वह मतदान के लिए किस बात को आधार बनाएं ताकि उसकी जिंदगी में भी कुछ सुख शांति और स्थिरता आये। हमें उसे  भी लोकतंत्र का थोड़ा आनंद मिले, वरना तो व्यवहार में विकास की तमाम वायदों-दावों के बीच हमारा समाज सरकारी खैरात पर पलने वाला समाज बनता जा रहा है। एक राजतंत्र के राजा के लिए खैरात बांटना गौरव पूर्ण हो सकता है लेकिन यह सिलसिला लोकतंत्र में भी जारी रहे और यहां पर भी अपने मेहनत पर इज्जत के साथ जीने की जगह ना हो तो यह किसी के लिए गौरव की बात नहीं हो सकती। हमारा लोकतंत्र सभी को बिना किसी भेदभाव के एक मत (वोट) का अधिकार देता है और इसी के बल पर हमें एक मनुष्य की पूरी गरिमा के साथ जीने की राह निकालनी थी। लेकिन ऐसा आज तक नहीं हो पाया। आज भी मनुष्य का जीवन और उसके श्रम-हुनर की कीमत सबसे कम है, वह आज भी बेहद लाचार और अमानवीय परिस्थितियों में रहने को विवश है। चुनाव का समय इन बातों पर गंभीर विचार-विमर्श का भी समय होता है। मौजूदा सरकार का एक नारा “न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन”। इसका एक अर्थ तो यह होता है कि फैसले लेने का पूरा अधिकार एक-दो लोगों के हाथ में केंद्रित कर दिया जाए और बाकी जनप्रतिनिधियों की भूमिका खत्म कर दी जाए। अधिकतम शासन का मायने यह भी हो सकता है कि सामाजिक एवं निजी जीवन के हर पहलू में शासन की घुसपैठ। दिलचस्प बात यह है कि यह सब लालफीताशाही को खत्म करने के नाम पर किया गया और नतीजे में हम सब के मत्थे मढ़ दी गई एक गैर जिम्मेदार तानाशाही। यह ठीक है कि लालफीताशाही और तमाम लोकतंत्र विरोधी कानून खत्म होने चाहिए लेकिन इसके साथ ही तानाशाही भी खत्म होनी चाहिए। आज यह तानाशाही हमारे जीवन और समाज को ही नहीं हमारे इतिहास, स्वाधीनता आंदोलन के जीवन मूल्यों, हमारी शिक्षा, हमारी ज्ञान परंपरा, हमारे अध्यात्म और हमारे धर्म सभी का अवमूल्यन कर रही है। हमारे सामाजिक जीवन को निर्जीव बना रही है। सामाजिक जीवन को जीवंत, रचनात्मक और मुक्त बनाने का सवाल किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में नहीं है। इसलिए मुख्य संघर्ष यहीं पर है।

यहां पर एक सवाल और भी महत्वपूर्ण है कि हमारे देश में लोकतंत्र के लिए होने वाले चुनाव कितने लोकतांत्रिक और मर्यादित रह गए हैं? सवाल सिर्फ बेहिसाब पैसे के इस्तेमाल का ही नहीं है बल्कि हर रोज बनाए जाने वाले कायदे-कानूनों का है जो चुनाव लड़ने की प्रक्रिया से आम नागरिक को बाहर करती जा रही है। एक साधारण व्यक्ति तो पूरे चुनाव के दौरान अधिकारियों के दरवाजे का चक्कर लगाता रह जाएगा और अपनी बातों का प्रचार ही नहीं कर पाएगा। पूरे चुनावी प्रक्रिया पर बड़ी और कॉर्पोरेट पोषित पार्टियों का एकाधिकार कायम हो गया है। आर्थिक जगत में जैसे बड़ी पूंजी छोटी पूंजी के कारोबार को या तो हड़प जाती है या बाजार से बाहर कर देती है, वैसा ही चुनाव में हो रहा है।चुनाव की इस अलोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए लोकतंत्र कैसे साकार होगा? आर्थिक जगत की तानाशाही राजनीतिक, सामाजिक, वैचारिक जगत के हर पक्ष को अलोकतांत्रिक बनाती है। इसलिए हमें आगे बढ़ने के लिए तानाशाही के हर रूप को मुद्दा बनाना होगा। चुनाव के समय सिर्फ पार्टियों को ही अपना प्रचार करने का मौका क्यों देना चाहिए, क्यों नहीं स्वतंत्र नागरिकों, सामाजिक संगठनों, श्रमिक-किसान संगठनों आदि को भी अपनी बातों-विचारों का प्रचार करने को उतना ही महत्व नहीं देना चाहिए। क्या सुरक्षा बलों की देखरेख में वोट डलवा देना ही पर्याप्त है?

मौजूदा सरकार ने बेहद अलोकतांत्रिक एवं तानाशाही तरीके से निर्णय लेने का एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। इन फैसलों से जनजीवन को जो कुछ भुगतना पड़ा है उस पर तो कोई ठोस चर्चा हो ही नहीं रही है। यह मनमाने फैसले आखिर किस जनता के हित में किए गए? नोट बंदी का फैसला, जीएसटी लागू करना, नागरिक कानून में बदलाव, कृषि कानूनों में बदलाव, श्रम कानून, उद्योगों  का निजीकरण, योजना आयोग को बंद करना, शुरुआती दौर में कोविड मरीजों के साथ शत्रुता पूर्ण व्यवहार, बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेटों के बैंक क़र्जों को बट्टे खाते में डालना और उन्हें और कर छूट देना, ऐसे विश्वविद्यालय को श्रेष्ठतम संस्थान का दर्जा देना जिसका जमीन पर कोई अस्तित्व नहीं था, लाखों श्रमिकों-नागरिकों को सड़क पर हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा के लिए बेसहारा छोड़ दिया गया, आदि।लोग दवाएं और इलाज मांग रहे थे और सरकार थाली और ताली बजा रही थी, लोगों को शिक्षा चाहिए और आप उसे लगातार महंगी बना रहे थे, लोग रोजगार मांग रहे थे और आप रोजगार खत्म करने की नीतियों पर अमल कर रहे थे? सवाल करने पर पूरी पाबंदी, यहां तक कि कोई पत्रकार भी आपसे कुछ पूछ नहीं सकता? मीडिया का इतना अवमूल्यन हुआ कि झूठे विज्ञापनों और समाचारों के बीच का फर्क ही मिटा दिया गया क्योंकि सच दिखाने का अधिकार ही छीन लिया गया है। ऐसा पहली बार हुआ है कि जिम्मेदारी आपकी और जवाबदेही हो विपक्ष से? विपक्ष और संसद की भूमिका इतनी नगण्य कभी हुई थी? इस तरह के सैकड़ों सवालों को यदि एक साथ रखकर देखा जाए तो क्या इसे देश का विकास कहा जाएगा? क्या दुनिया में इससे देश की इज्जत बढ़ेगी? आजकल राजनीति में सत्ताधारी पार्टी जिस भाषा का इस्तेमाल कर रही है, उससे समाज को क्या शिक्षा मिलेगी?

सच तो यह है कि हम चाहें या ना चाहें, यह सब कुछ हो रहा है, हमारे अपने देश में। उन लोगों के द्वारा किया जा रहा है जिनकी देश को बनाने में कोई त्याग-बलिदान का उदाहरण नहीं है। दूसरों से नायकों को उधार लेकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं और एक परजीवी विचार-संस्कृति को जनजीवन पर थोप रहे हैं।यही चरित्र वित्तीय पूंजी और सट्टेबाजी का होता है। इस बजट में क्रिप्टो करेंसी के सट्टेबाजी पर टैक्स लगाकर इन्होंने हर तरह की जुआबाजी के फलने फूलने की राह खोल दी है।यह कदम किन अर्थों में देश हित है और समाज को सभ्य बनाएगा। असभ्यता और सट्टेबाजी की अर्थव्यवस्था और तानाशाही में क्या रिश्ता है? राजनीति में हर तरह की  अनैतिकता, पाखंड और झूठ का सहारा लेने वाले लोग आज समाज की नैतिकता और धार्मिकता के ठेकेदार बने हुए हैं? इनकी सत्ता के सहयोग से समाज में जनविरोधी शक्तियां फल-फूल रही हैं और पूरे सामाजिक जीवन को विषाक्त कर रही हैं। क्या यह वक्त नहीं है अपने समाज और देश को बचाने का?

मौजूदा सरकार ढेर सारे रोजगार का सपना दिखाकर सत्ता में आई लेकिन उसने रोजगार के अवसर खत्म करने और युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर लगातार उलझाये रखने का काम किया। रोजगार का सवाल आखिर इतना जटिल क्यों बनता जा रहा है, क्यों हमारे नीति निर्माता देश की युवा शक्ति की क्षमताओं का इस्तेमाल करने वाली नीति बनाने में असफल रहते हैं या चाहते नहीं? असल में यह पूंजी के गुलाम हैं और रोजगार के लिए पूंजी के मालिकों की दया पर निर्भर हैं। इनकी उल्टी खोपड़ी में यह समझ है कि पूंजी से रोजगार पैदा होता है, रोजगार से पूंजी नहीं पैदा होती, यह समझते हैं कि असल उत्पादक शक्ति पूंजी और तकनीकी है। जबकि सच यह है कि पूंजी हो या तकनीकी वह मनुष्य के शारीरिक और मानसिक श्रम का उत्पाद होता है, उसी का एक परिवर्तित रूप होता है। इसलिए मनुष्य ही असली उत्पादक शक्ति है और जब इसे केंद्र में रखकर सोचेंगे तो बहुत से रास्ते निकल आएंगे। जब पूंजी के मालिक को केंद्र में रखकर सोचेंगे, तो वह तो सिर्फ मुनाफा चाहेगा ना कि रोजगार वृद्धि। नाना प्रकार के अनैतिक और गैरकानूनी तरीके से पूंजी के मालिक बने लोगों के हाथों में इन सरकारों की आत्माएं बंधक हैं इसलिए वह सिर्फ कठपुतली नृत्य ही कर सकते हैं, कोई नतीजा नहीं दे सकते। यही सोच श्रमिकों-किसानों-युवाओं की तबाही का कारण है। इस तबाही से पैदा हुए असंतोष के दमन के लिए सरकारें सही जवाबदेही की जगह उटपटांग बकवास कर रही है और तानाशाही की ओर जा रही है। इससे पूरा सामाजिक जीवन अशान्तिपूर्ण और विद्वेषपूर्ण होता जा रहा है।

हम किसी भी सामाजिक-आर्थिक समस्या को गहराई से देखेंगे तो हमें नेताओं का दोमुंहापन साफ दिखेगा और यह समझ में आएगा कि इनकी रूचि समस्याओं के समाधान में नहीं बल्कि उन्हें बनाए रखने में है ताकि लूटपाट का कारोबार चलता रहे और उनकी पार्टी को मोटा चंदा मिलता रहे। तो फिर एक जवाबदेह सरकार के गठन के लिए क्या किया जा सकता है? पहला काम तो यही बनता है कि चुनाव में घोर जनविरोधी और असामाजिक सरकारी पार्टी के खिलाफ वोट करने के लिए लोगों को प्रेरित-शिक्षित करना। इसके साथ ही उन सामाजिक संगठनों जैसे किसान संगठन, श्रमिक संगठन, युवा संगठन, मानवाधिकार संगठन, महिला संगठनों, कलाकारों के संगठन, पर्यावरणवादियों के संगठन आदि की सामाजिक-राजनीतिक भूमिका का विस्तार करना और इस भूमिका को कानूनी व्यवस्था दिलाने के लिए प्रयास करना। नागरिक समाज का वास्तविक राजनीतिक हस्तक्षेप इन्हीं सामाजिक संगठनों के मार्फत ही संभव है और यहां पर कोई हाईकमान नहीं होता और नेताओं को बदलना आसान होता है इसके साथ ही हमें सत्ता के विकेंद्रीकरण को ठोस रूप देने के लिए ग्राम सभाओं, पंचायतों, नगरपालिकाओं आदि लोक प्रशासन की संस्थाओं में अपनी भूमिका बढ़ाने तथा इसके लोकतांत्रिककरण के लिए योजनाबद्ध काम करना होगा। अभी यह संस्थाएं नौकरशाही और पूंजीशाही के चंगुल में फंसकर राजनीतिक भ्रष्टाचार का अड्डा बनी हुई है। लेकिन इसे ठीक किया जा सकता है क्योंकि नेता और जनता के बीच यहां पर दूरी सबसे कम होती है और उन्हें जवाबदेह बनाया जा सकता है। मुख्य बात है सत्ता के केंद्रीकरण की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए विकेंद्रीकरण के सवालों पर लोगों को जागरुक एवं एकजुट करना।

इस चुनाव ने हमें तानाशाही को उखाड़ फेकने का मौका दिया है ताकि हम हर तरह की तानाशाही के खात्मे के लिए एक सही जन आंदोलन की ओर आगे बढ़ सकें। इसी से भविष्य में समाज के प्रति जवाबदेह सरकारों का गठन और हम सब की समस्याओं का समाधान संभव होगा। आइए एक वास्तविक लोकतंत्र के लिए जिम्मेदारी से मतदान करें।

 

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सी.बी. सिंह, संयोजक जन जागरूकता अभियान, उ०प्र०। नन्हकऊ लाल ‘हरिद्रोही’, प्रांतीय सरपंच महर्षि सुपंच धानुक समाज पंचायत मंडल, उ०प्र०। भगवती सिंह, महावीर सिंह, अध्यक्ष लोकतंत्र सेनानी संगठन। शिवाजी राय, अध्यक्ष किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा, उ०प्र०। मो० 8756501440 । वीरेंद्र त्रिपाठी, एडवोकेट संयोजक पीपुल्स यूनिटी फोरम, मो० 8454073470 । रामकिशोर, अध्यक्ष सोशलिस्ट फाउंडेशन। कामरेड केके शुक्ला, मुख्य संपादक राज समाज, लखनऊ, मो० 9453682439 । भगवान स्वरूप कटियार, कौशल किशोर ,जन संस्कृति मंच। सृजन योगी आदियोग, संयोजक इंसानी बिरादरी। ज्योति राय ,संयोजक छात्र नौजवान अधिकार अभियान, मो० 8800501205 । होमेंद्र मिश्रा , रोडवेज कर्मचारी मोर्चा। संतोष सिंह, संतोष परिवर्तक, युवा भारत, मो० 7521006792 । महेश चंद्र देवा, वरिष्ठ रंगकर्मी। सतीश श्रीवास्तव, एडवोकेट। रजनीश भारती, जनवादी किसान सभा, मो० 8303515219 । लक्ष्मी नारायण, एडवोकेट। अजय शर्मा। डॉक्टर नरेश कुमार। अवतार सिंह बहार, एडवोकेट। अजय असुर, मो० 8840450621 । रामकृष्ण , संयोजक नागरिक परिषद लखनऊ, मो० 8318846785 । बाल गोविंद सिंह (महासचिव), ओ. पी. सिंहा ( अध्यक्ष), ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल, मो० 9415568777 ।

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